Friday 2 December 2011

चुनावी-रण

चुनावी-रण

आयशा चलते- चलते एक संकरे पुल के बीचो- बीच पहुँच गई , जहाँ से आगे बढना उतना ही कठिन था जितना कि वापिस लौट कर जाना . उसने सोचा क्यों ना आगे बढ़ा जाए . उसे वह दिन याद आ रहा था जब वह पहाड़ी पर बने एक किले को देखने के वास्ते सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रही थी तो आधे रास्ते उसकी हिम्मत जवाब देने लगी परन्तु सीढियां उतरना उतना ही कठिन था और फिर मन में किले के रहस्य को जानने की भी उत्सुकता काफी प्रबल थी . इस अनसुलझे रहस्य को जान लेने से कम से कम मन में मच रही खलबली को सकून तो मिल जाएगा , यही सोच कर वह आगे बढ़ गई .

उसके जीवन का पहला अवसर था जब वह चुनाव मैदान में उतरने जा रही थी , बेशक उसे राजनीति के क्षेत्र में पाँच वर्ष के करीब हो गए थे. राज्य सरकार के चुनावों में उसने क्षेत्र के विधायक महोदय जिनके आशीर्वाद से उसने राजनीति में कदम रखा था उनके लिए रात -दिन एक कर दिया था . महिला वक्ता कम होने के कारण हर बार महिला वोटरों को लुभाने के लिए उसे माइक पर खड़ा कर दिया जाता था। विधायक महोदय आयशा की संभाषण –शैली से काफी प्रभावित थे और अक्सर कहा कहते थे ,

“ आयशा जब तुम माइक संभालती हो न, सारी भीड़ मंत्र-मुग्ध होकर सुनती हैं । भगवान ने तुम्हें इतनी सुंदर वाक-शैली प्रदान की है कि जितनी तारीफ करूँ ,उतनी कम है । एक न एक दिन तुम जरूर राजनीति में अपना परचम लहराओगी ।‘

विधायक महोदय द्वारा की गई खुले मन से तारीफ सुनकर वह मन ही मन हर्षित हो जाती थी और राजनीति में आगे बढ्ने के बड़े - बड़े सपने देखने लगती थी ।

इस बीच उसने अपने इलाके के लोगों की तन, मन , धन से खूब सेवा की थी और अच्छा ख़ासा नाम कमा लिया था . उसने अपनी पढ़ाई के समय में कभी भी कालेज या यूनिवर्सिटी के किसी भी चुनाव में हिस्सा तक नहीं लिया था , वह तो बस अपनी किताबों की दुनिया में खोई रहती थी . उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह एक छोटे बच्चे की तरह स्कूल में अपना पहला इम्तिहान देने जा रही हो या फिर एक नए भर्ती हुए सैनिक की तरह अपने जीवन में पहली बार युद्ध के मैदान में अपना रण कौशल दिखाने जा रही हो .

कालेज के जमाने की उसे एक बात याद आने लगी जब उसके एक पसंदीदा प्रोफेसर ने एक बार यहाँ तक कहा था , “ आयशा, मुझे लगता है कि इधर –उधर की आलतू- फालतू लाइनों में जाने से बेहतर होगा तुम दर्शन-शास्त्र का विषय लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करो । तुम अवश्य एक अच्छे प्रशासक के रूप में अपने आप को स्थापित कर सकती हो ।“

उसने उस समय ऐसे ही मन में आए विचार के तहत जवाब दिया था ,” सर, मैं भाग्य और मेहनत में भाग्य को ज्यादा मानती हूँ । चाहने से या केवल मेहनत करने से सब कुछ नहीं मिल जाता । कुछ तो किस्मत भी प्रबल होनी चाहिए। ”

आज वह सोच रही थी इतनी कम उम्र में उसके स्वर में कितनी बड़ी दर्शनिकता झलक रही थी ! आयशा को किसी भी कीमत पर सीढ़ियों के रास्ते पहाड़ की चोटी पर बने किले तक पहुंचना था , उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी .परन्तु उसके पास कोई रास्ता भी नहीं था . अगर वह रुक कर पीछे मुड़ कर देखने लगती तो उसे चक्कर आने लगते और उसे लगने लगता कि वह नीचे लुढ़क जाएगी. इसलिए वह फट से अपना मुँह घुमा लेती और धीरे- धीरे फिर से ऊपर की और चढ़ने लगती . किले का रहस्य उसके मन में और गहराता जा रहा था .

उसे क्षेत्रीय पार्टी से जुड़े बेशक पाँच वर्ष हो चुके थे परन्तु उसे चुनावों की पेचीदगी की अभी भी कोई जानकारी नहीं थी . आयशा को पूरी उम्मीद थी कि म्युनिसिपल कोंसिल के चुनावों में उसे अपनी पार्टी का समर्थन जरूर मिलेगा क्योंकि उसके वार्ड में उससे ज्यादा कोई होनहार महिला उम्मीदवार नहीं थी . चूँकि वह एक महिला आरक्षित वार्ड था इसलिए उसको पूरा विश्वास था अपनी काबलियत पर . वैसे भी उसने पिछले वर्षों में अपनी पार्टी की सेवा का कोई मौका चूका नहीं था .परन्तु उसे मालूम ही नहीं था कि कितनी साजिशे उसके खिलाफ रची जा रही हैं . वहाँ के विधायक महोदय की चहेती होने के बावजूद गठ- बंधन सरकार की दूसरी पार्टी ने जोर डालकर टिकट अपनी प्रत्याशी को दिलवा दिया । आयशा को उस समय लगने लगा कि शायद वह विधायक उसकी झूठी तारीफ कर रहा था भीड़ को रिझाने के लिए ,जब भी उन्हें संबोधित करवाना होता था । शायद उसकी सुंदरता और तेज तरार्र होने का केवल फायदा उठाया उसने केवल आज तक ।

आयशा के विश्वास को गहरा झटका लगा , इतना ही नहीं पार्टी के बाकी सभी लोग भी उससे उम्मीद करने लगे कि वह उस महिला उम्मीदवार की मदद करे जो कि आयशा को बिल्कुल गवारा नहीं था .उसे अब अपना चुनाव लड़ने का फैंसला वापिस लेना मंजूर नहीं था क्योंकि यह उसकी इज्जत का सवाल था .वह अपने समर्थकों को निराश नहीं करना चाहती थी . आयशा अपने आप को चुनाव मैदान में उतरने के लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी . वह खुद को लोगों की नजरों में परखना चाहती थी.इस मामले में उसका तजुर्बा बेशक बिल्कुल नहीं था परन्तु उसे अपनी काबलियत पर पूरा भरोसा था .

आयशा ने आजाद उम्मीदवार के तौर पर म्युनिसिपल कोंसिल का चुनाव लड़ने का फैंसला ले लिया. उसके ऐसा करते ही पार्टी के सभी जिम्मेवार लोगों ने उससे ऐसे किनारा कर लिया जैसे कि एक घायल सैनिक को उसके हाल पर छोड़ कर सेना युद्ध स्थल में आगे बढ़ जाती है . दूसरी तरफ पार्टी ने गठ-बंधन सरकार वाली दूसरी पार्टी की अन्य महिला उम्मीदवार रंजू गुप्ता को टिकट दे दिया . अब मुकाबला लव ट्रायंगल फिल्म की तरह त्रिकोणा हो गया . तीसरी मुख्य उम्मीदवार क्षेत्र के विधायक महोदय से निजी दुश्मनी के कारण खड़े हुए आजाद गुट की तरफ से थी . यह गुट नगर- परिषद् के प्रधान ओ. पी.  चोपड़ा  का था, जिसने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपनी बिरादरी के चमचे प्यारे लाल की अस्सी साल की बूढ़ी माँ को दे दी . हमारे संविधान की बहुत ही अजीबो गरीब बात है कि चुनाव लड़ने की अधिकतम आयु पर कोई रोक नहीं लगाई गई है . राजनीति में कोई रिटायरमेंट की उम्र तय नहीं है .तभी तो शायद राजनीति को लम्बी पारी का खेल कहते हैं .

चुनाव की तारीख के दस दिन पहले से ही चुनावों की गहमा- गहमी पूरे जोर- शोर से शुरू हो गई . कहते है ना चुनाव जितना छोटा होता है उतना ही मजेदार होता है , इसीलिए हर जगह एक मेला सा लगा हुआ मालूम होता था .सभी प्रत्याशी एक दूसरे को हराने के लिए पूरी गर्म जोशी से इधर- उधर घूमते हुए लोगों से संपर्क साध रहे थे . आयशा के वार्ड में सबसे ज्यादा उम्मीदवार चुनाव मैदान में थीं जैसे कि चुनाव ना हो गया कोई खेल हो गया . हर कोई इनका लुत्फ़ उठाने और मौके का फायदा उठाने में लगा था .जिस प्रकार खुले में जब कुछ गुड गिर जाता है तो लाखों चींटियाँ पूरे जोश से अपने- अपने घरों से पता नहीं कहाँ- कहाँ से निकल कर बाहर आ जाती है और कतार में चलती अपनी साथी मित्रों को भी दावत का संदेशा देती जाती हैं .छोटे चुनावों में एक - एक वोट चुनाव परिणाम पर काफी फर्क डाल देती है .

