Friday 19 April 2013

हैसियत




जैसे ही हवाई जहाज ने उड़ान भरी वैसे ही रोहित के मन को भी पंख लग गए . उसके शहर के कारखानों से निकलने वाला धुंआ धीरे - धीरे दूर होता गया . कैसे रश्मि परेशान होकर बार बार उसे नई - नई योजनायें सुनाती और दिन- रात अपनी तड़प के बारे में बताती . कभी - कभी वो उससे गुस्सा हो जाती तो कहने लगती , 
" तुम्हे मेरी कमी का अहसास तब होगा जब मैं शादी करके कहीं दूर चली जाउंगी और तुम मुझसे बात करने को भी तरसोगे " 
इस पर रोहित ही उपरी मन से उसे चिड़ा कर कहता , "  जाओ जाओ जरूर शादी करो और सुखी जीवन बसर करो . मैंने कौन सा तुम्हारे पैरों में बेड़ियाँ डाल रखी है " 
इस तरह का जवाब सुनकर रश्मि रोने लगती और रोहित से कई दिन तक बात न करती . इस तरह दोनों में प्यार भरी नोंक झोंक हर समय चलती रहती पर दोनों ही टॉम और जैरी की तरह न एक दुसरे के बिना रह सकते न एक दुसरे को सताने से बाज आते . 
आज रोहित रश्मि की प्रेरणाओं की बदोलत ही इतनी शोहरत हासिल कर सका था की उसके हर रिश्तेदार तो के हर गाँव वाला उसकी मिसाल देते नहीं थकता था परन्तु असल में किसी को भी उसकी कामयाबी के पीछे असली कारण  का पता नहीं था .हर कोई तो उसकी पत्नी रमा को ही इसका श्रेय देने में लगे रहते थे पर किसी को पता नहीं था की उसे रमा से अलग हुए काफी समय बीत चूका था . 

आज उसे अपने हीन होने का अहसास होने लगा था  | बचपन में उसे पिताजी बहुत प्यार करते थे | बस, उनका प्यार पाकर शायद वह कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गया था | भले ही, पढ़-लिखकर उसने एक ऊंचे दर्जे की नौकरी हासिल कर ली थी , मगर आज भी उसका दिल उतना ही कोमल था जितना वह अपने बचपन में अपने भीतर अनुभव किया करता था | किसी का भी दर्द उससे सहा नहीं जाता था | कौन अपना, कौन पराया वह, यह बात नहीं जानता था | वह तो दिल के भावुक धागों से बंधा हुआ था | लेकिन किसी ने आज उसकी आँखें खोल दी, 

यह बात,भले ही रश्मि ने रोहित को ऊपरी मन से कही हो,मगर इस बात ने उसके दिल को गहराई में घुसकर उसे बुरी तरह से विदीर्ण कर दिया था |उसे रश्मि पर इतना विश्वास था, कि वह किसी भी हालत में कम से कम ऐसी बात नहीं कहेगी । उसके कहे शब्द बार - बार उसके कानों में गूँज रहे थे और उसके मन में एक अजीब सी उथल - पुथल मच रहे थे .

उसने कभी भी कोई बात उससे अपने जीवन के बारे में छुपाई नहीं थी । हो सकता है, रश्मि ने अनुमान कर लिया हो, ऐसे गरीब रिश्ते को जिंदा रखने से क्या फायदा ? । कहने को तो वह बहुत कुछ कहती थी, एक सुखी जीवन की दुहाई देती थी । मगर या तो रोहित या फिर रश्मि मल्टीपल पर्सनलिटी की शिकार थी । कई अज्ञात रिश्ते इस अजनबी दुनिया में ऐसे भी होते है, जिसे किन्हीं ज्ञात कारणों से दुखी नहीं किया जा सकता ।     
 कभी रोहित के बाल्य-मन पर इस बात का गहरा प्रभाव पड़ा था , जब वह मवेशियों को लेकर अपने खेत जा रहा था और रास्ते में उसकी सहेली निशा जैन  अपने माता-पिता के साथ कार में बैठकर कहीं पर्यटन करने जा रही थी | जब वह उसे देख कर हंसी तो उसका मन बहुत विरक्त हुआ था । उस दिन उसका मन खराब था ,शाम को जाकर उसने अपने पिता से सवाल भी किया था , कि वे लोग इतने गरीब क्यों हैं ? पिता ने उसे सांत्वना देते हुए समझाया था, “हम  लोग दिल से राजा हैं | किसी की भी चिंता हमें नहीं सताती हैं | अपनी मेहनत का कमाकर जीवन-यापन करते हैं |और जो लड़की तुम पर हंस रही है, वह एक महाजन की बेटी है । ‘महाजन’ एक ऐसा वर्ग हैं,जो सामान्य जनों से ऊपर होता हैं, उनसे महान होता है और उनका मकसद केवल पैसा कमाकर भोग-विलास पूर्ण जीवन जीना होता हैं | जीवन का मूल उद्देश्य धन प्राप्ति नहीं होती हैं, वरन शांति से एक दूसरे की सुख-दुख में मदद करते हुए सौहार्दपूर्ण जीवन जीना होता हैं | “वित्तेन न तर्पणीयाम ” मतलब धन से कभी मनुष्य का मन तृप्त नहीं हुआ हैं | और आगे इकट्ठा करने की चाह बनी रहती हैं | आखिर कब तक ? क्या टाटा,बिरला,अंबानी,जिंदल अरब-खरबपति होकर भी सुखी हैं?”
 
