Wednesday 18 January 2012

याद


याद


उसके कम्पन का अहसास
हर समय हृदय में लिए
देखती हूँ आकाश की ओर
मगर विश्वास की जमीं पैरों तले
रौंदी जाती है हर बार
खो जाती हूँ
उसके बहके हुए कथनों पर
सदियों से लगी संस्कार की धूल
उसके मन-बदन को सालती है
और बिखर जाता है वह
आतिशबाजी की तरह
घर के आँगन में .
सोचती हूँ- डर
और अकेलेपन का एक रिश्ता है
जितना वह डरता है
उतना ही वह अकेला है
मैं उसकी कुछ नहीं लगती
पर उस गुमशुदा ने
मेरा हाथ थाम लिया
मुझे वह समय याद है-
जब बाइक के पीछे बैठ
उसकी उँगली थाम कर
बाहर का नजारा देखती
उस भीड़ में कहीं खो गई ...
अँधेरा ही अन्धेरा
भीड़ के शोर में भी
भीतर खामोशी है
और उसकी याद इस तरह
जैसे हवा का एक स्पर्श ...

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