आयशा अपने आप को खुशनसीब समझ रही थी कि उसके पति एवं बाकी सारे रिश्तेदार, माता - पिता , सास - ससुर , बहन - भाई , देवर , ननद , मित्र सब उसके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े थे . आयशा के चुनाव लड़ने की सारी जिम्मेवारी उसके भाई ने अपने सर पर ले ली ।

उसका भाई कहने लगा,” आयशा, तुम्हारे चुनावी खर्चे में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं आने दूंगा । बस तुम पूरी लगन और मन से चुनाव लड़ो । अगर तुम जीतोगी तो अपने परिवार का नाम ही रोशन होगा । बस ....तुम डटी रहो।”

आयशा को भाई के इस आश्वासन के पीछे छुपे भाव पहले से अच्छी तरह मालूम थे , फिर भी अपने चेहरे पर बिना कोई विकार लाए वह कहने लगी ,” भाई, तुम चिंता मत करना ,अगर मैं जीत गई तो तुम्हारा सारा मुझ पर किया गया खर्च चुकता कर दूँगी । तुम तो जानते ही हो बचपन से ही मैं स्वाभिमानी रही हूँ । बस मन में पता नहीं क्यों एक इच्छा हो आई चुनाव में खड़े होकर देखने की । एक बार किस्मत तो आजमाई जाये ।“

उसका भाई एक जाना माना व्यापारी आदमी था ,तुरंत ही सारा माजरा समझ गया । बिना कुछ प्रत्युत्तर दिए चुपचाप सुनता रहा । एक बात उसकी समझ में अवश्य आ गई थी कि आयशा के ऊपर खर्च करने में किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हैं । उसे चारों उँगलियाँ घी में नजर आने लगी ।

मेन मार्किट के बीचों- बीच उन्होंने ही सबसे पहले एक दुकान के बाहर अपना चुनावी कार्यालय बनाया . इसके इलावा सुबह 6 बजे से ही उसके घर पर चहल - पहल शुरू हो जाती थी.दुकान के बाहर एक टैंट लगा दिया गया था और उसके अन्दर बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की थी.टैंट के चारो तरफ बड़े- बड़े चुनावी बैनर और पोस्टर लगा दिए गए जिन पर उसका नाम और चुनावी चिन्ह कुर्सी बना होता . चुनावी प्रचार के दौरान सबको चुनाव चिन्ह वाली टोपियाँ , बैच- बिल्ले , झंडे आदि पकड़ा दिए जाते. आयशा के लिए यह सब एक दम नया था फिर भी उसे सब कुछ बहुत अच्छा लगता . सारे चुनावी प्रचार के सामान आदि की व्यवस्था उसके भाई ने बहुत खूबी से की थी. यहाँ तक कि उसके भाई के दोस्त भी दूर - दूर से चुनाव प्रचार के साजो- सामान के साथ वहाँ पहुँच गए. उसके घर पर तीनो समय के खाने के लिए कूक बिठा दिए गए थे . सारा दिन आने- जाने वालो के लिए खाना - पीना चलता रहता . कुछ आते- जाते लोग बीच- बीच में वहाँ टैंट में आकर बैठ जाते. या जब आयशा अपनी सहेलियों और समर्थकों के साथ अलग- अलग गली - मोहल्लों का दौरा करके लौटती तो कुछ देर के लिए सब टैंट में आकर अपने- अपने विचार देते नजर आते . टैंट में सबके लिए उसके भाई ने चाय- पानी की व्यवस्था पहले से करके रखी होती .आयशा को किसी भी इंतजाम की कोई जानकारी नहीं होती, उसका काम तो बस लोगों के आगे हर समय हाथ जोड़कर अपना सर झुकाए रखने का होता . उसके चुनावी मैनीफैस्टो तैयार करने का जिम्मा उसके पति जो कि एक अखबार में काम करते थे उन्होंने ले लिया। कुल मिलाकर जिस किसी को भी आयशा के चुनाव लड़ने का पता चलता वो रोमांचित हो कर उसके घर साथ देने के लिए इकट्ठा होने लगा . यहाँ तक कि उसके पति के मौसेरे भाई- बहन आदि सब लोग और उनके परिवार भी चुनाव में सहयोग देने दूर - दूर से उसके घर पहुँच गए . सबके लिए चुनाव लड़ना एक बहुत ही नई बात थी . आयशा के दोनों तरफ के सभी रिश्तेदार उसकी काबलियत से भली- भांति परिचित थे और सभी उसका बहुत सम्मान भी करते थे.

आयशा के लिखित मैनीफैस्टो को पढ़कर कोई भी प्रभावित हुए बिना ना रहता . उसके मैनीफैस्टो में आयशा ने अपने वार्ड के लिए किए जाने वाले विकास के कार्यों का ब्यौरा , उसकी पढ़ाई- लिखाई का पूरा विवरण और आज तक जो उसने लोगों के लिए काम किए सबका विस्तार विवरण दिया हुआ था .आयशा को लोगों का भरपूर सहयोग मिल रहा था . यह देख कर आयशा को उम्मीद बंधने लगी कि उसकी मेहनत जरूर रंग लाएगी और उसको अपने जीवन में कुछ कर दिखाने का मौका जरूर मिलेगा .

उनके देखा- देखी अन्य उम्मीदवारों द्वारा भी मार्किट में अपने टैंट गाड कर चुनावी कार्यालय बनाए जाने लगे . उनकी देखा - देखी प्रतिस्पर्दा में सबने अपना चुनाव प्रचार तेज कर दिया .

आयशा आखिरकार किले के मुख्य द्वार पर पहुँच गई जो कि बहुत ही सुन्दर लग रहा था . किले की दीवारों पर बहुत सुन्दर मीनाकारी की हुई थी जो कि उसकी उत्सुकता को और बढ़ा रही थी. वह जल्द से जल्द किले के अन्दर जाकर किले के रहस्य को जान लेना चाहती थी . कभी उसे किले के मकड़-जाल याद आते तो कभी भूतहे किले के बारे में सोचकर डर लगने लगता । कभी वह रहस्यमयी किले में छुपे खजाने के बारे में सोचने लगती तो कभी वह पिरामिड में दफन की हुई ममियों में बारे में सोचकर विचलित हो उठती थी ।

पूरा दिन कैसे बीतता आयशा को पता नहीं चलता . हर एक वोटर से निजी तौर पर संपर्क साधने की पूरी कौशिश की गई . अपनी तरफ से वो कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे . पूरे दस दिन आयशा दिन भर एक टांग पर खड़ी होती और इस तरह कब रात के बारह बज जाते पता ही नहीं चलता और सुबह पाँच बजे फिर से अगली रणनीति के बारे में विचार किया जाता .जैसे- जैसे चुनाव का दिन नजदीक आने लगा वैसे- वैसे हर कोई वोटरों को लुभाने के लिए तरह- तरह के हथ कंडे अपनाने लगा . ओ. पी. चोपड़ा   के गुट ने तो हर जगह खाने- पीने और शराब के खुले आम स्टाल लगा रखे थे . ओ. पी.  ने पिछले पाँच वर्षों के अपने म्युनिसिपल कोंसिल के प्रधान होने के दौरान अपनी पावर का भरपूर फायदा उठाया था और दोनों हाथों से खूब पैसा और शौहरत बटोरे थे जिसे चुनावों में इस्तेमाल करने में भी उसे बिल्कुल गुरेज नहीं था . इसलिए वह पैसा भी दोनों हाथों से लुटा रहा था .

एक दिन आयशा अपनी सहेलियों के साथ अपने चुनाव का प्रचार कर रही थी तब उन्हें पता चला कि एक बड़े से घर में ओ. पी.  चोपड़ा   के ग्रुप ने काफी जाली वोटे बना रखी हैं . उसकी खबर उन्होंने प्रैस में भी दी परन्तु अब समय बीत चुका था क्योंकि चुनाव का दिन काफी करीब आ गया था . ओ. पी. चोपड़ा   ग्रुप ने अपने अनुभव के कारण चुनावों में हर तरह का दांव- पेंच इस्तेमाल किया हुआ था और इस बात का उन्हें कोई डर नहीं था . क्योंकि उनके गुट ने गुंडों की अच्छी खासी टोली भी भर्ती कर रखी थी.

आखिरकार इन्तजार की घड़ियाँ ख़त्म हो गई . चुनाव के दिन सुबह 8 बजे से ही वोटिंग शुरू हो गई . आयशा का दिल बहुत जोर से धड़क रहा था . उसके मन में कई तरह के विचार आ जा रहे थे . वोट डालने के लिए लोग धीरे- धीरे कर बूथ पर पहुँचने लगे . लोगों के हाव- भाव से कभी तो आयशा अपनी जीत को लेकर बिल्कुल आश्वस्त हो जाती और कभी डर और नकारात्मक सोच मन को घेर लेते . वोटरों को घरों से लाने के लिए अपनी तरफ से हर किसी ने गाड़ियों का इंतजाम किया हुआ था . ओ. पी. चोपड़ा ग्रुप ने तो वोटरों को रिझाने के लिए खुले लंगर की व्यवस्था की हुई थी . वोटिंग बूथ पर अपनी तरफ से आखिरी प्रयास करते हुए आयशा एक टांग पर दिन भर खड़ी रही , जैसे ही शाम पाँच बजे वोटिंग ख़त्म हुई तो आयशा को लगने लगा कि वह अभी वहाँ गिर जाएगी . उसमे चुनाव के परिणाम को सबके सामने झेलने की भी हिम्मत नहीं थी क्योंकि ओ. पी. गुट के लोगों के हौंसले उसे ज्यादा ही बुलंद लग रहे थे इसलिए वह जल्द ही अपने घर पहुँच गई . चूँकि इलैक्ट्रोनिक वोटिंग के कारण परिणाम साथ- साथ ही घोषित किया जाना था . कुछ ही देर में चुनाव परिणाम आ गया और वही हुआ जिसका आयशा को डर था , ओ. पी.चोपड़ा   गुट की प्यारे लाल की अस्सी साल की माँ चुनाव जीत गई थी . सब जगह यह खबर आग की तरह फ़ैल गई कि कुल 15 वार्डों में से 12 वार्डों में ओ. पी चोपड़ा .   ग्रुप के प्रत्याशी विजयी हुए हैं . उसकी पार्टी के सिर्फ तीन उम्मीदवार ही विजयी हुए थे. यह देखकर सभी को बहुत ही हैरानी हो रही थी कि क्षेत्र के विधायक महोदय जो कि लगातार कई वर्षों से वहाँ से विजयी होते थे वह भी अपने प्रत्याशियों को जिता नहीं पाए . विधायक महोदय को भी इन चुनावी परिणामों से करारा झटका लगा था .सब तरफ ओ. पी. चोपड़ा    गुट के लोग ही ढोल- बाजों की ताल पर नाचते- गाते और लड्डू बांटते नजर आ रहे थे.