उस समय उनके तर्क उसे सही लग रहे थे ,मगर उसके मन में कुछ कर गुजरने की चाह पैदा हो रही थी |वह भी निशा की तरह गाड़ी में बैठकर घूमना चाहता था । वह चाह रहा था कि वह भी बहुत कुछ कमाएं और अपने परिवार के गरीब लोगों की कुछ मदद कर आत्म-संतुष्टि अनुभव कर सके | मगर वह व्यापारी परिवार का नहीं था | कौन उसे ऊपर उठने में मदद करता ?उसके तो सारे रिश्तेदार दरिद्र थे, व्यापार या मिल मालिक होना तो सपनों से परे था। केवल पढ़ाई ही उसके लिए वह माध्यम था, जिसके द्वारा वह समाज में अपने आपको स्थापित कर सकता था | होकर भी, मगर पढ़ाई में ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाता ? एक नौकरी ही तो मिलेगी | और कुछ अच्छा होगा तो एक पढ़े लिखे घर में उसकी शादी हो जाएगी | हुआ भी कुछ ऐसा ही,उसकी किसी सरकारी कंपनी में प्रबन्धक के पद पर नौकरी लग गई और नौकरी देखकर एक अच्छे घर में शादी हो गई | वह तो सभी को अपने समान ही समझता था, वह तो यही समझता था कि सभी के सोचने का ढंग एक ही होगा तथा उनके  दृष्टिकोण में कोई खास भिन्नता नहीं होती हैं | मगर वह यथार्थ से कोसों दूर था | उसने अपनी नौकरी लगने के पांच साल बाद शादी की थी | तब तक टूटी फूटी खप्पर वाले घर की मरम्मत करवाकर छोटा-मोटा रहने लायक एक घर बनाने के बाद उसने शादी करने का तय किया था | शादी करने का उसका मन नहीं था | वह एक सुखी जिंदगी जीना चाहता था, जिस पर किसी की हुकूमत नहीं हो | चाहे वह जमीन पर भूखा सोए, या फिर हिमालय की तलहटी में अकेले विचरण करें | उसकी जिंदगी अपनी जिंदगी हैं | किसी का अतिरिक्त उत्तरदायित्व उठाना उसके बस की बात नहीं थी | वह संन्यासी होना चाहता था। लेकिन वह दिन आज भी उसे अच्छी तरह याद हैं, जब उसके बूढ़े पिताजी ने रोते-रोते अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की थी ,
“रोहित बेटा, मैंने बड़ी मुश्किल से तुम्हे पढाया लिखाया है और अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाया  है  | मैं कितना  खुश हूँ,इस बात का तुम अनुमान भी नहीं लगा सकते हो | जब भी कोई मेरा मित्र या संबंधी आकर मुझे बधाई देता हैं तो मैं आकाश की और निहारते हुए भगवान का मन ही मन शुक्रिया अदा करता हूँ | मन ही मन यह सोचता हूं कि जरूर मैंने कुछ इस जन्म में अथवा पूर्व जन्म में भले कर्म किए होंगे,तभी तो भगवान ने तुम्हारे जैसा होनहार बेटा दिया | मगर तुम्हारा शादी के बारे में रवैया देखकर मेरा मन विक्षुब्ध है । इस उम्र में अब केवल एक ही इच्छा बाकी हैं कि तुम्हारी शादी हो जाएं | मैं जाने से पहले अपनी आँखों से तुम्हारी शादी देखना चाहता हूं | बाकी भगवान की मर्जी |”

