Sunday 19 December 2010














" देव- भूमि"

इस गर्मी की छुट्टी हम चले पहाड़ों की सैर
ऐसा लगा मानो पहाड़ों पर बादल रहे तैर

आने लगे ठंडी- ठंडी हवा के झोंके
ए.सी. , कूलर भी हैं जिसके आगे फींके

हिमाचल जो कहलाए धरती पर " देवभूमि"
मैदानों पर पड़ रही होती जब भीष्म गर्मी

हर मोड़ पर लगा है संकेतक साइन बोर्ड
देकर चलो हार्न ,आगे है तीव्र मोड़

इक तरफ ऊँचे पहाड़ तो इक तरफ गहरी खाई
किसे ना मनमोहक पहाड़ी झरनों की छटा भाई

दूर इक पहाड़ी पर चरवाहा था भेड़ें चराए
हैरान हूँ बिन सीड़ी ,रास्ते कैसे वहाँ चढ़ जाए

घुमावदार सड़कों पर सर खा ना जाए चक्कर
ओवर टेक ना करो तंग सड़क पर हो ना जाए टक्कर

छोटी पहाड़ी पर इक था छोटा सा शिवालय
कोहरे के आलिंगन में था पर्वत हिमालय

बर्फ से ढकी ऊँची चोटियाँ नव दुल्हन की तरह निर्मल
पर्वत मालाएं हैं देवताओं के वास से उज्जवल

कहीं हैं बांस के वृक्ष तो कहीं लम्बे- लम्बे देवदार
इक पल में धूप खिले तो इक पल में बरखा की मनुहार

कानों में रस घोल रही पक्षियों की आवाजें मनमोहक
रैन बसेरों की रोशनी लगे मानों तारें रहे हो चमक

यहीं पर दिखता धरती -गगन के मिलन का अद्दभुत नजारा
जहाँ सूरज की पहली किरण से फ़ैल रहा नव उजयारा

मन चाहे कि बना ले हमेशा का यहीं इक आशियाना
कुदरत ने मानों यहीं बिखेरा अपना सारा खजाना

इस गर्मी की छुट्टी हम चले " देव भूमि"

Sunday 5 December 2010

दिग्वलय .


जैसे ही ट्रेन ने अपनी रफ़्तार पकड़ी ना जाने कब दिवाकर अतीत की यादों में खो गया . उसे रह- रह कर वो दिन याद आ रहा था जब उसका इंजीनीयरिंग कालेज में दाखिले का अंतिम दिन था . दिवाकर बचपन से ही पढ़ाई में चारों भाई- बहनों में सबसे होशियार था और उसके अच्छे अंकों के कारण शहर के जाने- माने इंजीनीयरिंग कालेज में उसका नंबर आना स्वाभाविक ही था . परन्तु उसके घर की माली हालत कुछ ठीक नहीं थी इसलिए पिताजी अपनी सीमित आय में दाखिले के पैसों का बंदोबस्त नहीं कर पाए थे .दिवाकर के सभी दोस्तों ने कालेज में दाखिला ले लिया था . दिवाकर को अपना भविष्य अन्धकार में नजर आ रहा था .जिन लड़कों का रैंक उससे काफी कम आया था उन्होंने भी दाखिला करवा लिया था . दिवाकर परेशान हालत में इधर से उधर घूम रहा था .
दिवाकर को परेशान देखकर आखिर उसकी माँ से रहा नहीं गया और वो उसके पिताजी को बुलाकर कहने लगी ,
" आप बेशक हार मान ले पर मैं अपने होनहार बेटे का जीवन बर्बाद नहीं होने दूंगी और उसका सपना जरुर साकार करुँगी "

पिताजी बीच में ही खीजते हुए बोले ,
"तुम क्या करोगी ? कभी स्कूल की शक्ल भी देखी है जीवन में जो इतनी बड़ी- बड़ी बातें कर रही हो . क्या कोई गड़ा हुआ खजाना हाथ लग गया है जो दाखिले के लिए निकाल कर दे दोगी"