आयशा को अब समझ आ गया था कि चुनाव लड़ना कोई खाला जी का घर नहीं है . यह कोई उसके स्नातक की परीक्षा नहीं कि जितना जिस उम्मीदवार ने लिखा होगा उसको उतने ही अंक मिलेंगे. उसे ना तो किसी तरह के चुनावी हथकन्डो की जानकारी थी . बाद में लोगों से सुनने में आया कि ओ. पी. शर्मा गुट ने चुनावों में सभी हथकन्डो का भरपूर उपयोग किया था और उनको चुनाव परिणाम के बारे में पहले से ही पता था . उन्होंने ना सिर्फ सभी चुनाव अधिकारी खरीद रखे थे बल्कि हर वार्ड में बहुत से जाली वोट भी बना रखे थे .आयशा को अपनी भूल का अहसास होने लगा कि चुनाव लड़ना शराफत का काम नहीं है.. यह कोई पढ़े- लिखे लोगों का काम नहीं यह तो गुंडे बदमाशों का गेम है। रहा- सहा सारा सपना उसे ध्वसत होते नजर आने लगा । भाई ,सगे-संबंधियों तथा मित्रों द्वारा तन ,मन और धन से उस पर किए गए अहसान रह- रहकर उसे भीतर से तोड़ रहे थे । उसे अपनी भूल का अहसास होने लगा कि क्या जरूरत थी उसे चुनाव में खड़े होने की ! क्यों उसने विधायक के दिए गए प्रलोभन में अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी ?

अपनी खून-पसीने की कमाई को भी उसने एक ही झटके में पानी की तरह बहा दिया । क्या होगा उसके बच्चों और परिवार का ? रह रहकर उसे अपने मध्यम-वर्गीय माँ-पिताजी के बेबस चेहरे आँखों के सामने नजर आने लगे ।

.आयशा ने किले में जैसे ही प्रवेश किया तो वहाँ का नजारा देखकर उसके रौंगटे खड़े हो गए.

किला बाहर से जितना खूबसूरत प्रतीत हो रहा था अन्दर से उतना ही भयावह दिखाई दे रहा था . किले के सारी दीवारे कोयले की तरह काली हो रखी थी. सारी मूर्तियाँ और मीनाकारी जल कर राख की तरह प्रतीत हो रही थी. कहते हैं एक बार दुश्मन की सेना ने जब किले को चारों और से घेर लिया तो उस समय किले में राजा के साथ उसकी रानी और उसकी कई दासियाँ भी थी . रानी की इज्जत बचाने के लिए राजा को बच कर निकालने का जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो उसने अपने आप को दुश्मन के हवाले करने के बजाय पूरे किले को आग लगा दी और इस तरह पूरा किला अन्दर से जल कर राख हो गया . जब दुश्मन की सेना ने किले के दरवाजे को तोड़ा तो इतना भयानक नजारा देखकर उलटे पैर लौट गए.
एक तरफ तो आयशा के मन में राजा के लिए सम्मान भाव उत्पन्न हो रहे थे साथ ही साथ उसकी कायरता का अहसास भी हो रहा था .

किले का भयावह नजारा देखने के बाद किले के साथ- साथ उसके दिल में अभी भी अग्नि –विभीषिका का प्रचंड ज़ोरों पर था । आयशा खुद उस आग में कूदकर रानी पदमिनी की तरह जौहर करना चाहती थी । उसने एक कदम आगे बढ़ाया तो उसे अपने छोटे –छोटे रोते- बिलखते बच्चों के चेहरे नजरों के सामने तैरने लगे । “ माँ, माँ ,मत कूदो आग में। ”

मानो जैसे किसी ने उसके पैरों में आगे बढ़ने से रोकने के लिए जंजीर लगा दी हो । उसे लगने लगा देखते- देखते उसकी सारी दुनिया स्वाहा हो गई हो । सारे सपने उसमे आहुति बनकर भस्म हो गए हो ।

Wednesday 5 October 2011

मै तो राधा बन गई पर तुम बन ना पाए श्याम

मै तो राधा बन गई
पर तुम बन ना पाए श्याम

महफ़िल में होता रहा कौरवों के हाथों चीरहरण
तब किस वृक्ष, किस आश्रय की लेती शरण ?
तुम मूक आँखों से देखते रहे मेरा मरण
मै तो राधा बन गई
पर तुम बन ना पाए श्याम

वक्त के चलते जो जिल्लत सही
जिसकी कहानी कई बार तुमको कही
सुनकर हृदय तुम्हारा भीगता रहा
फिर दिए घाव आज तुमने भी वही
मै तो राधा बन गई
पर तुम बन ना पाए श्याम

मै मीरा बन भटकती रही डगर- डगर
राणा के हाथों पीती रही विष का कहर
नस- नस में लहू दौड़ने लगा बनके जहर
मै तो राधा बन गई
पर तुम बन ना पाए श्याम

तुम रुक्मणी के संसार में रमते रहे
मुझे होनी के हाथों रुसवा करवाते रहे
नीर से भीगा मेरा संदेशा जल कर भस्म हो गया
मै तो राधा बन गई
पर तुम बन ना पाए श्याम

मेरा तकिया रात के तूफानों में भीगता रहा
बादलों का दिल भी मेरे साथ पसीजता रहा
पर तुम गोवर्धन पर्वत लेकर ना आए
मै तो राधा बन गई
पर तुम बन ना पाए श्याम

"जल रही एक दीवाली "

"जल रही एक दीवाली "

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
पुरुष के पुरुषत्व की दीवाली
सीता का सतीत्व हो रहा नष्ट
आदमी में पनप रहा रावण भ्रष्ट

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
औरत के अहम् की दीवाली
सदियों से बलि परम्पराओं की रस्म
जिस्म की आबरू हो रही भस्म

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
इंसान की संवेदनाओं की दीवाली
भाई- भाई का काट रहा हाथ
मूल्यों की इंसानियत हो रही राख

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
हाहाकार , चीत्कारों की दीवाली
आतंकवाद के विस्फोट का पटाखा
मानवता को दे रहा है झटका

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
गरीब की रोटी की दीवाली
कभी ना मिटने वाली पेट की भूख
भ्रष्टाचार से धरती की कोख रही सूख

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
जाति, रंग, धर्म की दीवाली
राजनेता देश को रहा लूट
जनता में डाल भेदभाव की फूट

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
धन- दौलत, ऐश्वर्य की दीवाली
रिश्ते- नाते रह गए पैसों की माया
अपनत्व रह गया दिखावे की काया

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
मा की ममता की दीवाली
नशे के धूएँ में युवा है ध्वस्त
भविष्य के सपने हो रहे पस्त

जल रही मेरे भीतर भी एक दीवाली
चमकते सौंदर्य की दीवाली
दोस्ती- प्यार भी देखे खूबसूरत तन
कोई ना परखे शुद्द , पाक मन

" अहिल्या "




" अहिल्या "

कल जब मै तुम्हारे घर की तरफ आई

तो खुले देखे सब दरवाजे और खिड़की

मेरे अंतर्मन में हजारों पुष्प खिल गए

पर देखते-देखते दरवाजे बंद हो गए

यह देख मेरी रूह गहराई तक काँप गई

खुश्क आहों में मैं थर्रथर्राती रही

दर्द से बिलखकर सुबकती रही

गिड़गिडाकर इन्तजार करती रही

बाहर खड़ी दरवाजा खुलने का

पर कोई दरवाजा नहीं खुला


मै बहुत देर तक बाहर सामने की रेलिंग पर बैठी सोचती रही

शायद समय देखकर तुम आओगे

मुझे उठाओगे, अपने सीने से लगाओगे

पर तुम नहीं आए

मै वहीँ नीचे घास पर बैठे- बैठे सोती रही

सारी रात तुम्हारी राह देखती रही


आसमान मेरे आँसुओं का गवाह था

वो भी मेरे साथ पानी बरसा रहा था

धरती का आँचल भी मेरे साथ भीग रहा था

पास में बैंच के नीचे एक कुत्ता भी

बीच- बीच में अपनी नजर उठा लेता था

पेड़- पौधों की हालत भी मेरे जैसी थी

दूर एक गाय शायद प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी

हम सब मिलकर एक दूसरे का दुःख बाँट रहे थे


कई राह चलते मुझ पर बेचारी सी नजर डाल कर आगे बढ़ गए

जैसे ठंडी हवाएँ मेरे तन को छूकर जाती रही

मै हमेशा की तरह बारिश के तूफ़ान में भीगती रही

पर वहाँ कोई नहीं था मेरे आंसू पोंछने वाला

जब भी अँधेरे में कोई आकृति नजर आती

कि शायद तुम आए होंगे मै उठ कर बैठ जाती

फिर अपना वहम समझ कर वहीँ लेट जाती

मुझे पहली बार उस अँधेरी भयानक रात से भी डर नहीं लगा


सुबह होते -होते आसमान भी बरस कर थक गया

पेड़- पौधे का अक्स भी उजली किरण में खिल गया

धरती की प्यास भी बुझ गई

कुत्ते को कहीं से एक हड्डी मिल गई

बछड़ा अपनी माँ का दूध पीने लगा

परन्तु मेरे नैनों का नीर कहाँ सूखने लगा?