भले ही, रोहित सामान्यतया पिताजी की इन दार्शनिक बातों को नजर अंदाज करता था, मगर इस बार वह भी कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया था | शायद वह अपने पिताजी रुआंसी सूरत देखकर अपने आप को कसूरवार ठहरा रहा था । पिताजी को रोते देख उसकी आंखें भी नम हो गई थी | मगर जैसे-तैसे उसने अपनी चेहरे को छिपाकर अपनी आंखों से छलकते आंसुओं को जबरदस्ती रोका | उसी क्षण उसने यह संकल्प कर लिया था,कि वह और अपने पिताजी को दुख नहीं देगा |उसे अचरज हो रहा था कि क्या यह वही पिताजी है, जो कभी उसे ब्रह्मचर्य के पालन पर जोर देते हुए कहते थे कि तुम्हें भी स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानंद , भीष्म पितामह और हनुमान की तरह बनना है , और वही पिताजी आज उसकी शादी के लिए उसके सामने गिड़गिड़ा रहे है । आज भी रोहित को इस बात का दुख है कि काश ! उसने शादी नहीं की होती तो जीवन में उसने वह मुकाम हासिल किया होता ,जिसके लिए कई साधु संत जन्मों-जन्मों तक तपस्या करते हैं । 
तब पिताजी को धीरज देते हुए उसने कहा था, 
“आप चिंता मत कीजिए | मैं  जल्दी ही शादी कर लूंगा | और ज्यादा विलंब नहीं करूंगा |”

“तुम्हारी उम्र अट्ठाईस साल हो गई हैं | अगर और ज्यादा विलंब करोगे तो फिर कोई अच्छे घर की लड़की नहीं मिल सकेगी |” पिताजी ने अपना आशय स्पष्ट किया |

रोहित ने इस बात पर अपनी असहमति प्रकट करते हुए कहा था, “पिताजी जोड़े तो स्वर्ग में बनते हैं,धरती पर केवल मिलते हैं | जितना शादी का सुख लिखा होगा,  मिल जाएगा और नहीं लिखा होगा तो नहीं मिलेगा | क्या मेरे जैसे दुनिया में और कोई लोग नहीं हैं ?”

यह कहकर रोहित ने अपना तर्क उनके सामने रखा | पिताजी को इस बात का अहसास था कि वह भी अकसर दार्शनिक की तरह बातें करता हैं | बहुत ही खुद्दार स्वभाव का हैं |उन्हें यह याद था कि जब वह इंजीनियरिंग पढ़ता था और उसे घर से पूरे पैसे नहीं मिल पाते थे, मगर वह कभी भी उनके अलावा नहीं मांगता था। चाहे, वह भूखा क्यों न सो जाए । कई बार तो ऐसा भी हुआ कि मेस में पैसा जमा नहीं कराने कि वजह से खाना भी नसीब नहीं हुआ तो समोसा,ब्रेड के साथ मिर्ची वड़ा खाकर ही रात गुजारनी पड़ी थी या फिर सड़क के किनारे छोटे से ढाबों में खाना खाया था । क्या ये दिन वह कभी भूल सकता था ! एक बार उसे कॉलेज की तरफ से  भारत भ्रमण के लिए जाना था, मगर उसके पास पैसे नहीं थे। उसने घर से एक पैसा भी नहीं मांगा, वरन एक ट्रस्ट के पास जाकर कुछ पैसे उधार जरूर लिए थे । खुद्दार स्वभाव होने के कारण जब तक वह पूरी तरह से अपने पावों पर खड़ा नहीं हो जाता, तब तक वह कभी भी ऐसे निर्णय नहीं लेगा जो उसके आत्म-स्वाभिमान को ठेस पहुंचा सकें |

मगर उस दिन पिताजी की शारीरिक और मानसिक अवस्था देखकर, आर्थिक स्तर पर बिना सम्पन्न हुए उसने शादी करने का निर्णय आखिर में ले ही लिया |
 
माँ भी अक्सर कहा करती थी, “ तुम भले ही पांच भाई हो   मगर पिताजी के दिल में तुम्हारा विशिष्ट स्थान है | तुम्हारे गांभीर्य,मितभाषी तथा स्वाभिमानी होने के कारण घर में हर कोई तुम्हें बहुत पसंद करता हैं।”
 