" गड़ा हुआ खजाना ना सही पर मै मेरे बेटे को इंजीनीयर बनाने के लिए अपने गहने तो बेच ही सकती हूँ . आज कल गहने कौन पहनता है और किस दिन काम आयेंगे "

पिताजी गुस्से से आग बबूला हो गए " पागल तो नहीं हो गई हो , अब क्या मै तुम्हारे गहने बेचने जाऊँगा तो मेरी क्या इज्जत रह जाएगी "

" जब तुम्हारा बेटा इंजीनीयर बन जाएगा तो तुम्हारा ही सीना गर्व से फूलेगा तब सब बातें पीछे रह जायेंगी "

इस तरह काफी मिन्नतों के बाद आखिर दिवाकर के पिताजी राजी हो गए और दिवाकर का दाखिला इंजीनियरिंग कालेज में हो गया . दिवाकर ने अपनी मेहनत और लग्न से काफी अच्छे अंकों में डिग्री प्राप्त कर ली और देश की जानी मानी कंपनियों से उसे नौकरी की पेश- कश आने लगी .

दिवाकर के मामा और ज्योत्सना के पिता गहरे दोस्त थे , उन्होंने दिवाकर की काबलियत देखते हुए ज्योत्सना के लिए दिवाकर का हाथ माँग लिया . इधर दिवाकर ने अपनी पहली नौकरी ज्वाइन की और उधर उसका विवाह ज्योत्सना से हो गया . इस तरह उसने अपनी जिन्दगी के दो सफ़र एक साथ शुरू किए . दिवाकर को एक दम से नई जगह पर नौकरी के लिए जाना था तो एक बार उसने अकेले ही जाना बेहतर समझा . दिवाकर ने ज्योत्सना को प्यार से समझाते हुए कहा ,
" देखो ज्योत्सना नई- नई जगह के बारे में अभी मुझे कोई जानकारी नहीं है इसलिए मै एक बार अकेले ही चला जाता हूँ . जब मैं वहाँ सब कुछ व्यवस्थित कर लूँगा और कंपनी का घर भी मिल जाएगा तो छुट्टी मिलते ही मै तुम्हे भी अपने साथ ले जाऊँगा तब तक तुम यहीं गाँव में माँ और बाबू जी के साथ रहो "

इतना क्या सुनना था ज्योत्सना तो जैसे एक दम हैरान परेशान हो गई और बोली ,
" दिवाकर तुम्हारे बिना मै अकेले यहाँ नहीं रह पाउंगी . वैसे भी गाँव के माहौल की मुझे कोई जानकारी नहीं है इसलिए जब तक तुम अपना घर वहाँ व्यवथित नहीं कर लेते मै अपने माता- पिता के पास ही रहूंगी . "

पूरे एक महीने के बाद दिवाकर ज्योत्सना को छुट्टी मिलने पर जब उसके मायके उसे लेने गया तो उसे बात- बात पर अहसास होने लगा कि ज्योत्सना को अपने माता- पिता की शान शौकत का कुछ ज्यादा ही घमंड है .वह बात- बात पर दिवाकर के घर के और गाँव के माहौल पर कटाक्ष कर देती थी . दिवाकर चाहता था कि वह जब इतनी दूर आया है तो कुछ दिन अपने माता- पिता के पास भी रहे पर ज्योत्सना को तो गाँव जाना बिल्कुल भी गवारा नहीं था . नई- नई शादी हुई थी इसलिए दिवाकर चुप रह जाता . इस तरह दोनों ने आखिर अपने घर से मीलों दूर नई जगह पर अपनी गृहस्थी की शुरुआत की .


