Sunday, 19 December, 2010














" देव- भूमि"

इस गर्मी की छुट्टी हम चले पहाड़ों की सैर
ऐसा लगा मानो पहाड़ों पर बादल रहे तैर

आने लगे ठंडी- ठंडी हवा के झोंके
ए.सी. , कूलर भी हैं जिसके आगे फींके

हिमाचल जो कहलाए धरती पर " देवभूमि"
मैदानों पर पड़ रही होती जब भीष्म गर्मी

हर मोड़ पर लगा है संकेतक साइन बोर्ड
देकर चलो हार्न ,आगे है तीव्र मोड़

इक तरफ ऊँचे पहाड़ तो इक तरफ गहरी खाई
किसे ना मनमोहक पहाड़ी झरनों की छटा भाई

दूर इक पहाड़ी पर चरवाहा था भेड़ें चराए
हैरान हूँ बिन सीड़ी ,रास्ते कैसे वहाँ चढ़ जाए

घुमावदार सड़कों पर सर खा ना जाए चक्कर
ओवर टेक ना करो तंग सड़क पर हो ना जाए टक्कर

छोटी पहाड़ी पर इक था छोटा सा शिवालय
कोहरे के आलिंगन में था पर्वत हिमालय

बर्फ से ढकी ऊँची चोटियाँ नव दुल्हन की तरह निर्मल
पर्वत मालाएं हैं देवताओं के वास से उज्जवल

कहीं हैं बांस के वृक्ष तो कहीं लम्बे- लम्बे देवदार
इक पल में धूप खिले तो इक पल में बरखा की मनुहार

कानों में रस घोल रही पक्षियों की आवाजें मनमोहक
रैन बसेरों की रोशनी लगे मानों तारें रहे हो चमक

यहीं पर दिखता धरती -गगन के मिलन का अद्दभुत नजारा
जहाँ सूरज की पहली किरण से फ़ैल रहा नव उजयारा

मन चाहे कि बना ले हमेशा का यहीं इक आशियाना
कुदरत ने मानों यहीं बिखेरा अपना सारा खजाना

इस गर्मी की छुट्टी हम चले " देव भूमि"

Sunday, 5 December, 2010

दिग्वलय .


जैसे ही ट्रेन ने अपनी रफ़्तार पकड़ी ना जाने कब दिवाकर अतीत की यादों में खो गया . उसे रह- रह कर वो दिन याद आ रहा था जब उसका इंजीनीयरिंग कालेज में दाखिले का अंतिम दिन था . दिवाकर बचपन से ही पढ़ाई में चारों भाई- बहनों में सबसे होशियार था और उसके अच्छे अंकों के कारण शहर के जाने- माने इंजीनीयरिंग कालेज में उसका नंबर आना स्वाभाविक ही था . परन्तु उसके घर की माली हालत कुछ ठीक नहीं थी इसलिए पिताजी अपनी सीमित आय में दाखिले के पैसों का बंदोबस्त नहीं कर पाए थे .दिवाकर के सभी दोस्तों ने कालेज में दाखिला ले लिया था . दिवाकर को अपना भविष्य अन्धकार में नजर आ रहा था .जिन लड़कों का रैंक उससे काफी कम आया था उन्होंने भी दाखिला करवा लिया था . दिवाकर परेशान हालत में इधर से उधर घूम रहा था .
दिवाकर को परेशान देखकर आखिर उसकी माँ से रहा नहीं गया और वो उसके पिताजी को बुलाकर कहने लगी ,
" आप बेशक हार मान ले पर मैं अपने होनहार बेटे का जीवन बर्बाद नहीं होने दूंगी और उसका सपना जरुर साकार करुँगी "

पिताजी बीच में ही खीजते हुए बोले ,
"तुम क्या करोगी ? कभी स्कूल की शक्ल भी देखी है जीवन में जो इतनी बड़ी- बड़ी बातें कर रही हो . क्या कोई गड़ा हुआ खजाना हाथ लग गया है जो दाखिले के लिए निकाल कर दे दोगी"

" गड़ा हुआ खजाना ना सही पर मै मेरे बेटे को इंजीनीयर बनाने के लिए अपने गहने तो बेच ही सकती हूँ . आज कल गहने कौन पहनता है और किस दिन काम आयेंगे "

पिताजी गुस्से से आग बबूला हो गए " पागल तो नहीं हो गई हो , अब क्या मै तुम्हारे गहने बेचने जाऊँगा तो मेरी क्या इज्जत रह जाएगी "

" जब तुम्हारा बेटा इंजीनीयर बन जाएगा तो तुम्हारा ही सीना गर्व से फूलेगा तब सब बातें पीछे रह जायेंगी "

इस तरह काफी मिन्नतों के बाद आखिर दिवाकर के पिताजी राजी हो गए और दिवाकर का दाखिला इंजीनियरिंग कालेज में हो गया . दिवाकर ने अपनी मेहनत और लग्न से काफी अच्छे अंकों में डिग्री प्राप्त कर ली और देश की जानी मानी कंपनियों से उसे नौकरी की पेश- कश आने लगी .

दिवाकर के मामा और ज्योत्सना के पिता गहरे दोस्त थे , उन्होंने दिवाकर की काबलियत देखते हुए ज्योत्सना के लिए दिवाकर का हाथ माँग लिया . इधर दिवाकर ने अपनी पहली नौकरी ज्वाइन की और उधर उसका विवाह ज्योत्सना से हो गया . इस तरह उसने अपनी जिन्दगी के दो सफ़र एक साथ शुरू किए . दिवाकर को एक दम से नई जगह पर नौकरी के लिए जाना था तो एक बार उसने अकेले ही जाना बेहतर समझा . दिवाकर ने ज्योत्सना को प्यार से समझाते हुए कहा ,
" देखो ज्योत्सना नई- नई जगह के बारे में अभी मुझे कोई जानकारी नहीं है इसलिए मै एक बार अकेले ही चला जाता हूँ . जब मैं वहाँ सब कुछ व्यवस्थित कर लूँगा और कंपनी का घर भी मिल जाएगा तो छुट्टी मिलते ही मै तुम्हे भी अपने साथ ले जाऊँगा तब तक तुम यहीं गाँव में माँ और बाबू जी के साथ रहो "

इतना क्या सुनना था ज्योत्सना तो जैसे एक दम हैरान परेशान हो गई और बोली ,
" दिवाकर तुम्हारे बिना मै अकेले यहाँ नहीं रह पाउंगी . वैसे भी गाँव के माहौल की मुझे कोई जानकारी नहीं है इसलिए जब तक तुम अपना घर वहाँ व्यवथित नहीं कर लेते मै अपने माता- पिता के पास ही रहूंगी . "

पूरे एक महीने के बाद दिवाकर ज्योत्सना को छुट्टी मिलने पर जब उसके मायके उसे लेने गया तो उसे बात- बात पर अहसास होने लगा कि ज्योत्सना को अपने माता- पिता की शान शौकत का कुछ ज्यादा ही घमंड है .वह बात- बात पर दिवाकर के घर के और गाँव के माहौल पर कटाक्ष कर देती थी . दिवाकर चाहता था कि वह जब इतनी दूर आया है तो कुछ दिन अपने माता- पिता के पास भी रहे पर ज्योत्सना को तो गाँव जाना बिल्कुल भी गवारा नहीं था . नई- नई शादी हुई थी इसलिए दिवाकर चुप रह जाता . इस तरह दोनों ने आखिर अपने घर से मीलों दूर नई जगह पर अपनी गृहस्थी की शुरुआत की .


* तभी दिवाकर का ध्यान भंग हुआ जब अक्षिता कहने लगी ,
" पापा , पापा बहुत प्यास लग रही है, कोल्ड ड्रिंक लेकर दे दो "
दिवाकर अपनी पत्नी ज्योत्सना को उसके मायके एम्. ए. की पढ़ाई करने के लिए छोड़ कर आ रहा था .जब ज्योत्सना ने बी . ए . की पढाई ख़त्म की ही थी तभी उसका विवाह दिवाकर से हो गया था . दिवाकर के विवाह को लगभग दस वर्ष बीत चुके थे. अब जब अक्षिता बड़ी हो गई थी तो ज्योत्सना घर पार सारा दिन बोर हो जाती थी इसलिए दिवाकर ने ही उसे अपनी पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी थी वैसे भी ज्योत्सना शुरू से ही पढ़ने में होशियार रही थी . दिवाकर का गाँव और ज्योत्सना का मायका पास- पास में थे . ज्योत्सना शुरू से ही बड़े शहर के माहौल में पली- बड़ी थी. अक्षिता को ज्योत्सना की गैर मौजूदगी में अपनी माँ की कमी महसूस ना हो और किसी तरह की दिक्कत पेश ना आए इसलिए दिवाकर अपनी माँ को अपने साथ अपनी नौकरी करने वाली जगह लेकर जा रहा था . दिवाकर एक मल्टीनैशनल कंपनी में बतोर इंजीनीयर काम करता था जहाँ तक ट्रेन द्वारा पहुँचने में काफी लम्बा सफ़र तय करना पड़ता था

दिवाकर को रह -रह कर आज फिर अपनी माँ की कुर्बानियां याद आ रही थी . दिवाकर को ज्योत्सना की गैर मौजूदगी में भी अपनी माँ के होते हुए अक्षिता और घर की देखभाल में कोई परेशानी नहीं आई .दिवाकर की माँ शुरू से ही गाँव में रही थी और पिताजी के स्वर्गवास के बाद तो खेतों की जिम्मेवारी खुद अकेले ही संभाल लेती थी .जब कुछ दिनों बाद उनकी काम वाली बाई छुट्टी पर चली गई और इस बीच दिवाकर भी काफी बीमार पड़ गया . परन्तु उसकी माँ इतनी धैर्यवान थी कि इतनी उम्र हो जाने के बावजूद भी काम वाली के ना आने पर भी सब काम अकेले ही कर लेती थी . दिवाकर अपनी माँ को काम करते देख अनायास ही सोचने लगता था कि कैसे ज्योत्सना काम वाली के ना आने पर सारा घर सर पर उठा लेती थी . वैसे भी ज्योत्सना अपने माँ- बाप की इकलोती बेटी थी इसलिए कुछ ज्यादा ही लाड -प्यार से पली- बड़ी थी . दिवाकर को अपनी नौकरी के साथ- साथ ज्योत्सना की घर के काम- काज में भी मदद करनी पड़ती थी . दिवाकर बहुत ही सहनशील था और वह किसी भी कीमत पर घर की शान्ति बनाए रखना चाहता था .

ज्योत्सना की गैर मौजूदगी में दिवाकर घर पर और अक्षिता पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देता था तांकि वापिस आकर ज्योत्सना को कोई शिकायत करने का मौका ना मिले . अक्षिता की परीक्षा के दिनों में भी दिवाकर उसे आफ़िस से छुट्टी लेकर हर विषय खुद ही पढ़ाता था तांकि वह अच्छे अंक प्राप्त करके पास हो सके . .

देखते- देखते तीन महीने भी बीत गए और ज्योत्सना अपनी एम् ए . की परीक्षा देकर लौट आई . अपनी तरफ से दिवाकर ने हर मुमकिन कौशिश की थी कि इतने दिनों के बाद घर आने पर ज्योत्सना को कोई परेशानी ना हो और ना ही कोई शिकायत करने का मौका मिले . परन्तु ज्योत्सना तो जैसे आदत से मजबूर थी . एक तो दिवाकर की माँ के साथ उसकी शुरू से ही एक मिनट भी नहीं बनती थी बस अब तो हर बात पर उसे कोई ना कोई मौका मिल जाता था कुछ ना कुछ बोलने का . ज्योत्सना उसकी माँ के आगे खुद को ज्यादा ही अप टू डेट समझती थी .दिवाकर की माँ कुछ पुराने ख्यालात की थी ,जैसे कि पुराने समय की अक्सर औरतें होती हैं .ज्योत्सना हर बात पर शिकायत करती और चिडचिड़ा जाती और दिवाकर को भला बुरा कहने लगती
" यदि घर की हालत इस तरह से जाहिलों के हाथों से खराब करवानी थी तो क्या जरूरत थी मुझे एम्. ए. करवाने की. पीछे से एक भी काम सही ढंग से नहीं हुआ है "

दिवाकर यह सब सुन कर भी चुप रहता . उसे समझ नहीं आता था कि वह क्या कहे. मन ही मन वह यह जरुर सोचता कि तीन महीनों से उसकी माँ ने अक्षिता की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसके बीमार होने के बारे में पूछना तो दूर बल्कि हर चीज में नुक्स निकालना उसकी आदत ही बन गई. अक्षिता की परीक्षा के परिणाम से भी वह संतुष्ट नहीं थी और उसने दिवाकर को भी बहुत भला- बुरा कहा . दिवाकर मन ही मन बहुत दुखी होता यहाँ तक कि उसकी माँ भी बहुत परेशान रहने लगी और बार- बार दिवाकर को वापिस गाँव छोड़ कर आने की जिद करने लगी .