फिर मै भी मुक्त हो गई

मेरी रूह आँसुओं के सैलाब में विलीन हो गई

पीछे छोड़ गई एक बेजान पत्थर का बुत

जो अहिल्या की तरह आज तक

किसी राम के आने का इन्तजार कर रहा है

पर कलयुग में कोई राम हो सकता है ?




"दिहाड़ीदार मजदूर"


"दिहाड़ीदार मजदूर"

दिहाड़ीदार मजदूर दिन भर काम करता है
रातों को थककर चूर आराम करता है

पेट की खातिर कभी ऊंचे पेड़ पर चढ़ता है
तो कभी पेड़ को अपने काँधे पर चढ़ाता है

बिस्तर नहीं तो धरती के सीने पर सोता है
आसमान तले रातों में तारे गिनता है

हर दिन काम करता तो अगले दिन पेट भरता है
सोते हुए गाड़ियों का शोर कहाँ सुन पाता है

बेफिक्र हो कर नींदों में कल के सपने बुनता है
हर महीने की पहली को घर मनीआर्डर करता है

सरकारें अपने महलों में सबसे बेखबर सोती हैं
क्या पता किसे कल का सूरज नसीब होता है ?


ना जाने कब कोई रईस जादा नशे में धुत्त बेरहमी से
सड़क किनारे सोते गरीब को पैरों तले कुचलता है

मनीआर्डर की जगह घर पर पहली को तार पहुँचता है
आँगन का पौधा क्यों पतझड़ के तूफ़ान में उजड़ता है ?

Tuesday 6 September 2011

तुम कहते हो.................



मेरी रातें तुम बिन वीरान !

तुम कहते हो तुम सिर्फ मेरे हो..........
फिर क्यों हर सावन मेरे नैनों से बरसता है ?
फिर क्यों तुम्हारा अक्स मेरे होंठों पे थिरकता है ?

मेरी शामें तुम बिन सुनसान !

तुम कहते हो मै तुम्हारी मंजिल हूँ ..........
फिर क्यों नहीं तुम्हारा रास्ता मुझ तक पहुँचता है ?
फिर क्यों नहीं तुम्हारा रूप मेरी बाहों तक पहुँचता है ?

मेरी आहें तुम बिन अनजान !

तुम कहते हो मै तुम्हारी आत्मा हूँ ..........
फिर क्यों मेरा साया परछाई बिन भटकता है ?
फिर क्यों मेरा चेहरा दीवारों के पलस्तर से लिपटता है ?

मेरी साँसें तुम बिन शमशान !

तुम कहते हो हमारा प्यार अमर है ...........
फिर क्यों मेरा ख्याल रेगिस्तान में विचरता है ?
फिर क्यों सपनों में विकृत भयावह बीयाबान टकरता है ?

मेरी आँखें तुम बिन बेजान !

तुम कहते हो हम एक रूह हैं .............
फिर क्यों मेरा मन खंडहर की तरह मचलता है ?
फिर क्यों मेरा बदन सूखे तने की तरह दहलता है ?

Tuesday 30 August 2011

सदमा

विदुषी दौड़ कर विमल के घर गई और दरवाजा पीटते हुए जोर- जोर से चिल्लाने लगी , ' भाई साहब ! भाई साहब ! दरवाजा खोलिए जल्दी , विक्रांत .....देखिए ना आकर !"
विमल अभी कुछ समय पहले ही अपनी एम्. बी . ए . की परीक्षा देकर दिल्ली से लौटा था .
विमल विदुषी की आवाज सुनकर अचंभित हो गया और दरवाजा खोला तो देखा वह बहुत ही घबराई और बहुत ही अस्त- व्यस्त हालत में थी
" क्या हुआ भाभी जी, इतना घबराई हुई क्यों है ? क्या हुआ विक्रांत को ? "
" भाई साहब, जल्दी चलिए मेरे साथ, विक्रांत एक पतला सा तार गले में डाल कर आत्महत्या करना चाहता है . मेरे लाख मना करने पर भी उन पर कोई असर नहीं है "

" मगर क्यों ? ऐसा क्या हो गया ! जो वह यह पागल पन करना चाहता है " ऐसा कह कर वह अपने क्वार्टर का दरवाजा बंद कर जल्दी से विदुषी के पीछे- पीछे हो लिया . विक्रांत का क्वार्टर विमल के क्वार्टर के ठीक सामने पार्क के दूसरी तरफ था .

विक्रांत के घर के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी परन्तु कोई भी अन्दर जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था .विमल को आता देखकर सब इधर- उधर हो गए . विमल विक्रांत का सबसे ख़ास मित्र था . जबसे उसने नौकरी ज्वाइन की थी तब से लेकर विमल ने हर सुख- दुःख में विक्रांत का साथ दिया था . दोनों की विचारधारा काफी मेल खाती थी इसलिए देखते- देखते वे दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए थे . विक्रांत ने बनारस हिन्दू युनिवर्सीटी से इंजीनीयरिंग की डिग्री हासिल की थी और विमल ने दिल्ली से इंजीनीयरिंग की थी . दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे इसलिए ज्यादातर एक साथ ही रहते थे परन्तु दोनों के स्वभाव में ख़ास तौर पर एक बड़ा फर्क था .जहाँ विक्रांत अंतर्मुखी था वहीँ विमल काफी मिलनसार और हंसमुख स्वभाव का था .विक्रांत को हमेशा एकांत में रहना पसंद था जबकि विमल हर समय लोगों से घिरा रहता था . विक्रांत का बचपन बहुत तंगी ओर अभाव में बीता था इसलिए उसे शुरू से ही एक एक पैसा देख कर खर्चने की आदत थी . जहाँ भी उसको पैसे बचाने का एक भी मौका मिलता तो विक्रांत वह मौका बिल्कुल ना चूकता .उसकी इस आदत से उसके सब दोस्त ओर आफ़िस के लोग वाकिफ थे ओर इसी कारण वह सबके बीच हँसी का पात्र ओर चर्चा का विषय बना रहता . जब कुछ लोग कहीं पर इकट्ठे बैठ कर चाय पी रहे होते तो एक दूसरे से मजाक में जरुर कहते कि सब जल्दी- जल्दी चाय पी लो वरना मुफ्त की चाय पीने ना जाने कब विक्रांत टपक पड़ेगा .

विमल जब विक्रांत के घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी आँखें एक दम से लाल हो रही थी . ऐसा लग रहा था जैसे वह कई दिनों से सोया ना हो और वह आपे से बाहर हो रहा था .चेहरा उसका फूला हुआ लग रहा था ,बाल बिखरे हुए थे , हल्की - हल्की दाढ़ी उसके चेहरे को गंभीर बना रही थी . उसने बनियान और बरमूडा पहना हुआ था और उसके हाथ में चार- पाँच मीटर लम्बा तार था . घर का सारा सामान इधर- उधर बिखरा हुआ था , कहीं कपड़े फैले हुए थे तो कहीं बर्तन पड़े हुए थे जैसे अभी- अभी कोई भूचाल आया हो . हमेशा सलीके से रहने वाले साफ़ सुथरे विक्रांत की ऐसी हालत देखकर विमल कुछ समझ नहीं पाया . विमल को सामने आता देखकर विक्रांत ने तार को अपने गले के चारों ओर लपेटना शुरू कर दिया और चिल्लाने लगा , " चले जाओ यहाँ से वरना मै ये तार खींच लूँगा "
विमल ने परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए थोड़े शांत लहजे में कहा , " अरे- अरे विक्रांत, ये क्या मूर्खो वाली हरकत कर रहे हो ? "
" कुछ नहीं बस तुम यहाँ से चले जाओ , मै मरना चाहता हूँ और जीना नहीं चाहता "
कहते- कहते विक्रांत एक दम से फूट- फूट कर रोने लगा . और नीचे कुर्सी पर बैठ गया . विमल उसको थोड़ा शांत होते देख धीरे- धीरे उसके पास पहुंचा और आराम से उसके हाथ से तार ले लिया और उसे विदुषी को पकडाते हुए कहने लगा , " भाभी जी ,ये लीजिये तार और इसे फैंक दीजिये . अब मै और विक्रांत आराम से बैठकर खूब सारी बातें करेंगे "
विक्रांत विमल से आँखें नहीं मिला पा रहा था और गर्दन नीचे झुकाए- झुकाए एक छोटे बच्चे की तरह बोलने लगा , " विमल, तुम्हे नहीं पता कि तुम यहाँ नहीं थे तो उन लोगों ने मेरा कितना मजाक उड़ाया " कहते हुए वह फिर सिसकने लगा
" मतलब .....? " प्रश्नवाची निगाहों से विमल ने पूछा
" तुम्हे पता ही है ना कि कल मेरी शादी की सालगिरह थी इसलिए मैंने दफ्तर और आसपास के कुछ लोगों को चाय- पानी के लिए घर पर बुलाया था .मगर उन लोगों ने मेरे साथ इतना भद्दा मजाक ................! " कहते- कहते वह जोर- जोर से फिर रोने लगा .
विक्रांत को सांत्वना देते हुए बात को आगे बढ़ाने के लहजे से विमल ने पूछा , " उन लोगों ने ऐसा क्या किया कि तुम अपनी जान लेने को आमादा हो गए "
" सालगिरह के लिए जो गिफ्ट वो लोग पैक करके लाए थे उसमे टूटे- फूटे गिलास , घर का पुराना सामान ,और कुछ ने तो कोंडम के पैकट तक पैक किए हुए थे ." ऐसा कहते ही वह सिसकते- सिसकते फिर से पास पड़ी चद्दर से अपने गले में फंदा डाल कर कसने लगा .
इस बार विमल को गुस्सा आया और उसने विक्रांत की आँखें खोलने के लिहाज से जोर से उसके मुँह पर थप्पड़ दे मारा और उसको डाँटते हुए जोर से बोला , " कैसे बुजदिल इंसान हो तुम ? बार- बार मरने के बारे में सोच रहे हो . क्या तुम्हे मेरी दोस्ती और भाभी के प्यार का जरा भी ख्याल नहीं है ? "
इस पर शांत होने की बजाय विक्रांत की आँखें और भी लाल हो गई और ज्यादा उग्र होते हुए अपने आपे से बाहर होते हुए कहने लगा , " जाओ मेरे घर से बाहर निकल जाओ और अपनी एक मूंछ काट लो और एक मै अपनी काट लेता हूँ "