और इस बात की उसे अच्छी तरह अनुभूति थी | एक बार किसी संबंधी ने कहा कि रोहित अगर विदेश चला जाएगा तो घर की माली हालत सुधार जाएगी । मगर शायद किस्मत को यह मंजूर न था । न वह विदेश जा सका और न ही वह घर वालों के अरमानों पर खरा उतर सका। देखते-देखते उसकी शादी हो गई । और  शादी के बाद पहला गंभीर झटका उसे तब लगा,जब पत्नी रमा ने उसे ‘देहाती’ कहकर सम्बोधन किया था | यह कहने के पीछे उसके कई छुपे हुए कारण थे | रोहित ग्राम्य संस्कृति से जुड़ा हुआ था, जबकि रमा की परवरिश एक शहरी परिवेश में हुई थी | भाषा,वेशभूषा ही नहीं कई सांस्कृतिक परिवर्तन थे दोनों के परिवेश में | जहां एक जगह अभाव का दर्द था | वही दूसरी और भौतिकता की ओर अग्रसर होते परिवार में पढ़ी-लिखी लड़की की असंस्कृत मानसिकता | रमा के तीक्ष्ण तानो और उसकी उपेक्षा के कारण वह रश्मि की तरफ खींचता चला गया और रश्मि भी रिश्तों की नाकामयाबियों को झेलते झेलते बुरी तरह टूट गयी थी परन्तु ना चाहते हुए भी रोहित की तर खींचती चली गयी और यह जानते हुए भी कि वह शादी शुदा है उसमे अपने  जीवन साथी का सकूं तलाशने लगी 

रह-रहकर उसे रश्मि के वाक्य याद आ रहे थे |भले ही रश्मि सामाजिक दृष्टिकोण से उसकी पत्नी नहीं थी, मगर उसके जीवन में बहुत बड़ा स्थान रखती थी । वह उसका मार्गदर्शक थी । प्रेम की परिभाषा शायद उसने ही पहली बार सिखायी थी । उसके मानस पटल पर वह इस तरह छा गई थी कि हर समय उसकी छबि नजर आती थी । बस, वह ही वह । उसका मासूम चेहरा और उसमें छुपे अनगिनत दुख । उन दुखों का निवारण करने का सामर्थ्य भले ही उसमें नहीं था, मगर शब्दों से ही उन्हें हल्का करने का प्रयास अवश्य करता था । एक बार वह बुरी तरह टूट गया , जब उसने अपनी भावनाएँ प्रकट की थी उसके सामने,वह भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि जितना कुछ उसके पास हैं,वह सब तुम्हें समर्पित कर दें | प्यार के सामने भौतिकता फीकी नजर आती थी उसे | मगर उसके प्रत्युत्तर में एक तीक्ष्ण प्रतिक्रिया थी उसकी
,”तुमसे मैं क्या मांगूं ? तुम्हारे पास तो ऐसा कुछ भी नहीं हैं | अगर हैं भी तो मेरे लिए बहुत कम हैं | बेहतर रहेगा,मुझे छोड़ दो मेरे हाल पर। ”

रोहित बहुत बार तर्क देते हुए कहता " जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता है , असली शान्ति तो सादगी भरे जीवन और दूसरों का दुःख समझने में है " 

रश्मि भी कहाँ उसकी बातों से संतुष्ट होने वाली थी और अक्सर कहा करती , " क्षमता से ही समता आती है " पैसा कमान कोई गुनाह थोडा है और अगर खुद में सामर्थ्य नहीं होगा तो किसी की मदद क्या ख़ाक करोगे ? 
इस तरह अक्सर दोनों में इस बात पर तर्क वितर्क चलता रहता . 
 
रोहित रश्मि के दुखों को जानता था, मगर वह उसके बालमन पर पड़े गरीबी के अभिशाप और अपमान से अनभिज्ञ थी| पहले से ही रश्मि के दुख इतने गहरे थे कि उसने अपने बालमन को कभी भी उसके सामने उकेरने का प्रयास नहीं किया । चुपचाप जितना उससे बन सका,उसने उसकी मदद करता था | ऐसा भी नहीं था कि उसके साथ उसका कोई पूर्व में बंधन था, मगर दैविक भावनाओं के वशीभूत होकर दोनों में एक अदृश्य अनोखा रिश्ता बनता चला गया | जिसे दोनों आलौकिक संबंध का नाम देते थे । एक नई दुनिया थी दोनों के बीच में | हर पल एक दूसरे के ख़यालो में खोए रहते थे | रमा के व्यवहार और अपमान पूर्ण व्यंग्य बाणों से पहले से ही वह विचलित हो चुका था, इसलिए वह रश्मि के प्रेमपाश में अपने सुखों को तलाशने लगा था । भगवान ने देर से सही, एक ऐसा साथी तो दिया, जो कम से कम उसके दुख दर्द को समझ सके । वह यह अच्छी तरह जानता था कि रश्मि को दुनिया का अच्छा अनुभव है । जाने-अनजाने उसके मुंह से निकला हुआ हर शब्द उसके प्रति अथाह प्रेम को दर्शाता है । वह चाहती है कि अपने भीतर छुपी हुई शक्ति और ऊर्जा का सही ढंग से आकलन नहीं कर पाने की वजह से आज रोहित अपने दोस्तों से बहुत पीछे हैं। जिस प्रकार जामवंत ने हनुमान जी को लंका जाने के लिए उसकी शक्तियाँ याद दिलवाई थी ,ठीक उसी तरह वह अपने कटाक्ष के माध्यम से उसे प्रेरित करना चाहती थी । उसका मानना था कि जब कभी सीधी अंगुली से घी नहीं निकलता है तो टेढ़ी अंगुली का इस्तेमाल करना पड़ता है । मगर इस बार उसे पता नहीं था कि इस बार उसका यह बाण उसके हृदय को चीरते हुए चला जाएगा ।