क्या इसी दिन के वास्ते उसकी माँ अपना घर अपना देस छोड़कर उसके साथ इतनी दूर उसका घर देखने के लिए आई थी . यहाँ पर तो ना उसकी किसी से जान पहचान थी ना ही यहाँ की भाषा वो समझ पाती थी .

दिवाकर की मन ही मन ख्वाइश थी कि घर जाने से पहले वह अपनी माँ को कोई सोने का गहना बनवा कर दे जिन्होंने उसकी पढ़ाई के लिए इतनी कुर्बानी दी थी और उसे इस काबिल बनाया कि वह अच्छे से अपना जीवन गुजर- बसर कर सके . ज्योत्सना को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत भड़क गई और कहने लगी ,
" हाँ , हाँ , इसीलिए तो कमाते हो तांकि सब अपने गंवार रिश्तेदारों पर लुटा सको . मेरे और अक्षिता के प्रति तो जैसे तुम्हारी कोई जिम्मेवारी है ही नहीं "

दिवाकर की माँ ज्योत्सना की शूल भरी बातें सुनकर बहुत दुखी होती और एक दिन दिवाकर से कहने लगी,
" दिवाकर तूँ ये कान के बूंदे यहीं पर रख ले ,कल को अक्षिता के काम आ जाएँगे क्योंकि अब इस उम्र में मै इन्हें पहन कर कहाँ जाउंगी और तुम्हारी पत्नी को भी तसल्ली रहेगी "

दिवाकर बिना कहे अपनी माँ की बात को समझ गया कि इतने हलकी चीज उन्हें पसंद नहीं आई थी क्योंकि गाँव में सभी औरतें कानों में बड़े- बड़े बूंदे पहनती थी.

दिवाकर की माँ मन ही मन सोचने लगी कि पहली बार तो दिवाकर ने उसे कोई चीज लेकर दी है और अगर वह गाँव जाकर सबको ये कुंवारी लड़कियों के पहनने लायक बूंदे दिखायेगी तो लोग क्या बात नहीं करेंगे . अगर बेटे ने कुछ बनवा कर देना ही था तो कोई ढंग की चीज तो देता तांकि चार दिन पहनने लायक तो होती. ये सब सोचकर उसकी माँ का मन उदास हो जाता .

दिवाकर यह सब बातें देख- सुनकर मन ही मन बहुत हताश होता कि वह दिन भर घर से बाहर नौकरी करता है और अपनी तरफ से हर एक को खुश रखने की हर मुमकिन कौशिश करता है फिर भी उसकी भावनाओं का ख्याल रखने की कोई कोशिश नहीं करता . क्या वह पुरुष है इसी लिए उसको किसी से शिकायत करने का कोई हक़ नहीं है ? वो क्या चाहता है यह कोई जानना नहीं चाहता .क्या यही वास्तविक सच है हमारे पुरुष प्रधान समाज का . ? वह किसी के सामने रो भी नहीं सकता यह सोचते ही उसकी आँखें नम हो गई. वह अशांत मन से दिग्वलय में डूबते दिवाकर की ओर देखने लगा जैसे उसके आस पास अँधेरा फैलने लगा हो.
और उसने अपनी दोनों आँखें बंद कर ली......

Tuesday, 30 November, 2010

" इष्ट देव "











" इष्ट देव "

तुम.. मेरे जीवन दाता
...मेरे प्राणों के त्राता

मेरे भूखंड की बगिया के तुम माली
दर से तुम्हारे जाए ना कोई खाली

किरण तुम्हारी पहली वक्ष को मेरे जब सहलाए
ताप से तुम्हारे रात की औंस भी पिघल जाए

स्पर्श से तुम्हारे मेरा रोम- रोम पुलकित हो उठे
सीने में मेरे इन्द्रधनुष के सातों रंग खिल उठे

हृदय से छनकर पैगाम तुम्हारा जब आता है
गर्भ में मेरे कई नवजीवन खिला जाता है

मेघ का आवरण जब चेहरा तुम्हारा छुपा लेता है
दर्द विरह का रक्त रंजित आँखों में मेरी उतर जाता है

ढलती शाम तुम्हे क्षितिज पार मुझ से परे जब ले जाए
सीने की मेरी धधकती ज्वाला भी बुझ जाए

लालिमा तुम्हारी सुबह सवेरे जब मुझे जगाए
वजूद मेरा तुम्हारे वजूद में मिल जाए

जीवन धारा के हम चाहे अलग दो किनारे हैं
तुम्हारे प्रेम के रस में भीगे मेरे अलग नजारें हैं

सर्द रातों में मन मेरा तुम्हारी गर्म साँसों को तरसता
मेरी निर्जन आँखों से घायल हृदय का लहू बरसता

कोहरे भरी रातों में पूर्णिमा की चांदनी ना भाए
चमकते हुए तारों की परछाई भी मुझे डराए

मै धरा, तुम मेरे इष्ट देव

Saturday, 13 November, 2010

विश्वासघात












उस दिन प्रतिमा बहुत ख़ुश थी । अभी एक साल भी नहीं हुआ था उन्हें इस नई जगह पर आए हुए और एक साल के अन्दर-अन्दर न सिर्फ़ उन्होंने अपनी किताबों की दुकान अच्छी ख़ासी चला ली थी बल्कि अपनी ख़ुद की दुकान भी ख़रीद ली थी । प्रतिमा मन ही मन काफ़ी निश्चिन्त थी कि अब कम से कम दुकान के मालिक की हर महीने की चिक-चिक नहीं सुननी पड़ेगी । भगवान से वह यह भी प्रार्थना कर रही थी कि अगर उनका ख़ुद का घर भी ज़ल्द बन जाए तो कितना अच्छा रहेगा । नई दुकान ख़रीदने की ख़ुशी में उन्होंने दुकान पर ही छोटा-सा हवन और चाय-पानी का प्रोग्राम रखा था, जिसमें उनके वहाँ रहने वाले कुछ रिश्तेदार और उसके सास ससुर ही थे। दुकान ख़रीदने के लिए उन्होंने अपनी हिस्से की गाँव की ज़मीन बेच दी थी । प्रतिमा हवन के बाद सब को चाय आदि पूछ रही थी कि उसे बहुत हैरानी हुई जब उसने अंजलि को आते देखा । उसने तो वहाँ की अपनी किसी भी सहेली को नहीं बुलाया था । उसने सोचा था कि वह जब अपना घर ख़रीदेगी तभी सबको बुलाएगी । मन ही मन वह काफ़ी दुविधा में थी अंजलि को देखकर ।

अंजलि का बेटा आदित्य और उसका बेटा शिवम् एक ही कक्षा में पढ़ते थे । जब प्रतिमा अपने बेटे शिवम् को आदित्य के जन्मदिन पर उसके घर छोड़ने गई तब वह अंजलि से पहली बार मिली थी । पहली मुलाक़ात में ही उसे अंजलि एक पढ़ी-लिखी और आकर्षक व्यक्तित्व वाली महिला लगी थी।

अंजलि के पति का दो साल पहले एक कार एक्सीडेंट में देहाँत हो गया था । तब उसे उसके पति के बैंक में ही नौकरी मिल गई थी । अंजलि के पति नहीं थे बावजूद वह ख़ुद को काफ़ी सजा-संवार कर रखती थी । वह अपने बेटे और सास के साथ रहती थी।

धीरे-धीरे उनका एक दूसरे के घर आना-जाना बढ़ता गया । प्रतिमा को अंजलि के पति न होने की वजह से उससे हमदर्दी हो गई थी । प्रतिमा को भी बेटे के साथ-साथ अंजलि के रूप में नई जगह पर अच्छी सहेली मिल गई थी । अंजलि अपनी नौकरी के कारण इतना व्यस्त रहती कि आदित्य काफ़ी समय प्रतिमा के यहाँ ही बिताता था । कभी-कभी देर होने की वजह से उसके पति को आदित्य को घर छोड़ने जाना पड़ता ।

जब पहली बार राखी का त्यौहार आया तो आदित्य ज़िद करके अपनी मम्मी के साथ प्रतिमा की बेटी चंदा से राखी बंधवाने आ गया । आदित्य और चंदा में काफ़ी पटती थी । आदित्य भी चंदा को सगी बहन की तरह ही प्यार करता था । इस तरह दोनों परिवार थोड़े समय में ही आपस में काफ़ी घुल-मिल गए थे। कई बार प्रतिमा उसके पति और बच्चे घूमने जाते तो अंजलि और उसके बेटे को भी साथ ले लेते ।

कुछ दिनों बाद प्रतिमा की मेहनत और प्रयासों से उन्हें बच्चो के डीएवी स्कूल की किताबों का काम भी मिल गया था । वह आशुतोष की उसके काम में पूरी मेहनत से मदद करती । यदि आशुतोष स्कूल वाली दुकान संभालते तो वह अपनी पुरानी दुकान का काम देखती। प्रतिमा काफ़ी मेहनती थी वह दुकान के साथ-साथ घर और बच्चों की ज़िम्मेवारी भी बख़ूबी संभाल लेती थी। प्रतिमा एक अच्छे घर-परिवार की थी और काफ़ी पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ अपने पति और बच्चो की तरफ पूरी तरह समर्पित थी ।

अंजलि को आया देख उसे औपचारिकतावश उसका अभिवादन करना पड़ा । पर मन ही मन उसके हल-चल चलती रही कि अंजलि बिन बुलाए आख़िर वहाँ कैसे पहुँच गई । उस समय तो वह सबके सामने सहज होने का अभिनय करती रही पर ध्यान उसका इसी बात पर अटका रहा।

रात को जब सब काम निबटा कर वह ख़ाली हुई तो उसने आशुतोष को पूछ ही लिया कि अंजलि को किसने बुलाया था । आशुतोष कहने लगे, "हाँ प्रतिमा, मैं तुम्हें बताना भूल गया था उस दिन जब रात को काफ़ी देर हो गई थी और आदित्य को मैं छोड़ने गया तो अंजलि के बार-बार कहने पर मैं कुछ देर उनके घर बैठ गया । तब इधर- उधर की बातों में जब दुकान की बात निकली तो मैंने ही औपचारिकता वश उनको आने के लिए कह दिया था।"

प्रतिमा आशुतोष की बात पर कोई प्रतिक्रिया न कर सकी पर मन ही मन बेचैन -सी हो गई कि आख़िर अंजलि उसकी सहेली है तो जब तक प्रतिमा ने उसे आने के लिए नहीं कहा था तो उसे इस तरह आना शोभा नहीं देता था । उसकी बाक़ी सहेलियों को ख़ासकर मीनाक्षी को पता चलेगा तो उसे कितना बुरा लगेगा ।

कुछ दिनों से वह अंजलि और आशुतोष के व्यवहार में काफ़ी बदलाव महसूस कर रही थी जब कभी भी आदित्य को छोड़ने या अंजलि के घर का कोई भी काम होता तो आशुतोष काफ़ी उत्सुक हो जाते। अंजलि भी अब पहले की तरह प्रतिमा को फ़ोन नहीं करती थी। अब कोई काम होता तो वह सीधे आशुतोष को ही फ़ोन करके कह देती ।

एक दिन जब आदित्य को उसके घर छोड़ने जाना था तो उसकी बेटी चंदा ज़िद करने लगी," पापा, आज हम सब चलते है और हमे आइसक्रीम खिला कर लाओ,मम्मी भी चलेगी, प्लीज़ पापा, आज बहुत मन है आइसक्रीम खाने का..." उसकी ज़िद के कारण प्रतिमा और सब साथ में आइसक्रीम खाकर आदित्य को घर तक छोड़ने चले गए। आदित्य अपने घर पहुँच कर कहने लगा, "आंटी, आप तो कई दिनों बाद हमारे घर आई हो, अन्दर चलिए ना और मम्मी से भी मिल लीजिये।"

अन्दर चल कर वे लोग ड्राइंग रूम में बैठ गए । कुछ देर बाद अंजलि अपने कमरे से बाहर आई तो उसने बहुत ही महीन सी नाइटी पहनी थी जिसमें ना सिर्फ़ उसका गोरा बदन यहाँ तक कि उसके उरोज भी साफ़ दिखाई दे रहे थे । प्रतिमा को यह देखकर शर्म से पानी-पानी हो गई कि अंजलि को आशुतोष की तो कम से कम कोई शर्म करनी चाहिए थी। प्रतिमा का अंजलि की बेशर्मी देखकर वहाँ दम घुटने लगा और वह झट से खड़ी हो गई ।