* तभी दिवाकर का ध्यान भंग हुआ जब अक्षिता कहने लगी ,
" पापा , पापा बहुत प्यास लग रही है, कोल्ड ड्रिंक लेकर दे दो "
दिवाकर अपनी पत्नी ज्योत्सना को उसके मायके एम्. ए. की पढ़ाई करने के लिए छोड़ कर आ रहा था .जब ज्योत्सना ने बी . ए . की पढाई ख़त्म की ही थी तभी उसका विवाह दिवाकर से हो गया था . दिवाकर के विवाह को लगभग दस वर्ष बीत चुके थे. अब जब अक्षिता बड़ी हो गई थी तो ज्योत्सना घर पार सारा दिन बोर हो जाती थी इसलिए दिवाकर ने ही उसे अपनी पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी थी वैसे भी ज्योत्सना शुरू से ही पढ़ने में होशियार रही थी . दिवाकर का गाँव और ज्योत्सना का मायका पास- पास में थे . ज्योत्सना शुरू से ही बड़े शहर के माहौल में पली- बड़ी थी. अक्षिता को ज्योत्सना की गैर मौजूदगी में अपनी माँ की कमी महसूस ना हो और किसी तरह की दिक्कत पेश ना आए इसलिए दिवाकर अपनी माँ को अपने साथ अपनी नौकरी करने वाली जगह लेकर जा रहा था . दिवाकर एक मल्टीनैशनल कंपनी में बतोर इंजीनीयर काम करता था जहाँ तक ट्रेन द्वारा पहुँचने में काफी लम्बा सफ़र तय करना पड़ता था

दिवाकर को रह -रह कर आज फिर अपनी माँ की कुर्बानियां याद आ रही थी . दिवाकर को ज्योत्सना की गैर मौजूदगी में भी अपनी माँ के होते हुए अक्षिता और घर की देखभाल में कोई परेशानी नहीं आई .दिवाकर की माँ शुरू से ही गाँव में रही थी और पिताजी के स्वर्गवास के बाद तो खेतों की जिम्मेवारी खुद अकेले ही संभाल लेती थी .जब कुछ दिनों बाद उनकी काम वाली बाई छुट्टी पर चली गई और इस बीच दिवाकर भी काफी बीमार पड़ गया . परन्तु उसकी माँ इतनी धैर्यवान थी कि इतनी उम्र हो जाने के बावजूद भी काम वाली के ना आने पर भी सब काम अकेले ही कर लेती थी . दिवाकर अपनी माँ को काम करते देख अनायास ही सोचने लगता था कि कैसे ज्योत्सना काम वाली के ना आने पर सारा घर सर पर उठा लेती थी . वैसे भी ज्योत्सना अपने माँ- बाप की इकलोती बेटी थी इसलिए कुछ ज्यादा ही लाड -प्यार से पली- बड़ी थी . दिवाकर को अपनी नौकरी के साथ- साथ ज्योत्सना की घर के काम- काज में भी मदद करनी पड़ती थी . दिवाकर बहुत ही सहनशील था और वह किसी भी कीमत पर घर की शान्ति बनाए रखना चाहता था .

ज्योत्सना की गैर मौजूदगी में दिवाकर घर पर और अक्षिता पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देता था तांकि वापिस आकर ज्योत्सना को कोई शिकायत करने का मौका ना मिले . अक्षिता की परीक्षा के दिनों में भी दिवाकर उसे आफ़िस से छुट्टी लेकर हर विषय खुद ही पढ़ाता था तांकि वह अच्छे अंक प्राप्त करके पास हो सके . .

देखते- देखते तीन महीने भी बीत गए और ज्योत्सना अपनी एम् ए . की परीक्षा देकर लौट आई . अपनी तरफ से दिवाकर ने हर मुमकिन कौशिश की थी कि इतने दिनों के बाद घर आने पर ज्योत्सना को कोई परेशानी ना हो और ना ही कोई शिकायत करने का मौका मिले . परन्तु ज्योत्सना तो जैसे आदत से मजबूर थी . एक तो दिवाकर की माँ के साथ उसकी शुरू से ही एक मिनट भी नहीं बनती थी बस अब तो हर बात पर उसे कोई ना कोई मौका मिल जाता था कुछ ना कुछ बोलने का . ज्योत्सना उसकी माँ के आगे खुद को ज्यादा ही अप टू डेट समझती थी .दिवाकर की माँ कुछ पुराने ख्यालात की थी ,जैसे कि पुराने समय की अक्सर औरतें होती हैं .ज्योत्सना हर बात पर शिकायत करती और चिडचिड़ा जाती और दिवाकर को भला बुरा कहने लगती
" यदि घर की हालत इस तरह से जाहिलों के हाथों से खराब करवानी थी तो क्या जरूरत थी मुझे एम्. ए. करवाने की. पीछे से एक भी काम सही ढंग से नहीं हुआ है "