कहते- कहते वह जोर- जोर से रोने लगा और पागलों की तरह इधर- उधर घूमने लगा . विमल अभी तक विक्रांत की मानसिक हालत को ठीक से समझ नहीं पा रहा था . वह बुरी तरह से अभी तक अवसाद की हालत में था . कभी- कभी मजाक में जोर- जोर से बोलता , " तुम्हे पता है मुझे दहेज़ में खूब सारा सामान मिला है मगर तुम्हारी भाभी के लिए वह किसी भी काम का नहीं है . यहाँ लाकर उस सामान को क्या करता इसलिए अपने पुश्तैनी घर में अपने माता- पिता के पास रख दिया है .तुम्हारी भाभी इस वजह से मुझे खूब बुरा भला भी कहती है तो तुम ही बताओ कि क्या सामान को संभाल कर रख कर मैंने कोई ग़लती की है "
.विमल इस पर उसे समझाता था कि उसने कोई ग़लती नहीं की है . वह सब कुछ भाभी का ही तो है वह जब चाहे वहाँ से ले आए . उल्टा उनका सामन वहाँ ज्यादा सुरक्षित है . पर वह मन ही मन सोचता था कि विक्रांत बेशक दिल का बुरा नहीं है परन्तु आजकल के हिसाब से देखा जाए तो विक्रांत की पत्नी उसके स्वभाव के कारण जरूर दुखी रहती होगी और दूसरी तरफ विदुषी भाभी की वजह से विक्रांत परेशान रहता होगा क्योंकि विदुषी बहुत बड़े घर की लड़की है ओर जैसे माहौल से वह आई है वैसा माहौल उसे इस कंपनी में कहाँ मिल पा रहा होगा . इसी कारण वह विक्रांत को कभी- कभी कुछ चुभने वाली बाते कह देती होगी जिससे उसका मानसिक संतुलन दिन पर दिन बिगड़ता जा रहा है . विक्रांत की ऐसी हालत देखकर विमल जल्दी से अपने घर गया और वहाँ से उसने डाक्टर को फोन किया , " डाक्टर साहिब, जल्दी आएँ विक्रांत की तबीयत बहुत खराब है " और इस तरह विमल ने एक ही सांस में विक्रांत की हालत का सारा किस्सा डाक्टर को सुना दिया .
थोड़ी देर में उनकी कंपनी के डाक्टर विक्रांत के क्वार्टर पर पहुँच गए , तब वहाँ लोगों का मजमा लगा हुआ था . सब लोग उसकी पागलों वाली हरकतों को बड़ी हैरानी से देख रहे थे. विक्रांत को उस समय सारी दुनिया दुश्मन की तरह नजर आ रही थी परन्तु लोगों को तो जैसे वो सब एक तमाशा लग रहा था और देखने में मजा आ रहा था . डाक्टर भी एक बार तो हैरान हो गए विक्रांत की हालत देखकर , फिर विमल ने कुछ लोगों की मदद से बड़ी मुश्किल से विक्रांत को काबू किया और डाक्टर ने उसे नींद का इंजेक्शन दिया और कहने लगे , " अब घबराने की कोई बात नहीं है , नींद के इंजेक्शन से ये अब आराम से कुछ देर सो जाएगा परन्तु उठने के बाद फिर से पागलों वाली हरकतें ना करे इसलिए बड़ी समझ के साथ इसके साथ पेश आना पड़ेगा . इस बिमारी को मेडिकल साइंस में स्किजोफ्रेनिया कहते हैं ."

विमल ने सारी परिस्थिति को अच्छे से समझने के लिए डाक्टर से सवाल किया , " डाक्टर साहिब इस बिमारी के और क्या लक्षण है और इसकी क्या वजह होती है "
" इस बिमारी में मरीज सारी दुनिया को अपना दुश्मन समझने लगता है और इसलिए मरीज को बहुत ही प्यार , सहानुभूति और अपनेपन की जरूरत होती है . मरीज के दिल को गहरी ठेस पहुँची है इसलिए वह अवसाद की उस हालत में पहुँच गया है जहाँ पर उसका अपने दिल - दिमाग पर कोई नियंत्रण नहीं रहा "

कुछ देर बाद विक्रांत जब गहरी नींद सो गया तो विमल ने हालात की नाजुकता को समझते हुए विदुषी से कहा , " भाभी जी , अभी भी कुछ यकीन से कहा नहीं जा सकता इसलिए आप जल्द से जल्द विक्रांत के घर वालों को बुला लीजिये तांकि आपको अकेले परेशानी ना झेलने पड़े और हो सकता है विक्रांत के माता- पिता के आने पर उसकी हालत कुछ सुधर जाए और वह सब बातें भूल जाए " यह कहते- कहते विमल विदुषी से जाने की इजाजत लेकर विक्रांत के क्वार्टर से बाहर निकल गया .

शाम के समय जब विमल अपने घर के बाहर घूम रहा था तो उसने देखा कि उसके कुछ आफ़िस के मित्र उसकी तरफ ही आ रहे थे .सभी के चेहरे मुरझाए हुए और अपराध बोध से ग्रस्त थे . विमल ने उनसे पूछा , " क्या आप लोग ही कल विक्रांत के घर पर उसकी पार्टी में गए थे. क्या आप लोगों को विक्रांत की मानसिक हालत के बारे में कुछ भी जानकारी है ? "

उनमे से एक ने उत्तर दिया , " हाँ, हम सब कल शाम उसके घर पर थे . अभी- अभी मालूम चला कि उसे स्किजोफ्रेनिया का अटैक हुआ है. परन्तु हम लोगों का उसको परेशान करने का कोई इरादा नहीं था .मगर तुम भी तो उसकी आदत से अच्छे से वाकिफ हो कि वह कितना कंजूस है . पहली सालगिरह पर भी सिर्फ चाय , नमकीन और बिस्कुट खिलाना चाहता था . यह बात हमे पहले ही पता चल गई थी . इसलिए जैसे को तैसा सबक सिखाने के लिए हमने भी घर में उपयोग में लाया हुआ बेकार सामान उसे पैक करके दे दिया . "

इस पर एक दूसरे मित्र ने उसकी बात पर हामी भरते हुए , ' अरे, इसमें हमने कौन सा कोई गुनाह कर दिया जो सब लोग बात को इतना बड़ा रहे हैं . . कोई अपने घर सालगिरह के मौके पर भी ऐसे बुला कर बेइज्जत करता है क्या ? . चाय बिस्कुट तो हम हर रोज अपने घर में भी तो खाते है. खुद तो विक्रांत हर समय दूसरों से चाय आदि पीने की ताक में रहता है ओर अपना एक रूपया भी खर्चना पड़े तो उसकी जान निकल जाती है "

विमल पहले तो चुप- चाप उनकी बातें ध्यान से सुनता रहा फिर क्रोध में आकर बोला , " किसी के स्वभाव के कारण इस तरह उसका मजाक उडाना क्या अच्छी बात है? .पुराना सामान तक तो ठीक है परन्तु कोंडम पैक करके देना कितनी शर्मनाक बात है . क्या आप सबके संस्कार यही कहते है ? . अगर आप लोगों को चाय बिस्कुट नहीं खाने थे तो सालगिरह पर मत जाते कोई आपको किसी ने जबरदस्ती थोड़ा की थी . परन्तु इस तरह का बेहूदा मजाक करके किसी के दिल को ठेस पहुँचाना कहाँ की समझदारी है . विक्रांत ने आप लोगों की हरकत से खुद को अपनी पत्नी के आगे इतना अपमानित महसूस किया कि वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो गया . अगर उसको कुछ हो जाता तो क्या आप लोग गुनाहगार ना होते और क्या खुद को आप लोग माफ़ कर पाते ? .चलो अब जो हुआ सो हुआ अगर आप लोगों को अपने किए पर जरा भी पछतावा है तो चल कर विक्रांत से माफ़ी माँग लो . वह कंजूस बेशक हो परन्तु बहुत ही भोला है इसलिए जरूर आप लोगों को माफ़ कर देगा "

सभी को विमल की बात सही लगी और वे सब विक्रांत के घर गए और उससे माफ़ी माँग कर और अपनी भूल स्वीकार कर भविष्य में कभी भी ऐसा मजाक किसी के साथ भी ना करने की ठान कर अपने- अपने घर को चले गए.