प्रतिमा उस दिन से काफ़ी परेशान रहने लगी थी। एक दिन आशुतोष स्कूल वाली दुकान पर जाते समय प्रतिमा को पुरानी दुकान पर छोड़ गए ।कुछ देर बाद प्रतिमा को अपनी तबीयत ख़राब-सी लगने लगी, उस दिन दुकान पर कोई ख़ास काम भी नहीं था । उनकी दुकान के नज़दीक ही उसका घर था । कुछ देर तो उसने कोशिश की बैठने की पर जब हिम्मत जवाब देने लगी तो उसने सोचा कि कुछ देर के लिए घर चली जाती है और थोड़ी देर दवाई लेकर आराम करके बाद में आ जाएगी । वह नौकर को दुकान पर बैठकर घर चली गई । अक्सर उनके घर की चाबी वही गमले के नीचे पड़ी रहती थी । उस दिन घर पर भी कोई नहीं था क्योंकि बच्चे स्कूल गए थे । उसने देखा तो उसे चाबी वहाँ नहीं मिली कुछ देर तो वह ढूँढने की कोशिश करती रही । फिर उसने देखा तो पाया कि घर तो अन्दर से ही बंद है । जब उसने दरवाज़ा खटखटाया तो जो दृश्य उसे सामने नज़र आया उससे उसके पैरों तले की ज़मीन ही सरक गई । वह अंजलि और आशुतोष को वहाँ देखकर बिना कुछ बोले उलटे पाँव वापिस दुकान पर चली गई ।

उस दिन के बाद वह बहुत गुम-सुम रहने लगी । उसे यह सोचकर गहरा आघात पहुँचा कि जिस सहेली को बेसहारा समझ कर उसने सहारा देने की कोशिश की उसने उसी के साथ विश्वास-घात किया । और उसके पति आशुतोष जिनके हर सुख-दुःख में वह एक परछाई की तरह साथ निभाती रही उसी इंसान ने सही ग़लत का फ़र्क ख़त्म कर दिया । उसे मन ही मन आशुतोष से नफ़रत हो गई कि मर्द की तो जात ही ऐसी होती है । अगर उसकी आँखों के सामने ये सब चल रहा था तो चोरी-छिपे तो पता नहीं किन-किन औरतों के साथ हमबिस्तर हुए होंगे अभी तक । प्रतिमा बहुत दुखी रहने लगी । सारा दिन घर में पड़े रहना न किसी से बात करना न कहीं जाना, बस मन ही मन घुटते रहना । वह अन्दर से बुरी तरह टूट कर बिखर गई थी। कोई फ़ोन भी आता तो भी बात न करती ।

आशुतोष की मासी का वहीं पास में ही घर था उन्होंने जब वह इस अनजान जगह पर आए थे तो उनकी काम के लिए दुकान ढूँढने और घर की तलाश में काफ़ी मदद की थी । उस मासी का बेटा विक्रम और प्रतिमा कभी कालेज में साथ-साथ पढ़ते थे । एक दिन वह अचानक उनके घर चला आया और शिकायत करते हुए कहने लगा, " क्या बात है भाभी आज कल फ़ोन का जवाब भी नहीं देती मैं कबसे आपको फ़ोन कर रहा था । आपने फ़ोन नहीं उठाया तो मुझे चिंता होने लगी तो सोचा कि चल कर देखूँ तो सही कि माज़रा क्या है । दरवाज़ा भी आपने कितनी देर बाद खोला है । मम्मी भी आपको कई दिनों से याद कर रही थी ।"

प्रतिमा अपनी उदासी छुपाती हुई सहज होने का अभिनय करते हुए," नहीं विक्रम ऐसी कोई बात नहीं है । बस कुछ दिनों से तबीयत ठीक नहीं थी इसीलिए नहीं आ पाई ।"

विक्रम उसके चेहरे के भावो को पढ़ते हुए बोला, " क्यों झूठ बोल रही हो ? कोई बात तो ज़रूर है । आशुतोष के साथ कोई बात हुई है क्या ? मैं तुम्हे कालेज के ज़माने से जानता हूँ।"

प्रतिमा और विक्रम कालेज से ही एक दूसरे को अच्छे से जानते थे । शुरू से ही वह विक्रम को एक अच्छा दोस्त मानती थी परन्तु जब आशुतोष से उसका विवाह हो गया तो रिश्ते की मर्यादा के तहत वह विक्रम से दूरी बनाए रखती । विक्रम भी अब उसे उसका नाम लेकर बुलाने की बजाय भाभी कहकर बुलाता था ।

उस दिन इतने दुविधा भरे हालात में विक्रम को सामने देख कर वह ख़ुद को रोक नहीं पाई और भावुक होकर उसने अंजलि और आशुतोष वाला सारा किस्सा ब्यान कर दिया । प्रतिमा बात करते- करते अपने आँसुओं को रोक नहीं पा रही थी जो आंसू कब से उमड़ने के लिए बेचैन थे । विक्रम को प्रतिमा की ऐसी हालत पर तरस आने लगा और आशुतोष पर उसे बहुत गुस्सा आया । कि इतनी अच्छी, पढ़ी-लिखी और सुशील पत्नी को छोड़कर ये सब बातें क्या उसे शोभा देती है ? विक्रम को शुरू से ही प्रतिमा से लगाव रहा था पर उसके विवाह के बाद उसने अपने आपको सीमित कर लिया था और कभी भी कोई फ़ालतू बात करने की कोशिश तक नहीं की थी ।

विक्रम प्रतिमा की कहानी सुनकर एक बार तो जड़वत हो गया । उसे कुछ देर समझ नहीं आया कि वह क्या कहे फिर वह काफ़ी देर प्रतिमा के पास बैठा उसे सांत्वना देता रहा । उसे प्रतिमा की हालत काफ़ी चिंता जनक लगी कि कहीं मानसिक परेशानी के चलते वह कुछ उल्टा सीधा न कर ले। विक्रम की बातों से प्रतिमा थोड़ा संभल गई ।

प्रतिमा ने विक्रम को इस बारे में किसी से भी बात करने के लिए मना कर दिया यह सोचकर कि कहीं बात ज़्यादा न बिगड़ जाए। उस दिन के बाद विक्रम को प्रतिमा की चिंता रहने लगी । वह दिन में कई बार फ़ोन करके उससे उसका हाल पूछता और समय मिलता तो उसे मिलने चला आता । विक्रम की आत्मीयता से प्रतिमा को काफ़ी होंसला मिला कहते है न ढूबते को तिनके का सहारा।

जब ये बातें आशुतोष के कानो तक पहुंची कि विक्रम कई बार प्रतिमा से मिलने आ चुका है तो वह बहुत आग बबूला हुआ । पहले तो फ़ोन करके उसने विक्रम को बहुत बुरा भला कहा और फिर बहुत तैश में आकर घर पर आकर प्रतिमा को बुरा-भला कहने लगा, " क्या बात प्रतिमा आज कल विक्रम बहुत आने जाने लगा है, पुराना प्यार तो कहीं जाग नहीं रहा । मेरी ख़ूब बुराइयाँ कर रही होगी उसके सामने और वह भी पूरी हमदर्दी जता रहा होगा पुराना दोस्त जो ठहरा । एक बात को पकड़ कर बैठे रहना है तो बैठी रहो । रोती रहो सारा सारा दिन घर बैठकर, लोगों को जतला रही होगी कि तुम कितनी दुखी हो मेरे साथ और करलो जितना बदनाम करना है मुझे, जिस-जिस को भी जो बताना है मेरे बारे में बता दो तुम्हे शान्ति मिल जाएगी न ये सब करके।"

प्रतिमा के सब्र का बाँध टूटने लगा तो आशुतोष की शूल के समान चुबने वाली बातें सुनकर आख़िर प्रतिमा को बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा ।,"आशुतोष, तुम मर्द लोग भी बहुत अजीब होते हो जब तुम लोग बाहर जाकर दूसरी औरतों के साथ हमदर्दी करते हो और गुलछर्रे उड़ाते हो तो तुम्हें कुछ भी करने की छूट है क्योंकि तुम मर्द हो इसलिए। हमारा पुरुष प्रधान समाज भी बहुत अजीब क़ायदे क़ानून बनता है, दोहरापन फैला हुआ है हमारे समाज में । जब किसी अपने ने आकर तुम्हारी पत्नी से हमदर्दी से दो बोल बोले तो तुमसे बर्दाश्त नहीं हुआ। यदि विक्रम समय सिर आकर मुझे न संभालता तो पता नहीं तनाव में मैं क्या कर बैठती ।"

"हाँ हाँ सबको चिल्ला-चिल्ला कर बताओ कि मैं तुम्हे कितना दुखी रखता हूँ ।" कहते-कहते आशुतोष का हाथ प्रतिमा पर उठते-उठते रह गया।

प्रतिमा आशुतोष की ऐसी हरक़त पर एक दम से स्तब्ध रह गई और आख़िर इतने दिनों से जो गुभार प्रतिमा के अन्दर भरा पड़ा था वह लावा बन कर बाहर आ गया," आशुतोष तुम जैसे लोगों के लिए भावनाओं की कोई कद्र नहीं होती, तुम्हारे लिए तो प्यार सिर्फ़ ज़िस्म पाने का ही नाम होता है । यदि सही मायने में अंजलि से हमदर्दी है तो हिम्मत है तो जाओ उसके साथ रहकर दिखाओ । अरे तुम में कहाँ इतनी हिम्मत है पर अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह पाऊँगी क्योंकि प्यार ज़िस्म से नहीं आत्मा से होता है और जब किसी रिश्ते में प्यार ही न हो तो उसे मेरे हिसाब से उसे घसीटने से कोई लाभ नहीं । इसलिए हम दोनों के लिए बेहतर होगा कि हम दोनों अलग हो जाए ।"

Wednesday, 27 October, 2010

जीवन-धारा


मै इक नदी हूँ ऐसी
जल से भरी फिर भी प्यासी
ना जिसका कोई अंत ना जिसका कोई आदि !

जब हूँ निकलती पर्वतों की ऊँचाइयों से
लाखों कंकर अपने में समाए
गर्भ में अपने रेत के घर बसाए ,

कभी नागिन सा बल खाकर चलना
तो कभी गिरती हूँ बनकर झरना,

जब समुद्र का जल मुझ पर आन बरसे
तब हृदय मेरा मिलने को तरसे ,

बहती हूँ आवेग में तोड़ अपनी ही धारा
मुझे तो भाए उदधि का जल ही खारा ,

जिधर देख उधर हो जाता है जल- थल
झूम कर जब बहती हूँ मै कल- कल ,

मीलों दूर चल कर हो गई हूँ निढाल
मंजिल पाकर अपनी हो जाउंगी निहाल ,

वह मंझर तो कुछ ओर ही होगा
जब मेरा समुद्र में विसर्जन होगा ,


मै चाहती हूँ बस अब थम जाना
समुद्र के आगोश में बस जाना ,

कई नदी नाले मुझमे मिलते रहे
कई जीवन मुझसे बिछड़ते रहे ,

कई पशु, पक्षी, जीव अपनी प्यास बुझाते रहे
कई मुसाफिर अपनी मंजिल को पाते रहे ,

हूँ जल मग्न पर फिर भी हूँ जल रही ....
विरह की आग में हूँ तड़प रही ,

मुझे मत बांधो!
मुझे मत रोको!
मुझे बहने दो !

मेरे रुख को मत मोड़ो ....
मेरे हृदय को मत तोड़ो,

मुझे प्यार से बस जाने दो.....
मुझे मेरे अस्तित्व को पाने दो ,

मै आधी अधूरी ....
मुझे मत रोको .....
मुझे समुद्र में मिल जाने दो!

Sunday, 10 October, 2010

बदलते-रिश्ते


थोड़ी देर में सब अपनी- अपनी सीटों पर बैठे- बैठे सुस्ताने लगे तो ठंडी हवा के झोंके से महिमा भी आँखें मीचते ही अतीत की यादों में खो गई . जब वह राजकीय महा विद्यालय में पढ़ती थी और उसके बी. ऐ. द्वितीय वर्ष का परिणाम आने वाला था . हर बार की तरह उसे इस बार भी पूरा विश्वास था कि वह कक्षा में प्रथम ही आएगी पर उसे तब बहुत अचरज हुआ जब परिणाम घोषित हुआ तो उसे पता लगा कि उसकी ही कक्षा का लड़का सारांश प्रथम आया है . सारांश पढने में तो होशियार था ही, देखने में भी कक्षा के अन्य लड़कों के मुकाबले में काफ़ी स्मार्ट था . जहां महिमा स्वभाव वश अपने में और अपनी किताबों तक ही सीमित रहती थी, वहाँ सारांश उतना ही चुलबुला और सब मे घुलने मिलने वाला लड़का था . महिमा शुरू से ही मन ही मन उसे पसंद करती थी और उसके प्रथम आने के बाद से तो वह उससे बात करने के लिए मन ही मन मौके की तलाश में रहती . कभी नोट्स लेने के बहाने या फिर किसी विषय पर जानकारी हासिल करने के लिए मौका ढूँढती रहती . पर सारांश तो एक भँवरे की तरह एक डाल से दूसरी डाल पर मंडराता रहता . यह सब देख कर वह मन ही मन हताश हो जाती . उसके मन में हीन भावना सी बैठ गई कि शायद वह इतनी आकर्षक नहीं है कि सारांश जैसा बहुर्मुखी लड़का उसकी तरफ आकर्षित हो . मन ही मन वह दुखी होती पर कभी भी अपने मन की बात किसी से कह नहीं पाती .


