Sunday 29 January 2012

राधा


तुमने मुझे जब पहली बार छुआ
मेरे अंदर की सारी सूनी जगह
हठात मुखरित हो उठी ,प्रत्येक दिशा से
ऐसा लगा जैसे तुम मुझे पुकार रहे हो
काश मैं उस आकांक्षा के भीतर होती

उस पुकार में कोई उच्चारण नहीं था
तुमने कुछ भी नहीं कहा फिर भी
मुझे लगा सात सिंधुओं की गर्जना से
ज़ोर से पुकार रहे हो
बारबार वज्रपात और भूकंप में तुम
धूलिसात करते मेरे सयत्न निर्मित
रूप-रूपांतरों को जो मैं बनाती
निर्भय वही बन जाने की क़हते हो

कभी कभी लगता था यही सच है
मेरी सीमाबद्ध जीवदशा
उसके भीतर सीमित निरुताप यौवन
एक दिन भूल जाऊँगी
तुम्हारे छूने की पहली वेला को
आँखों में आँख भर निरुद्विग्न दृष्टि लेकर
पहले की देखती रहती हूँ कि कदंब पर
फूल खिलते है और मुरझाते है
झिलमिलाती चाँदनी में नदी का जल

फिर भी मैं जानती थी
पहली बार जब तुमने छुआ मुझे
आज हो या कल
किसी न किसी एक दिन
तुम्हें अवश्य सौंप दूँगी और
चुप हो जाऊँगी ,मैं जो बनी होती
वही बन जाऊँगी सिर्फ एक ही रात में
मैं तुम्हें काल-कालांतर तक जकड़े रहूँगी
विवसन अंत:करण में

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