परन्तु अभी भी विक्रांत की मानसिक अवस्था सामान्य नहीं हुई थी . दूसरे दिन ही उसके घर वाले आ गए और उसे जब गाड़ी में बिठाकर घर ले जाने लगे तो वह गाड़ी से कूद पड़ा और उसे बहुत गंभीर चोटें आई . फिर उसके घर वाले उसके हाथ पैर बाँध कर उसे बनारस के बड़े अस्पताल में ले गए जहाँ पर कई महीने तक उसका इलाज चला . परन्तु इतने इलाज के बावजूद भी वह कभी फफक कर रोने लगता और कभी एकांत में बैठा शून्य में देखता रहता .उस घटना के बाद उसे इतना गहरा सदमा लगा था कि उसे सारी दुनिया उसकी शत्रु लगने लगी .बचपन से ही वह बहुत सादे माहौल में रहा था उसका घर बहुत ही पुराना था जैसे पहले समय में गाँव में कच्चे घर हुआ करते थे , जहाँ पर कहीं- कहीं मकड़ियों के जाले लगे होते है तो कहीं- कहीं मेंढकों के टर्र- टर्र की आवाज सुनाई दे रही होती है और कच्ची जगह से अक्सर सांप , बिच्छू आदि निकल आते थे परन्तु विक्रांत को इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता था . जीओ और जीने दो की धारणा में वह विश्वास करता था. दुनिया के हर प्राणी से वह प्यार करता था और बाहरी चका- चौंध से काफी दूर था .इसलिए अब उस हादसे के बाद वह अपनी दुनिया में ही खोया रहता , ना किसी से बात करता ना किसी से मिलना पसंद करता और अकेले में अपने आप से ही बातें करते रहता ,जिसे हम दुनिया वाले पागल की संज्ञा दे देते हैं .


Saturday 7 May 2011

"औरत होने का दर्द "



"औरत होने का दर्द "


औरत होने का दर्द कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी माँ, कभी बीवी बनकर बलि की देवी बनती है
नौ महीने गर्भ के बीज को पल- पल खून से सींचती है
नव कोपल के फूटने के लम्बे इन्तजार को झेलती है
कौन आगे बढकर प्यार से माथे का पसीना पौंछता है ?
नवजीव के खिलने के असहनीय दर्द को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !


माँ बनकर अपने जिगर के टुकड़े को हर दिन बढ़ते देखती है
कभी प्यार से तो, कभी डांट से पुचकारती है
खुद भूखा रहकर भी हर एक का पेट भरती है
कभी रात का बचा भात तो ,कभी दिन की बची रोटी रात में खाती है
इस बलिदान को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी पति, कभी बच्चों की दूरी को कम करते पिस जाती है
बच्चें लायक हो तो पिता का सीना गर्व से फूलता है
परीक्षा में कम निकले तो हर कोई माता को कोसता है
हम सफ़र के माथे की हर शिकन को तुरंत भांप लेती है
इस ममता को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी बेटी, कभी बहन बनकर सब सह जाती है
कभी बाप , कभी भाई के गुस्से में भी मुस्कुराती है
मायके में बचपन के आँगन का हर कर्ज चुकाती है
अपने हर गम, हर दुःख में भी सबका गम भुलाती है
इस दुलार को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !

कभी प्रेमिका बनकर, कभी दोस्ती के नाम पर छली जाती है
खुद गुस्सा होकर भी अपने प्रेमी को हर पल मनाती है
प्रेमी के मन की हर बात बिन कहे समझ जाती है
अपना हर आंसू उससे छुपा लेती है
कभी उसकी याद में तो, कभी बेरुखी में तड़पती है
इस जलन को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !

कभी बहू बनकर दहेज़ के नाम पर ताने सह जाती है
बेटी पैदा करने पर गुनाहगार ठहराई जाती है
कभी प्रसव तो , कभी गर्भ -पात की पीड़ा झेल जाती है
अपने ही अरमानों की अर्थी अपने कांधो पर उठाती है
इस संवेदना को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !

Sunday 1 May 2011

हमदर्दी

हमदर्दी

एकता और काजल दोनों सहेलियां थी . जब भी कोई बाजार का काम होता तो दोनों साथ- साथ चली जाती थी क्योंकि जिस कंपनी में दोनों के पति काम करते थे वह जगह शहर से कुछ दूर पड़ती थी .वे दोनों कंपनी की बनाई कालोनी में रहती थी .एकता जब काजल के घर पहुँची तो वह अभी तैयार नहीं थी इसलिए वह एकता को कुछ देर इन्तजार करने को कहती है,
"चल, पहले एक- एक कप काफी पीते है फिर चलते हैं . तब तक मै तैयार भी हो जाउंगी , तुम तो समाज सेवा में इतना व्यस्त रहती हो कि बिन काम से मेरे घर कभी आती ही नहीं हो "

" नहीं- नहीं काजल ,ऐसी कोई बात नहीं , दरअसल छब्बीस जनवरी आने वाली है उसकी तैयारी में लगी थी कई दिनों से . उस दिन अपनी कालोनी में तिरंगा फिराने का और कल्चरल कार्यक्रम रखा है . साथ ही आसपास की झुग्गी झोंपड़ी के बच्चों को लेडीस क्लब की तरफ से कपड़े और किताबें बांटनी है , जिसके लिए हर सदस्य से हमने सो- सो रुपये इकट्ठे किए हैं ."

" अरे हाँ , छब्बीस जनवरी से याद आया उस दिन कंपनी के क्लब की तरफ से कसोली में पिकनिक भी तो जा रहा है . वापिस आते हुए उसके पांच सौ रुपये भी जमा करवाने है . पिकनिक पर तुम भी चलती तो बहुत मजा आता . "

" नहीं- नहीं काजल , छब्बीस जनवरी का प्रोग्राम तो ख़ास मैंने रखा है इसलिए मै तो किसी हालत में भी नहीं जा पाउंगी "

तभी काजल का बेटा साहिल बाहर से भागा- भागा आया और कहने लगा ," मम्मी - मम्मी , हमारे स्कूल का पिकनिक जा रहा है मुझे उसके लिए कल पांच सौ रुपये जमा करवाने है "

काजल बेटे को समझाते हुए , " नहीं साहिल , पापा के आफ़िस की तरफ से छब्बीस को कसोली पिकनिक जा रहा है उसमे सब साथ- साथ चलेंगे "
" नहीं मम्मी , छब्बीस को तो हमे स्कूल जाना जरुरी है परेड के वास्ते . इसलिए मै तो सत्ताईस तारीख को स्कूल वाले पिकनिक के साथ ही जाऊँगा . मेरे सभी दोस्त जा रहे हैं . वैसे भी आप लोगों के साथ मै बोर हो जाता हूँ "

" ठीक हैं, पापा आयेंगे तो उनसे लेकर दूंगी अभी मेरे पास नहीं है "

तभी काजल की काम वाली कमला महीने के पैसे लेने आ गई . जब काजल ने उसे तीन सौ रुपये दिए तो वह कहने लगी , " बीबी जी, सब लोग अब तीन सौ पचास रुपये देते है आप भी पचास रुपये बढ़ा दीजिये . इतनी महंगाई में गुजारा नहीं होता है "
काजल बेरुखी से कमला को कहती है , " महंगाई क्या तुम लोगों के लिए है सिर्फ . हम लोगों को भी तो इतनी महंगाई में गुजारा करना मुश्किल हो जाता है "

" बीबी जी, छोटी बेटी बीमार है भगवान् के लिए पचास रुपये और दे दीजिये ना, उसकी दवा लानी है. "

" जब गुजारा नहीं होता तो इतने- इतने बच्चें क्यों पैदा करते हो . इस महीने मेरा भी हाथ बहुत तंग है , अगले महीने ले लेना. अब जाओ यहाँ से मुझे बाजार के लिए देर हो रही है "

काजल, एकता की तरफ देखते हुए , " क्यों भई एकता, तुम अपनी कामवाली को कितने पैसे देती हो "

एकता चुप हो गई क्योंकि उसे पता था कि अगर वह सच्चाई बताएगी तो उल्टा काजल उसी को कहना शुरू कर देगी कि तुम जैसे लोगों के कारण ही ये कामवालियां सर पर चढ़ जाती हैं . मन ही मन एकता सोचती है कि हमारे दिखावे भरे समाज की क्या यही सच्चाई है ? इन्ही विचारों की उधेड़-बुन्न में खोए -खोए वह काजल के साथ बाजार घूमती रही . चाह कर भी कामवाली की बातें उसके मन से निकल नहीं रही थी . काजल ने उसे घूमते हुए टोका भी ,
" एकता , कहाँ खोयी- खोयी सी हो , अरे ये कामवालियां नीच होती हैं ,इनकी बातों पर ज्यादा ध्यान मत दिया करो . यह सब तो इनके हर रोज के बहाने है पैसे ऐंठने के लिए "

परन्तु फिर भी एकता को उसकी काम वाली की बातों में बहुत सच्चाई लग रही थी . रह- रह कर उसका मजबूर चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था और उसे उस पर बहुत दया आ रही थी . उसका बस चलता तो वह उसे अपनी तरफ से पैसे दे देती पर काजल के डर से उसने ऐसा नहीं किया .