उधर कई दिनों से महिमा महसूस कर रही थी कि उसकी ही कक्षा का साधारण सा दिखने वाला लड़का अरुण जब देखो उसी की ओर देख रहा होता है .अरुण के व्यवहार में कुछ दिनों से वह अजीब सा बदलाव देख रही थी, महिमा इस कारण कुछ असहज सा महसूस कर रही थी . एक दिन वह जब कालेज से अपने घर की तरफ जा रही थी तो अरुण अचानक उसके सामने आ गया और इतनी सरलता से उसने अपने प्यार का इजहार उसके सामने कर दिया कि वह एक दम से झेंप सी गई और कुछ समझ न पाई .पर मन ही मन उसे उसकी स्पष्टवादिता और हिम्मत पर भी बड़ी हैरानी हुई . उसे अरुण की आँखों में अपने लिए वही प्यार दिखाई दे रहा था जो वह सारांश की आँखों में देखना चाहती थी .जब महिमा ने सारी बात अपनी सहेली मोनिका को बताई तो वह बड़ी परिपक्वता से बोली ,
" देखो महिमा, जीवन में एक बात याद रखना कि एक लड़की के लिए सबसे ख़ुशी की बात तब ही होती है जब वह उस इंसान से प्यार करे ओर उसकी कद्र करे जो उसे निस्वार्थ चाहता हो न कि उस इंसान के पीछे भागे जिसे वह खुद पसंद करती हो . ये प्यार नहीं होता बल्कि मात्र कच्ची उम्र का आकर्षण भर ही होता है . "


महिमा को भी अरुण की सादगी और भोलापन भाने लगा . जब उसके कालेज के अंतिम वर्ष की परीक्षाएं चल रही थी तो अरुण ने महिमा के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया.
जब महिमा ने अपने घर में अरुण के बारे में बताया तो जैसे आसमान गिर गया हो . उसकी माँ ने अरुण के बारे में सुनकर साफ़ इन्कार कर दिया और कहने लगी ,
" महिमा तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया जरा सा पढ़ लिख क्या ली हो ?जात बिरादरी किसी चीज का ध्यान ही नहीं है तुम्हे. उसके घर का वातावरण , रहन- सहन कुछ भी तो हम लोगो से मेल नहीं खाता है . जात बिरादरी में हमारी क्या इज्जत रहेगी "


जब महिमा ने अरुण को घर में हुए हंगामे के बारे में बताया तो अरुण का दिल टूट गया . उसकी दीवानगी तो किसी मजनू से कम ना थी .महिमा अरुण के बर्ताव को देखकर डर गई कि वह कहीं कोई अनर्थ न कर बैठे . उसे भी इतने दिनों में उसके साथ एक लगाव पैदा हो गया था इसलिए वह उसे किसी कीमत पर भी दुखी नहीं देख सकती थी . आखिरकार बहुत सारे हंगामो के बाद वे दोनों विवाह बंधन में बंध गए .वे दोनों एक दूसरे को पाकर बेहद खुश थे परन्तु जात- बिरादरी का भेद दोनों की आपसी ख़ुशी और शान्ति भंग करने पर तुला था .
महिमा जब भी अपने मायके तरफ के किसी प्रोग्राम में शामिल होने जाती तो उसे और उसके पति को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती और कोई न कोई व्यंग्य बाण सुनने को मिल जाता . महिमा मन ही मन खून के घूँट पी कर रह जाती . जात बिरादरी को लेकर हर मौके पर अरुण को किसी न किसी तरह बेइज्जत किया जाता तो वह बहुत आहत होती. जबकि अरुण इतना सहनशील था कि वह उसके बारे में सोचती कि वह किस मिट्टी का बना हुआ है जो सब कुछ सुनकर भी उस पर कोई असर नहीं होता है और चुप रहता है .


ससुराल में भी अरुण के माता- पिता को ये बात हर समय सताती रहती कि उनके बेटे ने अपनी पसंद की लड़की से शादी की है इस कारण उनकी नजरों में महिमा के रूप और गुणों की कोई कद्र न थी .


एक बार जब अरुण के छोटे भाई के विवाह के लिए लड़की देखने की बात हुई तो सब लोग महिमा के सामने ही बार- बार यही राग अलापते रहते कि इस बार राकेश के लिए तो वे अपने मन पसंद की और अपनी बिरादरी की लड़की ही ब्याह कर लाएँगे जो कि इस घर के माहौल के हिसाब से रच बस जाए . यह सब सुनकर महिमा के सीने पर सांप लौटने लगते पर वह फिर भी किसी से कुछ न कह पाती .

.





महिमा अपने परिवार वालों के साथ बस में माँ वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए जा रही थी . महिमा के भाई अभिषेक के घर बेटी होने के पांच वर्षों बाद बेटा पैदा हुआ था . उसकी माँ तो पोता होने की ख़ुशी में जैसे बांवरी सी हो गई थी .सब सगे सम्बन्धियों , रिश्तेदारों मित्रों को मिठाई बांटते- बांटते बताती फिर रही थी ," पूरे तीस वर्षों बाद हमारे खानदान में चिराग पैदा हुआ है , बिलकुल अभिषेक जैसे नैन नक्श है ."
उसकी माँ तो बस सारा दिन अपने पोते को गोद में लेकर बैठी रहती . जब उसकी भाभी भी मुन्ने को दूध पिलाने के लिए पकड़ने लगती तो उसकी माँ हिदायत दिए बिना न रहती ,
" देख बहू ,मुन्ने को जरा आराम से गोद में उठाया करो और प्यार से उसे भर पेट दूध पीने दिया करो . घर के कामों की जल्दी मत किया करो आराम से होते रहेंगे. "


जब अभिषेक का बेटा छः महीने का हुआ तो उसके मुंडन के वास्ते उसकी माँ ने वैष्णो देवी जाने की अपनी मन्नत की बात की तो उसके भाई ने सब घर वालों के लिए एक मिनी बस का इंतजाम कर लिया था, वैसे भी वह घूमने फिरने का कुछ ज्यादा ही शौक़ीन था . अभिषेक ने एम. बी. ऐ. करने के बाद अपनी मेहनत और लगन से एक अच्छी खासी कंपनी चला ली थी . उसकी माँ अभिषेक की तरक्की देखकर फूली नहीं समाती थी . महिमा के पिता जी ने एक सरकारी मुलाजिम की तरह अपना जीवन बिताया था . इसलिए अभिषेक के कारण इतना ठाठ- बाट देखकर उनका सीना गर्व से चोडा हो जाता था . सब रिश्तेदार जो कल तक उसके माता- पिता को पास बिठाने में भी गुरेज करते थे वे भी अब किसी भी दिन त्यौहार में बार- बार उन्हें आने का न्यौता देते थे . .


मिनी बस में महिमा की दीदी का पूरा परिवार महिमा के पति अरुण और उसका बेटा अखिल साथ में थे . बस में भी महिमा की माँ किसी और को मुन्ने को पकड़ने ही नहीं दे रही थी . अगर कोई उसे खिलाना भी चाहता था तो कुछ ही देर में कोई न कोई बहाना बना कर उसे वापिस गोद में उठा लेती. इतनी उम्र हो जाने के बावजूद उसकी माँ में पोता होने के बाद अजीब सी ताकत आ गई थी . दीदी की बेटी रचिता तो बहुत खीज रही थी . वापिस आकर अपनी मम्मी से शिकायत करने लगी ,
" मम्मी, नानी तो मुन्ने के आने के बाद से पागल सी हो गई है, किसी और बच्चे की तरफ तो उनका ध्यान जाता ही नहीं है . मेरा मन मुन्ने को पकड़ने को हो रहा था तो मुझे डांट कर वापिस भगा दिया कि तुमसे चलती बस में झटका लगने से गिर जाएगा . अब देखो न मम्मी, मै कोई छोटी थोड़ा न हूँ कालेज में पड़ती हूँ "


महिमा के बेटे अखिल ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,
" हाँ मासी , नानी को पता नहीं क्या हो गया है किसी और से तो अब ढंग से बात ही नहीं करती, बड़ी घमंडी सी हो गई है "


महिमा की दीदी सुमन ने उसको डांटते हुए कहा , " चुप करो , नानी को ऐसे थोड़ा न बोलते हैं , अभी मुन्ना बहुत छोटा है इसलिए कह रही है . तुम लोग सब आराम से अपनी- अपनी सीटों पर बैठकर थोड़ी देर सो जाओ वर्ना इतना लम्बा सफ़र कैसे तय होगा "

तभी महिमा का बेटा अखिल मम्मी- मम्मी कहता हुआ आया , " मम्मी, आपको पापा कब से नीचे चाय पीने के लिए बुला रहे है, सब लोग कब के बस से नीचे उतर गए है और आप कहाँ खोई हुई हैं "




देखते- देखते जैसे- जैसे समय बीतता गया अभिषेक की कंपनी दिन- दूनी रात- चौगुनी उन्नति करती गई . महिमा को अब मायके का घर भी अपना सा न लगता क्योंकि वहाँ वक्त से सब कुछ तो बदल गया था . पिताजी के सरकारी नौकरी समय की सादगी भरी छाप मिट गई थी और सब चीजों पर पैसे की चमक- दमक की परत चढ़ गई थी . यहाँ तक कि महिमा के माता- पिता के बात करने का अंदाज भी बदल गया था . महिमा को अब अपने ही घर में इतने ऐशों- आराम होने के बावजूद घुटन महसूस होती पर वह माता- पिता की वजह से चुप हो जाती .
एक बार अभिषेक का अपने पार्टनर के साथ पैसों को लेकर झगड़ा इतना बढ गया कि पुलिस केस बन गया .उसके पार्टनर का कहना था कि उसने अभिषेक से कुछ पैसे बकाया लेने थे पर वह उसका हिसाब करना ही नहीं चाहता था . बात हाथा - पाई तक पहुँच गई तो सारी रात सबने जाग कर बिताई थी . सबकी सलाह थी कि बेवजह दुश्मनी मौल लेने से तो अच्छा था कि अभिषेक समय रहते ही पार्टनर का हिसाब चुकता कर देता तो बात इतनी न बढती . पर इतना सब होने के बावजूद महिमा की माँ पुत्र मोह के कारण अभिषेक का कसूर मानने की बजाय उसके पार्टनर को ही बुरा भला कहने लगी. उसकी माँ के इस तरह के व्यवहार के कारण ही शुरू से ही अभिषेक की हिम्मत बढती आई थी और वह भी महिमा की माँ की शह की वजह से कभी भी अपना कसूर नहीं मानता था .
उस पुलिस केस के कारण अभिषेक और उसकी पत्नी को कई बार कोर्ट- कचहरी के चक्कर काटने पड़े पर फिर भी केस सुलझने के कोई आसार न थे क्योंकि उसका पार्टनर तो पूरी तरह बदला लेने पर उतारू था . पर अभिषेक के दिमाग पर तो पैसे कमाने का भूत इस कदर सवार था कि उसका मानना था कि पैसा हो पास में तो वह किसी को भी खरीद सकता है इसलिए अभिषेक ने अब अपनी खुद की अलग कंपनी बना ली थी . उसका काम दिन पर दिन बढता जा रहा था . महिमा के भाई की तरक्की की बातें यहाँ तक कि उसके ससुराल तक पहुँच गई थी .सब लोग अभिषेक से बहुत प्रभावित थे . अब उसका रहन - सहन सब कुछ तो बदल गया था . महिमा के ससुराल में तो अभिषेक के मुकाबले का कोई नहीं था . आए दिन नई- नई गाड़ियां खरीदना अभिषेक का शौंक था .