दिवाकर यह सब सुन कर भी चुप रहता . उसे समझ नहीं आता था कि वह क्या कहे. मन ही मन वह यह जरुर सोचता कि तीन महीनों से उसकी माँ ने अक्षिता की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसके बीमार होने के बारे में पूछना तो दूर बल्कि हर चीज में नुक्स निकालना उसकी आदत ही बन गई. अक्षिता की परीक्षा के परिणाम से भी वह संतुष्ट नहीं थी और उसने दिवाकर को भी बहुत भला- बुरा कहा . दिवाकर मन ही मन बहुत दुखी होता यहाँ तक कि उसकी माँ भी बहुत परेशान रहने लगी और बार- बार दिवाकर को वापिस गाँव छोड़ कर आने की जिद करने लगी .

क्या इसी दिन के वास्ते उसकी माँ अपना घर अपना देस छोड़कर उसके साथ इतनी दूर उसका घर देखने के लिए आई थी . यहाँ पर तो ना उसकी किसी से जान पहचान थी ना ही यहाँ की भाषा वो समझ पाती थी .

दिवाकर की मन ही मन ख्वाइश थी कि घर जाने से पहले वह अपनी माँ को कोई सोने का गहना बनवा कर दे जिन्होंने उसकी पढ़ाई के लिए इतनी कुर्बानी दी थी और उसे इस काबिल बनाया कि वह अच्छे से अपना जीवन गुजर- बसर कर सके . ज्योत्सना को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत भड़क गई और कहने लगी ,
" हाँ , हाँ , इसीलिए तो कमाते हो तांकि सब अपने गंवार रिश्तेदारों पर लुटा सको . मेरे और अक्षिता के प्रति तो जैसे तुम्हारी कोई जिम्मेवारी है ही नहीं "

दिवाकर की माँ ज्योत्सना की शूल भरी बातें सुनकर बहुत दुखी होती और एक दिन दिवाकर से कहने लगी,
" दिवाकर तूँ ये कान के बूंदे यहीं पर रख ले ,कल को अक्षिता के काम आ जाएँगे क्योंकि अब इस उम्र में मै इन्हें पहन कर कहाँ जाउंगी और तुम्हारी पत्नी को भी तसल्ली रहेगी "

दिवाकर बिना कहे अपनी माँ की बात को समझ गया कि इतने हलकी चीज उन्हें पसंद नहीं आई थी क्योंकि गाँव में सभी औरतें कानों में बड़े- बड़े बूंदे पहनती थी.

दिवाकर की माँ मन ही मन सोचने लगी कि पहली बार तो दिवाकर ने उसे कोई चीज लेकर दी है और अगर वह गाँव जाकर सबको ये कुंवारी लड़कियों के पहनने लायक बूंदे दिखायेगी तो लोग क्या बात नहीं करेंगे . अगर बेटे ने कुछ बनवा कर देना ही था तो कोई ढंग की चीज तो देता तांकि चार दिन पहनने लायक तो होती. ये सब सोचकर उसकी माँ का मन उदास हो जाता .

दिवाकर यह सब बातें देख- सुनकर मन ही मन बहुत हताश होता कि वह दिन भर घर से बाहर नौकरी करता है और अपनी तरफ से हर एक को खुश रखने की हर मुमकिन कौशिश करता है फिर भी उसकी भावनाओं का ख्याल रखने की कोई कोशिश नहीं करता . क्या वह पुरुष है इसी लिए उसको किसी से शिकायत करने का कोई हक़ नहीं है ? वो क्या चाहता है यह कोई जानना नहीं चाहता .क्या यही वास्तविक सच है हमारे पुरुष प्रधान समाज का . ? वह किसी के सामने रो भी नहीं सकता यह सोचते ही उसकी आँखें नम हो गई. वह अशांत मन से दिग्वलय में डूबते दिवाकर की ओर देखने लगा जैसे उसके आस पास अँधेरा फैलने लगा हो.
और उसने अपनी दोनों आँखें बंद कर ली......