मार्च का महीना अभी शुरू ही हुआ था तो एकता ने एक दिन सोचा कि होली आने वाली है इसलिए काजल के साथ बाजार जाकर कुछ जरुरी सामान ले आए . ऐसे भी उसे काजल को मिले काफी दिन बीत गए थे . यह सोचकर वह काजल के घर पहुँच गई . जब उसने उसके घर की घंटी बजाई तो दरवाजा काजल की कामवाली कमला ने खोला . उसे देखते ही एकता ने कमला का हाल पूछते हुए काजल के बारे में पूछा तो कमला बोली ,
" बीबी जी , आपको नहीं पता ! काजल मेमसाहिब तो कई दिन से काफी बीमार है " यह कहते हुए वह उसे अन्दर के कमरे में ले गई जहाँ काजल लेटी थी . कमला ने एकता को कुर्सी दी बैठने के लिए और कहने लगी , " बीबी जी , आप बैठिये मै आपके लिए चाय लाती हूँ "

काजल एकता को देखकर बिस्तर पर थोड़ा उठ कर बैठ गई .

" अरे आओ एकता , बहुत दिनों बाद आई हो , कहो कैसे आना हुआ "

" काजल , क्या हुआ ? तुम तो काफी बीमार लग रही हो . इतनी हालत खराब थी तो मुझे कहलवा के बुला लिया होता . काफी दिक्कत आई होगी ना सब कामों के लिए "

" बस एकता , सर्दी में बुखार बिगड़ गया और टाईफाइड हो गया था . अब तो काफी सुधार है हालत में . भला हो इस कामवाली कमला का जिसने अपनों से भी बढकर बिमारी में मेरी देखभाल की है "

" काजल , सच में आज कल के भौतिकवादी युग में किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है , ये गरीब लोग फिर भी जरूरत में साथ निभा जाते हैं "

" बस एकता , मुझे और शर्मिंदा मत करो . मै पहले ही अपने किए पर बहुत दुखी हूँ . उस दिन मैंने कमला की बेटी के बीमार होने पर उसे मात्र पचास रुपये देने से इनकार कर दिया था , उसी की सजा भुगत रही हूँ . "

" काजल अपना मन दुखी मत करो . जो हुआ सो हुआ , जब जागो तभी सवेरा . ये गरीब लोग बेचारे पचास सौ रुपये के लिए हमारे कितने काम कर देते है परन्तु फिर भी हम लोग अपनी ऐश परस्ती में तो हजारों रुपये उजाड़ देते हैं परन्तु किसी गरीब की मदद करने से कतराते है "

Thursday 21 April 2011

"गरीब की झोंपड़ी "


"गरीब की झोंपड़ी "

गरीब की झोंपड़ी में चूल्हा जले हर दिन

यह जरुरी तो नहीं !


चूल्हे में तेल नहीं तो कभी जलने को आग नहीं ,

खाने में अन्न नहीं तो कभी रोटी को साग नहीं !


सब्जी में नमक कम तो कभी चाय में चीनी कम ,

ना तो उच्चताप का दम ,ना ही शूगर का गम !


चुटकी भर नमक के साथ,कभी मुट्ठी भर भात है ,

भूखे पेट भी होता नींद का आघात है !


हर दिन भूख तो है पर भूख का इंतजाम नहीं ,

मोटापा कम करना पड़े ,कसरत का अंजाम नहीं !


पेट की आतें सूख कर हो गई चने का झाड़ ,

चूल्हे की लकड़ी ढोना भी बन गया पहाड़ !


इक दिन आया ऐसा जब सेठ हो गया मेहरबान ,

ख़ुशी से वह बोला देखो, मै क्या हूँ लाया , भाग्यवान !


उस रोज अन्न था भरपेट,जली चूल्हे में आग भी खूब ,

पति- पत्नी इक दूजे में मग्न ,प्यार की नींद में गए ढूब!


रात में चला ऐसा तूफ़ान ,आग की लपटे छूने लगी आसमान ,

नींद में खोया सारा जहान,किसे पता झोंपड़ी बन गई शमशान !!


गरीब की झोंपड़ी में चूल्हा जले हर दिन

यह जरुरी तो नहीं !!!

Monday 4 April 2011

चील

दूर खेतों में एक जानवर की लाश पर कई चील मंडरा रहे थे . आपस में वह मॉस नोचने के लिए लड़ रहे थे . सोहनलाल अपनी बालकनी में बैठे अखबार पढ़ रहे थे जब उन्होंने यह भयानक नजारा देखा . उनके रोंगटे खड़े हो गए यह दृश्य देखकर . पता नहीं कौन सा जानवर रात को खेतों में दम तोड़ गया होगा . जानवर पहचान पाना मुश्किल था . पर खेतों में गाय ही अक्सर घूमती हुई नजर आती थी. ये बेजुबान जानवर भी कितने बेबस होते हैं , अपनी तकलीफ को किसी को बता भी नहीं सकते . अभी सोहनलाल यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें गेट के बाहर कोई खड़ा दिखाई दिया . उनकी धुंधली आखों को साफ़ नहीं दिख रहा था और उनका चश्मा भी पुराना हो चला था पर उनके बेटे रोहित जैसा ही कोई लड़का खड़ा दिखाई दे रहा था .उन्हें लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर जरुर यह उनकी आँखों का धोखा है . उन्होंने अपनी बेटी सुगंधा को आवाज लगाई , " बेटे , देखो तो गेट पर कोई खड़ा है क्या ?"

पाँच साल हो गए थे उन्हें सुगंधा के पास आए हुए . उस दौरान रोहित ने शुरू- शुरू में दो- तीन बार फोन किया था, उसके बाद तो सुगंधा ही कभी- कभार फोन कर लेती थी खैरियत पूछने और बताने के लिए . उनकी तो रोहित से बात हुए भी काफी अरसा बीत गया था .

तभी सुगंधा दौड़ी- दौड़ी आई , " पिताजी , रोहित भैया आए हैं अपने बेटे के साथ . ड्राइंग रूम में बैठे है आप भी आ जाइए . "

बेटे की खबर सुनकर सोहनलाल की आँखें भर आई पर पता नहीं क्यों उनके कदम जड्वंत से हो गए ? . चाहकर भी उनमे हरकत नहीं हो रही थी . जब तक उनकी पत्नी जिन्दा थी तब तक उन्हें किसी तरह की कोई कमी का अहसास नहीं हुआ था . बिन मांगे ही सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक कोई कमी नहीं आती थी . जानकी उनके दिल की हर बात बिन कहे ही जान लेती थी . पूरा घर इतनी उम्र में भी उसने बखूबी संभाल रखा था . रोहित की शादी के बाद भी उनको अपनी बहू के हाथ का एक कप चाय तक नसीब नहीं हुआ था . रोहित और उसकी पत्नी दोनों एक ही आफ़िस में नौकरी करते थे. साथ- साथ सुबह निकल जाते और देर शाम ही लौटते थे . यहाँ तक कि उनके आफ़िस के टीफिन भी जानकी ही पैक करती थी . जब रोहित का बेटा बंटी पैदा हुआ तब भी उसकी माँ का फर्ज भी जानकी ने ही पूरा किया था . कभी- कभी तो दोनों पति- पत्नी जब तक लौटते तब तक बंटी अपनी दादी की गोद में सो गया होता . माँ की गोद तो बंटी को कभी नसीब ही नहीं हुई थी . जानकी ने ही उसे पाल- पोस कर बड़ा किया था . जानकी सोहनलाल के घर की धुरी की तरह थी . जानकी क्या गई सोहनलाल के होंठों की हँसी भी साथ ले गई . जानकी के मरने के बाद रोहित ने अपने बेटे बंटी को हास्टल में डाल दिया था . सुगंधा जब अपनी माँ के देहांत के बाद उनकी पुण्य- तिथि पर आई तो उससे अपने पिता की इतनी दुर्दशा देखी नहीं गई . सुगंधा बेशक रोहित से छोटी थी परन्तु उसमे जानकी के सारे गुण मौजूद थे . सुगंधा अपने पिता को अपने साथ अपने घर ले गई . रोहित ने अपने पिता को एक बार भी रोकने की कोशिश नहीं की जैसे कि कोई बोझ सर से उतर गया हो .आज फिर एक बार सोहनलाल के दिलो- दिमाग में पुरानी स्मृतियाँ तरो- ताजा हो गई थी . जानकी को याद करते- करते उनकी आँखें भर आई . . इतनी देर में उनका पोता बंटी उनके सामने आकर खड़ा हो गया, उसे देखकर रोहित के बचपन की तस्वीरें उनकी आँखों के सामने घूमने लगी .