महिमा के घर के पास ही उसकी सहेली अदिति रहती थी जो उसके ही घर पर अभिषेक से मिल चुकी थी . उसके कानो तक भी महिमा के भाई की शान- शौकत की बातें पहुँच गई थी . एक दिन तो बहुत अजीब बात हुई जब अदिति महिमा के पास अपनी नौकरी की सिफारिश करने पहुँच गई और कहने लगी ,
" महिमा , तुम्हे तो पता है कि मेरे पति का काम कुछ ख़ास चलता नहीं है इसलिए आज कल बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है . मै भी घर पर सारा दिन बैठे- बैठे बोर हो जाती हूँ यदि तुम अपने भाई को मेरी सिफारिश कर देती तो तुम्हारा बड़ा अहसान होता "
महिमा भी बचपन से पढने लिखने में होशियार थी और साथ ही साथ खुद्दार भी थी इसलिए वह किसी तरह भी अपने भाई से भी कोई अहसान नहीं लेना चाहती थी . उसने अदिति को टालते हुए कहा ,
" ठीक है तूँ कुछ दिन रुक, मै बात करके खुद ही तुझे बता दूँगी "


महिमा को उस समय बहुत हैरानी हुई जब उसे अपनी दूसरी सहेली से पता चला कि अदिति ने तो अभिषेक की कंपनी में जाना भी शुरू कर दिया है . महिमा को तो मानो काटो तो खून नहीं, उसे मन ही मन गुस्सा भी आ रहा था . कि न अभिषेक ने भी उससे कुछ बात करना मुनासिफ नहीं समझा . जब कई दिनों बाद महिमा की अभिषेक से बात हुई तो वह ऊपर से बड़े ही साधारण तरीके से कहने लगा ,
" महिमा क्या फर्क पड़ता है मुझे तो लोगो की जरुरत रहती ही है ,अगर अच्छा काम करेगी तो अच्छा ही है "
इस तरह कई दिन बीत जाने पर भी अदिति न कभी मुड कर उसके पास आई और महिमा के मन में इस तरह उसके लिए न चाहते हुए भी बड़ी कडवाहट भर गई कि लोग कितने मतलब खोर होते है .
धीरे- धीरे जैसे- जैसे समय बीतता गया महिमा के कानो में इधर- उधर से बातें पड़ने लगी कि जब से अदिति ने महिमा के भाई के यहाँ नौकरी की है उसके तो रंग- ढंग ही बदल गए है पहले कहाँ घर में खाने तक को न था और अब बहुत आधुनिक परिधान पहनने लगी है . मन ही मन महिमा को गुस्सा भी आता और हीन भावना की भी शिकार हो गई .
तब तो महिमा की बर्दाश्त ही खत्म हो गई जब उसके कानो में ये बात पड़ी कि अभिषेक अदिति को उसके घर तक छोड़ने आया है . आए दिन अदिति के बारे में कोई न कोई नई बात सुनने को मिल जाती थी कि महिमा के ये सब सुन- सुनकर कान पाक गए थे , वह इस बात से हर समय बेवजह ही परेशान रहने लगी .महिमा को पता था कि अभिषेक बहुत ही व्यवहारिक इंसान है, शादी भी उसने माता- पिता की पसंद से की थी और कभी किसी लड़की की तरफ आँख तक उठा कर नहीं देखता था . इस मामले में वह बहुत ही सख्त मिजाज का था . कई बार उसके मन में आया कि वह अभिषेक से इस बारे में बात करे पर उसे मालूम था कि वह उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं देगा क्योंकि उसके दिमाग पर तो आज कल पैसा चढ़ गया है . अभिषेक महिमा से तीन साल छोटा था फिर भी वह महिमा को मौका मिलने पर कहने में कसर नहीं छोड़ता था कि तुमने इतना पढ़ - लिख कर भी कौन सा तीर मार लिया और उसका मन ही मन मजाक उड़ाया करता था . जबकि बचपन से महिमा अभिषेक से हर लिहाज में यहाँ तक कि पढने में भी काफ़ी आगे थी .इस कारण वह उसे अपने सामने नाकामयाब ही समझता था .
बात उस समय बहुत बढ गई जब उसके बेटे अखिल ने आकर एक दिन रात के समय बताया ,
" मम्मी, मामा- मामी बच्चों के साथ अदिति आंटी के घर आए हुए है , देखो मम्मी ,हमारे घर तो अब कभी आते नहीं है "
महिमा से रहा नहीं गया कि आज अदिति उससे ज्यादा हो गई तो उसी समय उसने अभिषेक को फोन कर दिया , " अभिषेक तुम्हे अपनी इज्जत का भी बिलकुल ख्याल नहीं आया . अदिति को नौकरी पर रखने से पहले भी तुमने मुझे पूछना जरुरी नहीं समझा ,मै कब से तुम्हारे साथ बात करना चाह रही थी . अदिति और उसके पति को आस- पास के लोग पसंद नहीं करते है . उसका चाल- चलन भी कुछ ठीक नहीं है. तुम्हे लोग खामख्वाह उसके कारण बदनाम कर रहे है. मै तो ये सब सुनते- सुनते तंग आ गई हूँ .तुम भगवान् के वास्ते उससे दूर ही रहो "


बस इतनी बात सुननी क्या थी कि अभिषेक तो बहुत भड़क गया और वहाँ से उलटे पाँव घर लौट गया . महिमा की माँ को जब ये सब बातें अभिषेक ने बताई तो हमेशा की तरह माँ ने अभिषेक का साथ ही दिया और महिमा को कसूरवार मानते हुए उससे बात तक करना बंद कर दिया . इस बात को जब तीन- चार दिन बीत चुके थे तो अभिषेक काफ़ी बीमार हो गया जैसे कि पहले भी जब उसका पार्टनर के साथ झगड़ा हुआ था तब भी वह काफ़ी बीमार हो गया था कि उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था . बस तब क्या? अचानक से महिमा की मम्मी का फोन आया और महिमा को कहने लगी ,
" महिमा , देखो अभिषेक तुम्हारी बातों की वजह से काफ़ी परेशान था और आज वह इतना बीमार हो गया कि उसे डाक्टर ने अस्पताल में भर्ती कर लिया है . उसे यदि कुछ हो गया तो मै जीवन भर तुम्हे मॉफ नहीं करुँगी , इसलिए बेहतर होगा तुम अपनी गलती मान लो और अभिषेक से माफ़ी मांग लो "
अपनी माँ की बातें सुनकर महिमा के पैरों तले से जैसे जमीन निकल गई हो . क्या भारतीय समाज में लड़का ही सब होता है लड़की का कोई मोल नहीं ?. औरत को बार- बार अपने औरत होने का मोल क्यों चुकाना पड़ता है ,मायका हो चाहे ससुराल , पुरुष प्रधान समाज में औरत को ही क्यों अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है? . उसे रह- रहकर पुत्र मोह के कारण भरी सभा में द्रौपदी चीर हरण की बातें याद आने लगी . क्यों बार- बार औरत के सम्मान का चीर हरण होता है? .

Saturday, 4 September, 2010

प्रेम या वासना ?



अवंतिका को लेडी डाक्टर ने उसकी माँ की रिपोर्ट दिखाते हुए कहा ,
" अवंतिका, तुम्हारी माँ के पेट में रसोली है , जिसकी वजह से ही उनके पेट में दर्द रहता है . जल्द ही यदि इनका आपरेशन न किया गया तो यह कैंसर का रूप धारण कर सकता है "
डाक्टर की बातें सुनकर अवंतिका एक बार तो बहुत घबरा गई पर फिर उसने खुद को संभालते हुए डाक्टर से पूछा " डाक्टर साहिबा, ये रसोली किस वजह से बन गई है और आपरेशन के लिए कब का समय ठीक रहेगा . "
लेडी डाक्टर ने अवंतिका की बात के जवाब में कहा ,
" देखो रसोली होना भारतीय महिलाओं में काफ़ी आम है .वैसे तो इसमें कोई घबराने की बात नहीं होती पर समय से इसका इलाज करवाना जरुरी होता है . मासिक धर्म के दौरान गर्भाशय में एकत्रित खून कई बार पूरी तरह से बाहर नहीं आ पाता और अन्दर ही इकट्ठा होता रहता है और रसोली का रूप धारण कर लेता है . यह सब अंदरूनी कमजोरी की वजह से होता है . रसोली जब बड़ी होती जाती है तो इसे आपरेशन से बाहर निकालना जरुरी हो जाता है . भारतीय औरते खुद तो अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत लापरवाह रहती ही है और औरत के स्वास्थ्य को लेकर आदमी भी कई बातों से अनभिज्ञ रहते है . औरत एक माँ है इसलिए दोनों पति- पत्नी की बराबर की जिम्मेवारी होनी चाहिए तांकि भावी पीड़ी स्वस्थ रह सके . आपरेशन के लिए तुम आज शाम को अपनी माँ को दाखिल करवा दो और आपरेशन हम सुबह सात बजे करेंगे . बाकी सारी जानकारी तुम्हे काउंटर से मिल जाएगी ."
अवंतिका घर में बड़ी थी और कोई भाई न होने के कारण पिता जी के साथ हर छोटे- मोटे बाहर के कामो में हाथ बँटाती आई थी . जब फोन पर अवंतिका की बहिन अंकिता ने माँ की तकलीफ के बारे में बताया तो उससे रहा नहीं गया और अगली ही सुबह अपनी पांच वर्ष की बेटी को अपने पति प्रभाकर के पास छोड़कर मायके चली आई थी . प्रभाकर भी बहुत समझदार इंसान था और उसने अवंतिका के मन की हालत समझते हुए कहा था ,
" वहाँ तुम अपनी माँ को संभालोगी या फिर मेघा को इसलिए अच्छा होगा अगर इसे यहाँ मेरे पास छोड़ जाओ और जरुरत समझोगी तो मुझे फोन कर देना मै भी वहाँ आ जाऊँगा "
प्रभाकर की बातें सुनकर अवंतिका को बहुत तसल्ली मिली थी .
अवंतिका ने प्राइवेट नर्सिंग होम में अपनी माँ को आपरेशन के लिए दाखिल करवाने के लिए सारी औपचारिकताएँ पूरी की और अपनी बहिन अंकिता को वहाँ छोड़ कर जरुरी काम निबटाने के लिए बाजार चली गई .उसकी माँ ने उसे रोकते हुए कहा भी था , " अवंतिका , तुम अकेली क्या कुछ करती रहोगी, अंकिता को भी तो बाहर के कामो की जिम्मेवारी उठाने दिया करो "


अवंतिका कहने लगी , " नहीं माँ, कोई बात नहीं मै कर लूंगी और वैसे भी तुम्हारे पास बैठने को भी तो कोई होना चाहिए .और मै बाजार से सामान लेकर घर से होते हुए रात तक आ जाउंगी "
" नहीं अवंतिका. अब तुम रात को मत आना . घर पर ही पिताजी के पास रुक जाना . अंकिता तो है ही मेरे पास सुबह आ जाना . तुम भी थक गई होगी जब से आई हो भाग दौड़ में लगी हुई हो इसलिए घर पर आराम करना "
अवंतिका अपनी माँ को कहने लगी ,
" नहीं माँ , रात को मै ही तुम्हारे पास रुकूँगी, अगर किसी चीज की अचानक जरुरत पड़ी तो तुम्हे दिक्कत हो जाएगी और अंकिता घर पर पिताजी के पास चली जाएगी ."
यह कहते हुए अवंतिका बाहर निकल गई .
अवंतिका जब घर का सामान खरीद रही थी तो अचानक उसकी निगाह नरेन् पर पड़ी तो वह कुछ घबरा सी गई . पर उसे वह अनदेखा कर सामान खरीदने में व्यस्त रही . जैसे ही वह बिल देकर दुकान से बाहर निकल रही थी तो नरेन् पहले से ही बाहर खड़ा था . ऐसा लग रहा था जैसे वह उसका ही इन्तजार कर रहा था . वह ऊपर देखे बिना एक तरफ से तेजी से निकालने लगी तो नरेन् बिल्कुल उसके सामने आ गया . अवंतिका एक बार तो बिल्कुल झेंप सी गई कि क्या करे. वह सामने आ कर कहने लगा ,
" क्या बात अवंतिका बात नहीं करोगी मुझसे . कैसी हो और आजकल कहाँ पर हो "
अवंतिका उसकी किसी बात का उत्तर नहीं देना चाहती थी . नरेन् तो जैसे उसके पीछे ही पड़ गया मानो वो पहले से ही सोच कर आया था . वह बार- बार उससे आग्रह करने लगा . आखिर अवंतिका को अपना मुँह खोलना ही पड़ा . ," नरेन् , प्लीज मुझे परेशान मत करो और मुझे तुमसे कोई भी बात नहीं करनी . खामख्वाह तमाशा मत करो, सब लोग देख रहे है "
" मुझे पता है अवंतिका कि तुम मुझसे नफरत करती हो और क्यों ना करो, पर इंसानियत के नाते ही क्या मुझे अपनी बात कहने का मौका भी नहीं दोगी . प्लीज अवंतिका मुझे एक मौका देदो वरना मै चैन से जी नहीं पाऊंगा "
अवंतिका अब थोड़ा नर्म पड़ गई थी ,
" नरेन्, मेरी माँ का कल आपरेशन है इसलिए मै काफी व्यस्त हूँ "
" अवंतिका, मै तुम्हारे सिर्फ दस मिनट लूँगा और तुम्हे कोई परेशानी नहीं होगी . मै भी तुम्हारे साथ तुम्हारी माँ से मिलने चलूँगा और तुम्हे तुम्हारे घर छोड़ दूंगा "


