Wednesday, 25 September, 2013

सन्नाटा



सन्नाटा





प्यार न सही कभी गुस्सा ही किया करो.........

मनुहार न सही  गिला ही किया करो...........



अब तो बीत गए जमाने

यूँ मौन रहकर

संग गाये हुए तराने



इकरार न सही कभी इनकार ही किया करो .........

इजहार न सही तकरार ही किया करो ............




याद है तुम्हे वो शुरू- शुरू की उमंगें

वो बेताबियाँ

सीने में उमड़ती तरंगें





सच न सही कभी झूठ ही कहा करो ............

फोन न सही मिस्ड  काल ही किया करो  ............





घंटों भरी   सर्दी  में

कंप्यूटर  स्क्रीन  पर नजरें  गड़ाएं  बैठना

कुर्सी पर सब की नजरों से बचाकर
कम्बल  को  चारों  तरफ  लपेटना
उफ़  वो दिसम्बर  की ठिठुरन
 भी गर्मी  दे  जाती  थी  





मुलाकात न सही कभी मेसेज ही किया करो  .........

जीवन न सही जान ही लिया करो  ..................





तो अब क्या प्रेम नहीं रहा

कहीं ख़त्म हो गएँ  है या गुम हो गएँ  है

वो शरारतें ,वो अठखेलियाँ
अब शब्द क्या बेमानी हो गए हैं





कसम न सही कभी  रस्म ही निभाया करो  ..............

वफादारी न सही दुनियादारी ही निभाया करो .............




कुछ भी तो नहीं बदला

या फिर सब कुछ बदल गया है

न रुत बदली है न मौसम बदला
पर न तुम बदल सकते हो न मैं
फिर क्यूँ पसरा है  सब ओर "सन्नाटा "

हद






जब दर्द हद से गुजर जाता है
तो रूह का हर जख्म उभर आता है
जिस्म सुन्न आँखें पथरा जाती है
जहर भी बेअसर हो जाता है

जब दर्द हद से गुजर जाता है
तो इश्क इबादत बन जाता है
मन देवालय तन शिवालय हो जाता है
दुनिया वीरान बंजर नजर आती है

जब दर्द हद से गुजर जाता है
तो प्यार में खुदा नजर आता है
शब्द मूक संगीत बधिर हो जाता है
धरती इक नाम में सिमट जाती है

Thursday, 5 September, 2013

प्रियतम !

प्रियतम !

हर बार की तरह....................

इस बार भी जब आओगे
इक आध दिन के लिए
बहुत मिन्नतों  के बाद  
तो जाने नहीं दूंगी
पकड़ लूँगी बैयाँ
पैर पड़ जाउंगी
रोक लूँगी
हमेशा के लिए
या फिर संग में  हो लूँगी

इस बार भी जब आओगे
जानती हूँ
अपनी मीठी बातों से,
मासूमियत से
मुझे कर लोगे वशीभूत
यह कहकर
हमारी आत्माएं तो एक है
हर पल
 तुम मेरे संग रहती हो
देने लगोगे  दुहाई
 जमाने भर की
मजबूरियों की



इस बार भी जब आओगे
साथ अपने  लाऊँगी
 कितने सारे सपने
अनगिनत बरसाते
कसमसाती रातें
खिड़की से मुंह चिडाती
चाँद की चांदनी
सीने को धड्काती
रात की रानी  
भीगे तकिये का गिलाफ
चादर की सिलवटें
बेरहम करवटें
बार- बार निहारता
मूक आईना
 बधिर दर्रो दीवार
जो गवाह है मेरी सिसकियों की

इस बार भी जब आओगे
सब कुछ  परत  दर परत
 खोलकर रख दूंगी
 सामने तुम्हारे
बार- बार निहारता
मूक आईना
 बधिर दर्रो दीवार
जो गवाह है मेरी सिसकियों के 
तब तो तुम जरूर पसीज जाओगे
इतने कठोर दिल नहीं हो सकते

इस बार भी जब आओगे
इक आध  दिन के मिलन
में अपने को संतुष्ट कर लूँगी
अपने को समझा बुझा लूँगी
अगली कई अनगिनत रातों के लिए
बुझे हुए बेशुमार पलों के लिए
 खुद को रोज मर्रा के कामों
में अपने को अभ्यस्त करने का
 अभिनय करने लगूंगी

इस बार भी जब आओगे
कभी न पूरी होने  वाली उम्मीद
हर पल हर दिन
खुद को समझाते
कभी तो वो दिन आएगा
जब सदा के लिए
समुन्द्र में नदी की तरह
 विलीन हो जाउंगी