बंटी ने सोहनलाल के चरण छू कर प्रणाम किया तो पीछे- पीछे रोहित भी आ गया और कहने लगा ,
" पिताजी , आप तो हम लोगों को भूल ही गए हैं . बंटी तो इतने सालों में भी आपको भूला नहीं . जब भी छुट्टियों में घर आता है आपको और माँ को बहुत याद करता है . इस बार यह आपसे मिलने की बहुत जिद्द करने लगा था . "

पोते को देखकर सोहनलाल को जानकी की ममता याद आ गई कि किस तरह वह दिन- रात उसे गोद में लिए- लिए घूमती थी .
तभी बंटी बोलने लगा , " दादा जी, मै इस बार आपको लेने आया हूँ आपको मेरे साथ चलना पड़ेगा . मेरा उस घर में आपके बिना दिल नहीं लगता . दादी की बहुत याद आती है. "

जानकी का नाम सुनकर सोहनलाल का भी पोते के प्रति प्यार उमड़ने लगा और वह चाह कर भी पोते को ना नहीं कह पाए .
वहाँ जाने पर इस बार उनकी बहू का रवैया भी काफी बदला हुआ लगा . उन्हें लगा शायद सबको अपनी भूल का अहसास हो गया है .कई दिन तक तो रोहित और उसकी पत्नी ने उनकी बहुत सेवा की . सोहनलाल यह देख- देख कर फूले नहीं समाते थे . बेटे , बहू और पोते के साथ कब दस दिन बीत गए उन्हें पता ही नहीं चला . उस घर की हर चीज उन्हें जानकी की याद दिलाती थी तो बरबस ही उनकी आँखों से आंसू बह निकलते . एक दिन जब सोहन लाल अपने पोते बंटी के साथ कैरम खेल रहे थे तो रोहित भागा- भागा आया और अपने पिता को एक चिठ्ठी दिखाते हुए कहने लगा ,
" पिताजी , देखिए तो आपके नाम यह चिठ्ठी आई है जिसमे आपके दिल्ली वाले तायाजी ने अपनी सारी संपत्ति आपके नाम कर दी है . "

सोहन लाल की समझ में नहीं आया कि वह खुश हो या दुखी हो . इस उम्र में उन्हें सकून के कुछ पलों के अलावा किसी चीज की चाहत नहीं थी . रिटायरमेंट के बाद उन्हें अच्छी खासी पेंशन मिल जाती थी जो उनके लिए काफी थी . वह रोहित को कहने लगे ,
" बेटे , मुझे तो किसी चीज की लालसा नहीं है अब, तुम्हे जैसा ठीक लगता है देख लो . यह इतना बड़ा मकान है यह भी तुम्हारा ही तो है "

दो दिन बाद रोहित अपने पिता से कुछ कागजात पर हस्ताक्षर करवाने आया और अगले दिन बंटी को अपने साथ हास्टल छोड़ने के वास्ते ले गया . बंटी की छुट्टियां ख़त्म हो गई थी . पीछे से उनकी बहू ने उनका बिस्तर ऊपर की मंजिल पर बने कमरे में लगा दिया यह कह कर कि उसकी सहेलियां आती है तो उन्हें उनकी उपस्थिति में असहज महसूस होता है .
सोहनलाल बेचारे कुछ ना कह पाए और चुपचाप ऊपर की मंजिल वाले कमरे में चले गए . बंटी के चले जाने के बाद उनका मन ही ना होता कि वह अपने कमरे से बाहर निकले . वह सारा दिन अपने कमरे में पड़े रहते . परन्तु रोहित के इस तरह के व्यवहार से उन्हें इतना आघात पहुंचा कि उनकी जीने की इच्छा ही ख़त्म हो गई . उन्हें सब समझ आने लगा कि यह सब दिखावा उस जायदाद को हासिल करने के लिए था . यहाँ तक कि इस काम के लिए रोहित ने अपने बेटे का सहारा लिया . दिल्ली से वापिस आने पर भी रोहित एक बार भी उनसे मिलने नहीं आया जैसे उसका मकसद पूरा हो गया था . ठीक से ना खाने- पीने के कारण वह काफी कमजोर हो गए थे . कमजोरी होने के कारण चलना- फिरना भी मुश्किल हो गया था .

एक दिन उनके बचपन का दोस्त रमाकान्त अचानक उनसे मिलने आ पहुंचा और कहने लगा , " सोहन लाल, भाभी के देहांत के बाद तुम अचानक ही यहाँ से चले गए . मै तुमसे मिलने तुम्हारे पीछे से कई बार आया पर यहाँ जब भी आया तो ताला लगा मिला . फिर काम वाली से पता चला था कि तुम सुगंधा के पास चले गए हो . आज भी उसने ही तुम्हारे आने के बारे में बताया तो मै तुरंत तुमसे मिलने आ गया . पूरे पाँच साल बाद मिल रहे हो "
यह कहते ही रमाकान्त की आँखें नम हो गई .

" रमाकांत तुम तो सब जानते हो , जब सुगंधा जानकी के मरने के बाद यहाँ आई तो मुझे जबरदस्ती अपने साथ ले गई "

" पर अब इतने बरसों बाद तुम्हारे बेटे को तुम्हारी याद कैसे आ गई ? "

" दोस्त , तुम्हे तो सब पता चल ही गया होगा , कि आजकल रिश्ते- नातों से ज्यादा पैसे की अहमियत हो गई हैं . कहते है ना कि जरूरत में तो लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं और रोहित जैसे बेटे तो जरूरत में बाप को गधा बना देते है "
" सोहनलाल मन दुखी मत करो , वरना भाभी की आत्मा को दुःख पहुंचेगा "

" बस दोस्त, अब तो उसके पास ही जाने की तैयारी है , जाने से पहले मुझ पर एक अहसान कर देना . इस चिठ्ठी में मेरी अंतिम इच्छा लिखी है मेरे मरने के बाद उसे पूरी कर देना " यह कहते हुए सोहनलाल ने एक चिठ्ठी रमाकांत को थमा दी .

. दिन में एक- आध बार कामवाली सोहन लाल को थोड़ा बहुत खाने के वास्ते दे जाती . कई बार तो वह खाना ऐसे ही पड़ा रहता . उनकी भूख दिन- ब -दिन मरती जा रही थी . इस बार जब छुट्टियां पड़ने वाली थी तो सोहनलाल को यह सोचकर थोड़ा अच्छा लगा कि बंटी के आने से उनका मन कुछ लग जाया करेगा . परन्तु इन्तजार की घड़ियाँ ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी . सोहनलाल निराश हो गए क्योंकि काम वाली से उन्हें मालूम पड़ गया था कि इस बार बंटी छुट्टियों में नहीं आएगा . रोहित की शक्ल भी देखे उन्हें महीना हो गया था .
रमाकांत ने सोहनलाल की अंतिम इच्छा की चिठ्ठी शहर के सम्बंधित कार्यालय और सरकारी डिस्पेंसरी में दे दी थी .

एक दिन दोपहर के वक्त रमाकांत अपने कमरे में सुस्ता रहे थे कि कामवाली दौड़ी- दौड़ी आई और रमाकांत से हाँफते- हाँफते बोली , " बाबूजी, बाबूजी ! , जरा देखिए तो आकर सोहनलाल बाबूजी कुछ बात ही नहीं कर रहे ! कल रात का खाना भी ऐसे ही पड़ा हुआ था . मुझे तो बहुत डर लग रहा है , घर पर कोई भी नहीं है ."

" रोहित को फोन करके इत्लाह दी या नहीं ? "

" नहीं बाबूजी , मैंने फोन किया था तो साहिब जी ने कहा कि वो अभी बहुत व्यस्त हैं कुछ देर बाद बात करेंगे "

" खैर कोई बात नहीं , तुम चलो मै सरकारी डाक्टर को फोन करके आ रहा हूँ "

रमाकांत ने जल्दी से सरकारी डाक्टर को फोन किया और सोहनलाल को देखने उसके घर पहुंचा तो सरकारी डाक्टर भी साथ ही पहुंचा गया .
डाक्टर ने सोहनलाल को चेक किया और अपना सर नीचे झुका लिया , " रमाकांत जी , इन्हें गुजरे हुए तो दस घंटे बीत चुके हैं . इनके बेटे को जल्द से इत्त्लाह कर दो "
रमाकांत ने भरी आँखों से सोहनलाल की अंतिम इच्छा वाली चिठ्ठी की एक कापी डाक्टर को दिखाई . डाक्टर ने वहीँ से ही अस्पताल फोन करके सोहन लाल की अंतिम इच्छा बताई कि मृत्युपर्यंत उनके शरीर को उनका बेटा हाथ ना लगाए को ध्यान में रखते हुए सरकारी अम्बुलेंस भेजने की अपील की .


जब तक रोहित घर पहुंचा तब तक अम्बुलेंस उनके पार्थिव शरीर को अपने साथ ले जा रही थी . जब रोहित अम्बुलेंस के पास अपने पिता को देखने पहुंचा तो डाक्टर ने चिठ्ठी रोहित के हाथ में थमा दी और रमाकांत को अन्दर बैठने का इशारा किया . रमाकांत जल्द से अम्बुलेंस में बैठ गए और अम्बुलेंस का दरवाजा बंद कर लिया .
रमाकांत को ऐसा लगा कि जैसे कोई चील तीव्र गति से उनके दोस्त के मृत शरीर की तरफ बढ रहा हो.

.इतनी देर में सोहनलाल के घर के आस -पास के लोग उनके देहांत की खबर सुनकर वहाँ इकट्ठे हो गए थे और सोहनलाल की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कर रहे थे.