पता नहीं फिर अवंतिका चाह कर भी नरेन् का कहा टाल नहीं सकी .
" चलो अवंतिका वहाँ पास में ही पार्क है , वहाँ चल कर बैठते है "
अवंतिका नरेन् से पहली बार उनकी कालोनी के एक प्रोग्राम में मिली थी . नरेन् वहाँ पर राजनैतिक तौर पर काफी सक्रिय था . वह उनकी कालोनी में होने वाले आजादी के दिवस के कार्यक्रम में बतौर मुख्य मेहमान शामिल होने आया था . अवंतिका शुरू से ही इस तरह के कार्यक्रमों में बढ- चढ़ कर हिस्सा लेती थी .बचपन से ही उसे नाचने का बहुत शौक था . छोटी- छोटी लड़कियों के प्रोग्राम तैयार करवाना और उन्हें सजाना- संवारना उसे बहुत पसंद था .
नरेन् उस क्षेत्र का जाना- माना नाम था . छोटी सी उम्र में ही उसने अपनी काबलियत के दम पर काफी सफलता हासिल कर ली थी . क्षेत्रीय चुनावों में तो हर बार उसकी जीत का परचम लहराता था . बड़े- बड़े नेताओं के साथ उसकी काफी घनिष्ठता थी .अवंतिका अपनी पढाई पूरी करने के बाद ही वहीँ पर ही एक बैंक की क्रैडिट कार्ड की शाखा में लग गई थी .
अवंतिका और नरेन् इस तरह के कई कार्यक्रमों में एक दूसरे को अक्सर मिलते रहते थे .नरेन् एक आकर्षक व्यक्तित्व वाला इंसान था . अवंतिका के मन में उसे देखकर एक अजीब सी कशिश पैदा होती थी . परन्तु घर की जिम्मेवारियों के चलते उसने अपने सामने भी अपनी भावनाओं को कभी उजागर होने का मौका नहीं दिया था . नरेन् के लिए उसके मन में जो भी भावना उठती वह उसे भीतर ही भीतर दबा देती. उधर नरेन् ने भी कभी औपचारिक बातों के अलावा अवंतिका से कोई और बात करने की कभी कोई कौशिश नहीं की थी .बेशक वे एक दूसरे से कभी ख़ास बात नहीं करते थे पर दोनों की नजरें एक दूसरे को ढूँढ़ते- ढूंढते हर बार आपस में जरुर टकरा जाती थी .
एक बार एक प्रोग्राम के बाद अवंतिका ने अपने बैकं के काम के सिलसिले में नरेन् से उसका फोन नंबर माँगा और कहने लगी कि वह आफ़िस से उसे फोन करेगी . मार्च का महीना लगभग आधा बीत चुका था . अवंतिका को अपना विदित टार्गेट पूरा करना था , इसलिए उसने सोचा कि नरेन् की तो काफी जान पहचान है तो क्यों ना उससे मदद ले ले .
अवंतिका नरेन् से फोन पर बात करते हुए काफी झेंप रही थी कि नरेन् पता नहीं उसके बारे में क्या सोचेगा , फिर भी उसने हिम्मत करके उसे फोन किया और अपने क्रेडिट कार्ड के टार्गेट के बारे में बताया तो नरेन् झट से आगे से बोला ,
" अवंतिका ,मुझे तुम्हारे आफ़िस के पास ही कुछ देर में किसी जरुरी काम से आना है, तुम अपने आफ़िस का पूरा पता बता दो, मै समय निकाल कर तुमसे मिलने आता हूँ "


इस तरह नरेन् ने उसके काम में ना सिर्फ उसकी मदद की बल्कि जब भी समय मिलता वह उसके आफ़िस उससे मिलने पहुँच जाता . अवंतिका के मन में नरेन् के लिए ख़ास जगह बन गई थी . वह इतना रुतबे वाला होने के बावजूद भी बहुत ही साधारण तरीके से रहता था. कभी भी उसने और लोगों की तरह फ़ालतू या बेहूदा बात नहीं की थी
.एक बार अवंतिका ने जब कुछ पूछने के लिए नरेन् को फोन किया तो वह कहने लगा ,
" अवंतिका तुम्हारे आफ़िस में बहुत भीढ़ रहती है और सब लोग अजीब तरीके से देखने लगते है इसलिए अगर तुम्हे ऐतराज ना हो तो आज कहीं बाहर बैठकर काफी पीतें हैं . तुम्हारे आफ़िस के पास ही एक महफ़िल रेस्टोरेंट है, क्यों ना वहाँ चल कर बैठे . अगर तुम ठीक समझो तभी "
अवंतिका उसका कहना ना टाल सकी और उसने हामी भर दी. जब अवंतिका वहाँ पहुँची तो देखा नरेन् पहले से ही उसका इन्तजार कर रहा था . दोनों जब बैठे तो बातों में उन्हें पता ही ना चला कि कब तीन घंटे बीत गए . अवंतिका को अपने आफ़िस में कुछ देर का काम था सो मजबूरन उसे वहाँ से ना चाहते हुए उठना पड़ा .
उस दिन के बाद तो जैसे दोनों अपने आप को रोक ना पाए और मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया . अगली बार तो नरेन् अपनी नई कार में अवंतिका को खुद उसके आफ़िस लेने के लिए पहुँच गया . अवंतिका ने नरेन् को खुद कभी कार चलाते हुए नहीं देखा था . उसके पास हर समय सरकारी गाडी और ड्राइवर रहते थे .
अवंतिका इससे पहले कभी किसी के साथ इस तरह गाडी में नहीं बैठी थी . नरेन् अवंतिका के गाडी में बैठते ही कहने लगा ,
" अवंतिका आज बहुत समय बाद सिर्फ तुम्हारी खातिर कार चलाई है और ड्राइवर को बहाना बना कर छोड़ कर आया हूँ "
दोनों कुछ दूरी पर ही एक पार्क में चल कर बैठ गए . . नरेन् ने अपना फोन वहाँ कार में ही छोड़ दिया क्योंकि वह अक्सर फोन पर बहुत व्यस्त रहता था . .वे दोनों एक कोने में घने पेड़ों के नीचे हरी घास में चल कर बैठ गए . कुछ देर तो दोनों प्राकृतिक माहौल में अपने विचारों के साथ ताल मेल बिठाते हुए खामोश बैठे रहे .अवंतिका तो बहुत असहज महसूस कर रही थी .फिर नरेन् ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा ,
" अवंतिका क्या सोच रही हो . इतना घबरा क्यों रही हो . तुम मुझे पहले दिन से ही बहुत अच्छी लगती थी पर कभी कह ना सका कि ना जाने तुम क्या सोच बैठो .एक तो राजनीति के कारण मै काफी व्यस्त रहता हूँ चाह कर भी समय निकालना मुश्किल हो जाता है ."
" अवंतिका हरा रंग तुम पर कितना खिल रहा है . तुम वाकई कितनी खूबसूरत हो . तुम्हारे लम्बे घने बाल , सिर पैर तक तुम खूबसूरती की मूरत हो . मै जीवन भर तुम्हारा साथ निभाना चाहता हूँ "

अवंतिका नरेन् की बातें सुनकर मन ही मन सिमट रही थी और जैसे उसकी जुबान को ताला लग गया हो. वह शर्म से लाल हो रही थी और उसकी सांस इतनी तेज चल रही थी कि उसकी आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी.
अचानक नरेन् ने अवंतिका का हाथ अपने हाथ में ले लिया तो उसकी सांस तेज चलते- चलते जैसे एक दम से थम गई हो. अभी वह संभल भी नहीं पाई थी कि नरेन् ने धीरे- धीरे उसके पास सरकते- सरकते उसके गालों को चूम लिया . अवंतिका को ऐसे लग रहा था कि वह जैसे एक नदी की तरह बहती जा रही है . फिर अचानक उसके दिमाग में हरकत सी हुई तो उसने खुद को संभाला और इस डर से कि कहीं वह खो न जाए, वह एकदम से उठ खड़ी हुई यह कहते हुए ,
" नरेन्, बस अब चलते हैं काफ़ी देर हो गई है , घर पर सब इन्तजार कर रहे होंगे "
नरेन् अवंतिका को घबराया हुआ देख कर उसे हौंसला देते हुए बोला ,
" अरे ,डरो मत मै तुम्हे तुम्हारे घर तक छोड़ दूँगा "
उसके बाद कार में पूरे रास्ते अवंतिका नरेन् से नजरे न मिला पाई और उसकी किसी भी बात के जवाब में बस सर हिला देती . उसे लग रहा था कि जैसे उसका पूरा बदन अभी तक काँप रहा हो .
अवंतिका ने डर के मारे नरेन् को घर से दूर ही उतार देने को कहा और जैसे- तैसे वह अपने कांपते क़दमों को घसीटते- घसीटते अपने घर तक पहुंची .घर पर भी किसी से बात करने का उसका मन नहीं हो रहा था . अपनी माँ के पूछने पर अवंतिका कहने लगी ,
" कुछ नहीं माँ,सिर में दर्द है थोड़ी देर आराम कर लूँ फिर ठीक हो जाएगा "
यह कहकर वह अपने कमरे में जाते ही बिस्तर पर औंधे मुँह गिर पड़ी और रह- रहकर नरेन् के साथ बीते पल उसके मन पटल पर घूम रहे थे . जैसे ही वह उस क्षण के बारे में सोचती एक अजीब सी सिरहन उसके पूरे बदन में उठती थी .
इस तरह लाख कोशिशों के बावजूद भी वह खुद को नरेन् के प्यार की गिरफ्त में पढने से रोक न पाई . अब तो हर समय सोते- जागते, उठते- बैठते बस नरेन् का ख्याल उसके मन में घूमता रहता . नरेन् तो जैसे अब उसकी जिन्दगी बन गया था . वे दोनों अब कभी पार्क में कभी रेस्टोरेंट में मिलने लगे . हालंकि नरेन् काफ़ी व्यस्त रहता था पर फिर भी वह अवंतिका को मिलने को व्याकुल रहता . बेशक वह अवंतिका को ज्यादा समय के लिए नहीं मिल पाता था . अवंतिका हर समय नरेन् को मिलने को बेचैन रहती .


नरेन् की शहर में काफ़ी जान पहचान थी इस लिए नरेन् ने एक बार अवंतिका से कहा कि इस तरह खुले आम मिलना काफ़ी खतरे से भरा है कि कहीं कोई मुसीबत न खड़ी हो जाए . अवंतिका खुद भी तो हर समय डरती रहती थी कि कहीं उसे नरेन् से साथ कोई जान पहचान वाला न देख ले . फिर नरेन् ने एक दिन अवंतिका से कहा ,
" मेरे एक दोस्त का फ़्लैट खाली पड़ा है मै उसकी चाबी ले लेता हूँ वहां पर किसी का डर नहीं होगा . मै तुम्हे वहाँ का पता बता देता हूँ तुम सीधे वहाँ पहुँच जाना ."
अवंतिका इतने समय में इतनी दूर निकल आई थी कि उसे खुद से ज्यादा नरेन् पर भरोसा हो गया था , इसलिए वह बिना हिचकिचाए नरेन् को मिलने वहाँ पहुँच गई . फ़्लैट में जब दोनों एक दूसरे के एक दम बेहद करीब बिलकुल अकेले थे तो किस तरह अपनी भावनाओं पर काबू रख सकते थे और इस तरह अवंतिका अपना सब कुछ नरेन् के सपुर्द कर बैठी .
अवंतिका ने जिस बात की कभी कल्पना भी नहीं की थी उस दिन के बाद नरेन् अवंतिका से कतराने लगा . खुद फोन तो क्या उसने अवंतिका के किसी भी फोन या मेसेज का जवाब तक देना बंद कर दिया . नरेन् ने तो जैसे न बोलने की कसम ही खा ली थी . अवंतिका के किसी भी सवाल का वह जवाब न देता . अवंतिका तो जैसे पागल सी होने को हो गई. भोली -भाली अवंतिका की समझ में कुछ न आता कि ऐसी क्या वजह या मजबूरी हो गई कि नरेन् ने एक दम चुप्पी धारण कर ली .कम से कम वह कोई कारण तो उसे बताता तो वह खुद ही उसके रास्ते से हट जाती .दिन रात उसको यही बात अन्दर ही अन्दर खाती रहती. उसको मन ही मन खुद से भी नफरत होने लगी कि क्या नरेन् का मकसद सिर्फ उसके जिस्म को पाना ही था . क्या नरेन् पर विश्वास करने का उसे ये सिला मिला कि वह किस तरह उसे इस्तेमाल करके बेवकूफ बना कर फैंक कर चला गया .
अवंतिका एक दम से चुप- चाप रहने लगी . अब किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेना तो दूर की बात वह अब कहीं न जाती . बस घर से आफिस और सारा दिन मन ही मन घुटते रहना यही उसकी दिनचर्या बन कर रह गई थी . वह तो जैसे एक जिंदा लाश सी बन गई थी .इतना सब कुछ होने पर भी उसे नरेन् का इन्तजार रहता कि शायद वह उसके पास लौट आए . पूरा एक वर्ष लगा उसे नरेन् की यादों से खुद को बाहर निकालने में .
फिर प्रभाकर से उसकी शादी हो गई और उसने खुद को पूरी तरह अपनी घर गृहस्थी के हवाले कर दिया .प्रभाकर ने भी अवंतिका को कभी किसी तरह की कोई कमी महसूस न होने दी थी .अवंतिका अपने सब फर्ज पूरा करती पर किसी से भी न कोई उम्मीद करती न ही किसी से कोई शिकायत करती . .
आज नरेन् फिर से इतने वर्षों बाद उसके सामने आकर खड़ा हो गया था . उसके मन मस्तिष्क पर नरेन् को देखकर पुरानी यादें फिर से उमड़ने लगी .


पार्क में एक तरफ वे दोनों एक बैंच पर जाकर बैठ गए. अवंतिका काफ़ी परेशान हो रही थी कि नरेन् जल्दी से जो कहना है वह कह डाले . कुछ देर जब नरेन् कुछ न बोला तो अवंतिका को ही आखिर बोलना पड़ा ,
" देखो नरेन् मेरे पास न तो ज्यादा वक्त है न ही मेरी कोई दिलचस्पी है तुम्हारी बातें सुनने में , क्योंकि बीती बातें उखेड़ने से अब क्या लाभ ? "
नरेन् मन ही मन काफ़ी बेचैन सा लग रहा था पर जैसे उसने मन में ठान रखा हो कि अपनी बात कहकर ही मानेगा , नरेन् ने कहना शुरू किया ,
" अवंतिका मुझे पता है तुम मुझसे नफरत करती हो और क्यों न करो मै तुम्हारा गुनाहगार हूँ . मै तो तुम्हारी माफ़ी का भी हकदार नहीं हूँ . मैंने जो तुम्हारे साथ किया था तुमने तो कभी मुड़कर मुझसे कोई शिकायत नहीं की थी पर मुझे मेरे किए की सजा भगवान् ने दे दी है "
" नरेन् अच्छा होगा तुम ज्यादा पहेलियाँ मत बुझाओ क्योंकि मुझे मेरी माँ के पास जल्द पहुँचना है , अच्छा होगा तुम जल्दी अपनी बात समाप्त कर दो "
" अवंतिका तुम्हे क्या पता मै कितने समय से तुम्हारा इन्तजार कर रहा था . मेरे दिल पर कब से एक बोझ था , हर समय, हर जगह मेरी नजरें तुम्हे तलाशती रहती थी . हर रोज सुबह उठकर भगवान् से यही प्रार्थना करता था कि काश तुमसे मुलाक़ात हो जाए और आज भगवान् ने मेरी सुनली "
अवंतिका ने उसे बीच में टोकते हुए कहा , " नरेन् अब इन बातों का क्या फायदा मै बहुत पहले सब बातों को भूल चुकी हूँ और साथ में बीता हुआ समय तो दोबारा वापिस आने से रहा "
" नहीं अवंतिका, अगर आज मै अपना मन हल्का न कर पाया तो तमाम उम्र सकून से जी नहीं पाऊंगा . प्लीस ,मुझे रोको मत , मै उस समय अपने पद और रुतबे के नशे में अँधा हो गया था . मुझे अपनी कुर्सी से बहुत प्यार था और उसी कुर्सी के लालच ने मुझे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया , हमारे क्षेत्र के मंत्री जी मेरे काफ़ी करीब थे उन्होंने एक दिन अपनी बेटी के लिए मेरा हाथ मांग लिया और यह सोचकर मै इन्कार न कर सका कि इतने बड़े नेता का दामाद बनना तो बहुत सौभाग्य की बात है . . मेरी पत्नी मंजुला विदेश में ही बचपन से पली- बढ़ी थी इसलिए उसके रंग- ढंग भी पूरे विदेशी ही थे .
मंत्री जी को मैंने दामाद का फर्ज निभाते हुए चुनावों में भारी विजय दिलवाई थी .उनके लिए मैंने रात- दिन एक कर दिया था . मंजुला के रंग- ढंग तो बस मेरी बर्दाश्त के बाहर होने लगे पर मेरी फिर भी क्या मजाल थी कि मंत्री की बेटी से कुछ कहता . वह ज्यादा समय तो विदेश में ही रहती और पूरी तरह अपनी मन मानी करती . जब इस बारे में मैंने अपने ससुर से बात करनी चाही तो उन्होंने जैसा कि उम्मीद थी अपनी बेटी की ही हिमायत की . मंजुला को मेरा कोई भी बात कहना बिलकुल बर्दाश्त नहीं था . बाप- बेटी दोनों मुझे अपने इशारों पर नचाना चाहते थे . जब मैंने जरा सा विरोध किया तो मंत्री ने दूध में से मक्खी की तरह मुझे बाहर निकाल फैंका .जो इज्जत, पैसा, शोहरत मैंने अपने बलबूते पर कमाए थे वो भी ख़ाक हो गए . बस उस मंत्री ने मुझे सड़क पर लाकर बैठा दिया , मुझे उस समय तुम्हारी याद आई कि जो मैंने तुम्हारे साथ किया भगवान् ने मुझे उसका फल दे दिया ".
अवंतिका, मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा है इसलिए मै पश्चाताप करना चाहता हूँ "
नरेन् की बातें सुनकर अवंतिका भी भावुक हो गई और कहने लगी ,
" नरेन् मैंने तुम्हे सच्चे दिल से प्यार किया था और तुम्हे भुलाने में मुझे बहुत वक्त लगा था पर आज मेरी अलग दुनिया है . मेरी एक बेटी है और बहुत प्यार करने वाले पति है . रही बात माफ़ी की तो तुम्हारा प्रायश्चित ही तुम्हारी माफ़ी है .'
नरेन् के बस आंसू नहीं निकले पर वह बहुत ज्यादा भावुक हो रहा था यह कहते- कहते "अवंतिका , तुम्हे खो देना मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी इसलिए मै आजकल तुम्हारे वाले बैंक में ही नौकरी करने लगा हूँ . वहाँ पर काम करने से मुझे अजीब सा सकून मिलता है . अब तो तुम्हारे साथ बिताए वो हसीन पल ही मेरे जीने का सहारा है और तुम्हारी यादें मेरे साथ मरते दम तक रहेगी "
इतने में अवंतिका उठ खड़ी हुई ये कहते हुए , " अच्छा नरेन् मेरे हिसाब से अब मुझे चलना चाहिए, वक्त काफ़ी बीत चुका है "

Monday, 2 August, 2010

मिथ्याभिमान



जब उन दोनों ने जन सुविधा के कैम्प में प्रवेश किया तो देखा वहाँ बहुत भीड़ थी और एक स्टेज पर शहर की जानी मानी हस्तियाँ विराजमान थी .अनामिका बेशक कभी किसी को निजी तौर पर मिली नहीं थी पर उसे बचपन से ही अखबार पड़ने का शौक था इसलिए वह कुछ ख़ास लोगों को पहचानती थी .
अनामिका और नेहा टैंट के भीतर लगी हुई कुर्सियों पर जाकर बैठ गई और अपनी बारी का इन्तजार करने लगी .एक तरफ टैंट में सरकारी अधिकारियों से काम करवाने वालों की भीड़ थी तो उधर दूसरी तरफ स्टेज पर माइक में बार- बार कुछ न कुछ घोषणा की जा रही थी और कुछ स्थानीय नेता बारी- बारी से अपना भाषण दे रहे थे. अनामिका ने देखा कि स्टेज में बैठे लोगों में से सिर्फ दो ही औरतें हैं .

यह सब देख कर उसे अपने कालेज के दिन याद आ गए.. वह अपने कालेज के होनहार विद्यार्थियों में से एक थी और हर गतिविधियों में बढ़चढ़ कर भाग लेती थी .और स्टेज पर चढ़कर भाषण देने का तो उसे ख़ास शौक था . किसी भी विषय पर वह ऑन दी स्पाट ही एक भाषण तैयार कर लेती थी . उसकी बुद्धिमता के कारण अध्यापक गण उसकी शरारतों को ना सिर्फ नजर अंदाज कर देते थे बल्कि वह उनकी प्रिय शिष्या भी थी .

मगर जैसे ही कालेज की पढाई खत्म हुई वैसे ही वह जयंत के साथ विवाह बंधन में बंध गई .धीरे- धीरे वह दिन प्रतिदिन अपनी घर - गृहस्थी में उलझती गई .बच्चों की परवरिश और घर की जिम्मेवारियां संभालते- संभालते वह समय से पहले ही अपनी उम्र के हिसाब से बड़ी दिखने लगी .परिपक्वता आने की बजाय उसमे एक खालीपन सा समाने लगा .उसे ऐसा लगता कि वह केवल एक त्याग की मूर्ति बन कर रह गई है .उसका जीवन व्यर्थ बीतता जा रहा था . उसके बचपन से लेकर जवानी के सपने सब मिट्टी में मिल रहे थे. वह देश और समाज को लेकर कितनी बड़ी- बड़ी बातें किया करती थी . वह अपने जीवन को एक नया आयाम देना चाहती थी, अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहती थी , कुछ कर दिखाना चाहती थी . उसे लगने लगा था कि श्रीमति जयंत के अलावा उसकी अपनी खुद की तो कोई पहचान है ही नहीं . मगर घर के संकीर्ण माहौल और जयंत के दकियानूसी विचारों के कारण वह खुद को बहुत असहाय महसूस करती थी .वह बहुत उर्जावान और जोशीली थी मगर वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही थी . अच्छा खासा खुशहाल परिवार होने के बावजूद उसे एक कमी सी महसूस होती थी

इसी दौरान जब वह अपनी दोनों बेटियों की पढाई को लेकर बहुत व्यस्त थी कि एक दिन उसे अपनी सहेली नेहा के कहने पर एक जन सुविधा कैम्प में जाना पड़ा . नेहा को अपना पहचान पात्र बनवाना था . उसके लिए उसे क्षेत्र के विधायक महोदय से हस्ताक्षर करवाने थे. नेहा का बचपन एक छोटे से गाँव में बीता था इसीलिए वह बात करने में मन ही मन घबरा रही थी और अनामिका से कहने लगी कि तुम मेरा एक काम कर देना . मेरे लिए इस प्रार्थना पात्र पर विधायक महोदय के हस्ताक्षर करवा लाना . अनामिका उससे मजाक करते हुए कहने लगी क्यों मै कोई यहाँ पर सब को जानती हूँ और तुम तो यहाँ इस शहर में कई सालों से रह रही हो और मै तो अभी नई- नई आई हूँ किसी को ख़ास जानती भी नहीं .

जैसे ही नेहा के नाम की घोषणा हुई तो वह उठ खड़ी हुई और अनामिका से भी अपने साथ चलने को कहने लगी , " अनामिका, तुम चलो न मेरे साथ, मै तो वहाँ जाकर कुछ बोल भी नहीं पाउंगी समझाना तो बहुत दूर की बात है .
अनामिका उसका आग्रह टाल नहीं सकी . यूँ तो वह बचपन से ही आत्मविश्वास से भरी थी .और अपनी बात कहने में तो उसे अजब सी महारथ हासिल थी . उसने नेहा से उसके कागज़ लेकर खुद पकड़ लिए और स्टेज पर जाकर विधायक महोदय को औपचारिकता वश अभिवादन कर पहचान पत्र बनाने में आने वाली कठनाइयां समझाने लगी . ," सर, आप तो जानते हैं कि आम आदमी को अपना कोई भी काम करवाने में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है , ये सरकारी मुलाजिम कहाँ किसी की बात इतनी आसानी से सुनते हैं . कितने- कितने चक्कर काटने पड़ते है एक मामूली से काम के लिए फिर ऊपर से इन सरकारी मुलाजिमों की जब तक जेब गर्म न करो तो कोई काम नहीं बनता . अगर कोई बेचारा इन लोगों को पैसे देने की हैसियत ना रखता हो तो उसकी तो इन चक्करों में चप्पले भी टूट जाती है और काम फिर भी नहीं बनता. सर अगर आप इन कागजों पर अपने हस्ताक्षर कर देते तो मेरी सहेली का काम आसानी से हो जाता . "

विधायक महोदय उसकी वाक् कुशलता से इतने प्रभावित हुए कि एक मिनट की देरी किए बिना उन कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए . अनामिका ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी . बस फिर तो उसका आत्मविश्वास और भी बढ गया और विधायक महोदय को लोगों को पेश आने वाली अन्य समस्याओं से अवगत करवाने लगी . उसकी बात सुनकर विधायक महोदय बोले ,
" मैडम , मै आपकी सभी बातों से शत प्रतिशत सहमत हूँ परन्तु बेहतर होता यदि आप अपने विचार वहाँ माइक पर जा कर व्यक्त करती जिससे सभी अफसर गण भी इन बातों को जान पाते . हमे आप जैसे लोगों की ही तो जरूरत है जो समाज और देश के लिए इतनी चिंता करते है और कुछ कर दिखाने की क़ाबलियत भी रखते हैं . "

विधायक महोदय की बातें सुनकर एक बार तो वह कुछ देर के लिए हिचकिचाई कि कहीं कुछ गलत न हो जाए . मन ही मन सोचने लगी कि इतने जाने माने लोग इस सभा में बैठे है कहीं उसका मजाक ही न बन जाए . उसकी सहेली नेहा जो उसके साथ खड़ी सब बातें सुन रही थी उसने भी उसका हौंसला बढाया और कहने लगी," जा अनामिका बोल दे अपने मन की बातें . अरे तूँ तो कालेज के समय से ही भाषण देना जानती है . फिर अनामिका ने मन ही मन अपने को तैयार कर लिया . क्योंकि विधायक महोदय की बात को वह टालना भी नहीं चाहती थी ." .

मंच पर जाकर सबसे पहले उसने विधायक महोदय का धन्यवाद किया और फिर अपनी हिचकिचाहट को दूर करते हुए लोगों को रोज मर्रा पेश आने वाली समस्याओं का खुलासा करने लगी .जिस आत्मविश्वास के साथ उसने अपनी बात रखी उससे सभी लोगों ने तालियाँ बजा कर उसका हौंसला बढाया . यह सब देखकर मंच पर विधायक महोदय के साथ मौजूद महिलाएँ मन ही मन कुछ विचलित सी नजर आ रही थी क्यूंकि शायद उनमे से कोई भी इतनी पढ़ी लिखी नहीं लग रही थी .जब अनामिका ने अपना भाषण ख़त्म किया तो विधायक महोदय ने उसे अपने पास बुलाया और उसका संक्षिप्त परिचय लेते हुए उसका उत्साह बढ़ाते हुए कहने लगे , " बेटे तुम तो बहुत अच्छी वक्ता हो ये सब तुम्हारे पढ़े लिखे होने का संकेत है , अब मेरी इच्छा है कि तुम अपनी प्रतिभा घर बैठ कर व्यर्थ मत गवाओं .भगवान् तुम्हे खूब कामयाबी दे ."
वह दिन ना सिर्फ उसकी प्रेरणा का दिन था बल्कि उस दिन से उसके जीवन में एक नया मोड़ आ गया .उस दिन के बाद उसने कभी मुड कर पीछे नहीं देखा . अपनी मेहनत और काबलियत के बलबूते पर वह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करती गई. धीरे- धीरे कर उसने राजनीति में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया . अपने एरिया के विकास को लेकर उसने कई कार्यक्रम आयोजित करवाए . जिसमे उसने ना सिर्फ शहर के गण्यमान्य व्यक्तियों को बल्कि विधायक महोदय को ख़ास तौर पर आमंत्रित किया . अनामिका में एक नेता होने के सारे गुण विद्यमान थे . इस तरह विधायक महोदय के आशीर्वाद से शहर में उसका नाम जाने पहचाने लोगों में आने लगा .
एक औरत होने के बावजूद भी उसमे पुरुष प्रधान समाज में अपनी काबलियत के बलबूते पर पुरुषों के साथ कंधे के साथ कन्धा मिलाकर चलने की अद्वितीय क्षमता थी . जयंत अनामिका की क्षमता से प्रभावित अवश्य थे पर कहीं न कहीं काम्प्लेक्स के शिकार भी थे. अनामिका कदम- कदम पर उम्मीद करती थी कि उसके पति उसका भरपूर साथ दे . उसका मानना था कि जितना सत्य ये है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक औरत का हाथ होता है उससे भी बड़ा सच है कि एक औरत को कामयाब होने के लिए भी अपने पति के साथ और विश्वास की जरूरत होती है .एक दिन बातों- बातों में अनामिका ने अपने मन की बात जयंत के सामने रख दी , ' जयंत तुम्हे तो पता है कि विधायक महोदय मेरी प्रतिभा से कितने प्रभावित है इसलिए मै राजनीति को अपना लक्ष्य बनाना चाहती हूँ "
जयंत ने उसकी पूरी बात सुने बिना ही बीच में बोलना शुरू कर दिया , ' तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है , क्या तुमने देखा नहीं कि इस क्षेत्र के लोग कितने गंदे ,भ्रष्ट और मतलबी होते है .कितनी औरते है जो घर से बाहर निकलती है . सब कार्यक्रमों में आदमी ही ज्यादा होते है "
अनामिका से भी रहा न गया , " चाहे हमारा समाज कितनी भी तरक्की कर ले पर तुम मर्द लोग दोहरा जीवन जीते हो. बाहर काम करने वाली महिलाएँ वैसे तो तुम्हे बहुत लुभाती है और अपनी पत्नी के पैरों में बेड़िया डाल कर रखना चाहते हो"

हमारे समाज में तबदीली कैसे आएगी , " देख नहीं रहे हो आज कल तो हर क्षेत्र में महिलाएँ काफ़ी उच्च पदों पर आसीन है "
मगर जयंत कहाँ मानने वाला था ? अनामिका की किसी भी दलील का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था .कदम- कदम पर जयंत के शक्की स्वभाव और सकीर्ण विचारधारा ने अनामिका की जिन्दगी में कुछ कर दिखाने की इच्छा को पूर्णविराम लगा दिया था .जब वह नौकरी करना चाहती थी तो जयंत ने उसे अपनी इच्छा अनुसार नौकरी नहीं करने दी थी . जयंत की हर बात पर टोकने की आदत से अनामिका बहुत दुखी होती थी कि ये मत करो, ये कपडे मत पहनो . जबकि अनामिका अपनी घर गृहस्थी की जिम्मेवारियों में भी कोई कमी नहीं आने देती थी . पूरे तन- मन से हर काम वह भली- भांति निबटाना जानती थी .घर के काम- काज को लेकर अनामिका ने जयंत को कभी भी कोई शिकायत का मौका नहीं दिया था . बावजूद .समय- समय पर अनामिका जयंत की विचारधारा में परिवर्तन लाने का भरसक प्रयास करती थी . कभी जब जयंत अच्छे मूड में होता तो वह फिर से कोशिश करने लगती, " जयंत तुम तो इस बात को अच्छी तरह से जानते हो कि आज कल औरतें अपने घर से दूर जाकर यहाँ तक कि विदेश में जाकर भी नौकरी करती हैं , बड़े- बड़े उद्योग धंधे संभालती है . पता नहीं तुम किस मिट्टी के बने हो जो आज भी बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो तुम्हे तो ५० वर्ष पहले पैदा होना चाहिए था . मेरा घर में खाली बैठे- बैठे दम घुटने लगता है ."
जयंत अनामिका की बातें एक कान से सुनता था और दूसरे कान से निकाल देता था

अनामिका दिन पर दिन राजनैतिक गतिविधियों में उलझती जा रही थी .हर दिन उसे किसी न किसी कार्यक्रम में जाना पड़ता था . कभी कभार अनामिका मना कर जयंत को भी साथ ले जाती थी .पर वहाँ मीटिंग में ज्यादा तर आदमी ही होते थे यह देख कर जयंत मन ही मन घुटता रहता था ..वह हर किसी को शक की निगाहों से देखता कि उनकी कू- दृष्टि अनामिका पर पड़ रही है .

इस तरह जयंत अपने सकीर्ण विचारों के कारण अपनी बेचैनी से अनामिका को भी बहुत असहज सा बना देता था जिससे वह भी मन ही मन कोई कमी सी अनुभव करती और किसी मुद्दे पर भी किसी से खुल कर बात ना कर पाती .अनामिका इतने बड़े शहर के विश्विद्यालय में पड़ी लिखी थी जहां पर लड़के लडकियां साथ उठते बैठते थे साथ साथ घूमने भी जाते थे , इसलिए इस तरह का जयंत का व्यवहार उसे बहुत ही अटपटा सा लगता था . वह जयंत को समझाते हुए कहते थी , " आज कल दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है और औरते तो आजकल हर क्षेत्र में आगे हैं , और जब तक वह अपने विचारों में दृढ़ है किसकी हिम्मत है जो वह उससे किसी प्रकार की कोई बेफजूल बात कर सके . बस आप शांत रहे और अपने दिमाग में उत पतंग बातें मत लेकर आया करें " अनामिका के इतना समझाने के बावजूद भी जयंत खुद को परिपक्व नहीं बना पता था और कहना लगता , " चलो बस अब बहुत हो गया और यहाँ से अब चलते हैं "
अनामिका मन ही मन जयंत के व्यवहार से बहुत दुखी होती और उसके साथ उसे मजबूरी वश कार्य क्रम बीच में ही छोड़कर वापिस आना पड़ता .


कभी- कभी तो ऐसा होता था कि यदि जयंत अपने काम की वजह से अनामिका के साथ किसी कार्यक्रम में नहीं जा पाता था तो काम पर भी उसके दिमाग में शक के बीज पनपते रहते थे.और यदि वह उसके साथ जाता भी तो वह उसे बहुत ही असहज अवस्था में डाल देता था .अनामिका को जयंत के साथ होने पर यही लगता था कि जयंत का ध्यान उस पर ही होगा कि वह किससे बातें कर रही है और मन में यही सोच रहा होगा कि आस- पास के लोगों की क्या प्रतिक्रिया है . इस कारण अनामिका बिलकुल भी सहज होकर किसी के साथ स्वतंत्रता से बात नहीं कर पाती थी .वह जयंत के वहाँ होने से बहुत घुटन महसूस करती थी , एक तरफ तो उसके पास जीवन में कुछ कर दिखाने का एक स्वर्णिम अवसर था तो दूसरी और जयंत के स्वभाव में अप्राकृतिक सा परिवर्तन उसकी राह में रोड़ा बन रहा था . कभी- कभी तो वह हताश होकर बैठ जाती थी , पर वह बहुत ही समर्पित कार्यकर्ता थी और अपनी काबलियत पर प्रश्न चिन्ह लगना भी उसे गवारा नहीं था .वह अपनी घर गृहस्थी की जिम्मेवारियों में भी कोई कमी नहीं आने देती थी . पूरे तन- मन से हर काम वह भली- भांति निबटाना जानती थी .घर के काम- काज को लेकर अनामिका ने जयंत को कभी भी कोई शिकायत का मौका नहीं दिया था .
स्थानीय राजनैतिक स्तर पर उसकी गहरी पैठ होती जा रही थी .विरोधी पक्ष के लोगों को भी उसमे खामियां ढूँढने पर भी नहीं मिलती थी और वह भी उसकी तारीफ़ किए बिना न रहते .इस तरह समाज के लिए कुछ करने में उसे एक अलग तरह की आत्म संतुष्टि मिलती और उसे लगता कि उसका जीवन व्यर्थ नहीं जा रहा है . पर मन का एक कोना अभी भी रिक्त सा रहता . उसे इस बात की पीड़ा हर समय मन ही मन खाती रहती कि वह चाहे कितनी ही अच्छी तरह कोई भी काम क्यूँ न कर ले चाहे घर का हो या राजनैतिक क्षेत्र का पर जयंत ने कभी अपना मुँह खोल कर उसकी तारीफ़ नहीं की . बाहर वाले लोग उसके काम की तारीफ़ करते नहीं थकते थे और उसके साथ- साथ हर कार्यक्रम में जयंत को पूरा मान सम्मान मिलता , पर सबके बावजूद जयंत हर समय गम सुम सा ही रहता . वह हर समय जयंत की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखती रहती कि वह कभी अपना प्यार भरा हाथ उसके सर पर रखे और उसकी हिम्मत बढाये , आखिर वह थी तो एक औरत ही , जो बाहर से बेशक जितनी भी सशक्त नजर आए पर अपने पति के प्यार भरे स्पर्श के लिए मन ही मन तरसती रहती . वह दिन पर दिन लोगो में लोक प्रिय होती जा रही थी . क्षेत्र के विधायक महोदय की तो वह बहुत चहेती बन गई थी क्योंकि जब भी कोई कार्य भार उन्होंने उसे सौंपा था तो पूरे तन- मन से वह उनकी उम्मीदों पर खरा उतरती थी . उस दिन तो अनामिका के पाँव जमीन पर नहीं लग रहे थे . उसे लग रहा था जिस सपने को वह बचपन से देखती आई है वह उसके बहुत करीब आ गया है . वह तो मानो आसमान में उड़ रही थी . विधायक महोदय ने खुद उसे यह खुशखबरी सुनाई थी कि अगले माह दिल्ली में होने वाली पार्टी की मीटिंग में उसे भी शामिल होना है , पार्टी ने उसे ख़ास तौर पर महिला विंग के प्रधान का कार्य भार सौंपा था . वह मन ही मन सोच रही थी कि उसकी बरसो की मेहनत और तपस्या का फल मिलने वाला है . परिजनों में अब उसकी धाक मच जाएगी . जो परिजन उस पर तरस खाया करते थे और मन ही मन उसका मजाक उड़ाया करते थे वह उनको दिखा देगी की आखिर उसकी काबलियत का मौल पड़ ही गया . वह बड़ी बेसब्री से जयंत के आने का इन्तजार करने लगी , वह उसे खुश खबरी सुनाने के लिए बहुत बेताब हो रही थी .
जैसे ही वह खबर अनामिका ने जयंत को सुनाई तो उसके चेहरे पर एक भाव आ रहा था तो एक भाव जा रहा था फिर कुछ क्षण पश्चात वह एकदम से उग्र हो गया और तमतमाते हुए बोलने लगा , " तुम्हारा दिमाग खराब तो नहीं हो गया , अगर तुम्हे स्थानीय प्रोग्रामों में आने जाने की इजाजत दे दी तो इसका मतलब तुम्हे कुछ भी करने की आजादी मिल गई . अब तुम इतनी बड़ी नेता बन गई हो जो शहर से बाहर जाने का भी सोचने लगी . तुम्हे फिर भी जाना हो तो जाओ पर यह उम्मीद न करना कि मै तुम्हारा बाडीगार्ड बन कर तुम्हारे साथ चलूँगा और एक बार कदम दहलीज के बाहर निकालने के बाद फिर दोबारा इस घर की तरफ मुड कर मत देखना " यह कहकर जयंत पैर पटकते हुए घर से बाहर चला गया .
अनामिका उसकी बातें सुनकर मानो आसमान में उड़ते- उड़ते जमीन पर आ गिरी हो .