जब रोहित रश्मि के दुःख में दुखी होता तो वो कहा करती , " खाली बैठे- बैठे दुखी होने से क्या लाभ ? अगर वास्तव में कुछ करना चाहते हो तो अपने सामर्थ्य को पहचानों और जीवन में कुछ कर दिखाओ " 

रश्मि की बातें चाहे उसे बहुत कुछ सोचने को विवश करती परन्तु उसे किसी निष्कर्ष पर पहुँचने में मदद न करती . वह आत्म चिंतन करता रहता . 
जब रश्मि का जन्मदिन आया तो उसकी बेहद इच्छा थी की वह इस बार रोहित के साथ अपना जन्मदिन मनाये परन्तु उसे लगता ऐसा सोचना एक सपना है और रोहित को ताना देते हुए कहती कि काश ऐसा हो कि तुम उड़ कर मेरे पास आ जाओ पर इसके काफी पैसा खर्च हो जाएगा ऐसा कहते कहते वो दुखी हो जाती 

उसे याद आ गया कि इस बार जब रोहित ने सोमवार की सुबह ‘सुप्रभात’ के अभिवादन के लिए उसे संदेश भेजा ,क्योंकि वह सोमवार को शिव की आराधना कर उसके उत्तम स्वास्थ्य और मंगल भविष्य की कामना करती थी, तब उसे अपनी हैसियत याद दिलाकर रश्मि ने उसका मूड खराब कर दिया । उसकी अभावहीनता पर व्यंग्य करना उसके लिए किसी जानलेवा प्रहार से कम नहीं था | द्रोपदी ने एक बार दुर्योधन को ‘अंधे का बेटा’ कहकर अपमानित किया था | कितना आहत हुआ था वह | उसके कम आहत वह रश्मि के कटु यथार्थ वचन से नहीं हुआ होगा | हो सकता हैं कि रश्मि उसके पीछा छुड़ाना चाहती होगी | ठीक ही तो उसके लिए | जिस रिश्ते को अगर कोई नाम नहीं दिया जाए, उस बेनामी रिश्ते को जीवन पर्यंत खींचा जा सकता हैं ? और ऐसे भी उसके पास ऐसा है क्या जो वह उसकी मदद कर सकता है ? न उसके पास कोई जमीन है और न ही कोई कल-कारखाने ।
नहीं ,यह तो ठीक वैसी ही बात हुई,जब उसकी पत्नी रमा पहली बार उसके कंपनी के क्वार्टर  में पहुंचकर उसकी अभावहीनता को बर्दाश्त नहीं कर सकी थी | घर में गैस-सिलेंडर नहीं था,उसे हीटर पर खाना बनाना पड़ रहा था | फ्रिज तो दूर की बात,कूलर तक नहीं था उसके पास | इतनी गर्मी क्या वह सहन कर पाती ! बात का बखेड़ा बना दिया था उसने |

रोहित का क्या वह गांव की मोटी-मिट्टी का बना हुआ था | सर्दी-गर्मी सब सहन कर सकता था |बड़ा पलंग नहीं होने की अवस्था में छोटे-छोटे लकड़ी के कार्टूनों को जोड़कर अपनी शैया बना लेता था | उसे क्या ,वह तो कभी-कभी रेलवे में रिजेर्वेशन नहीं होने पर बाथरूम के पास दरी बिछाकर सोते हुए अपना सफर पूरा कर लेता था | उसने तो अपने जीवन में तंगी और तन्हाई  दोनों देखी थी | मगर बाकी लोगों का क्या ?
जब रमा ने उसे कहा,” जब तुम्हारे पास इतना पैसा नहीं था तो तुम्हें कम से कम मुझसे शादी नहीं करनी चाहिए थी | मेरे भी अपने ख्वाब  थे |मैं भी एक अच्छी जिंदगी जीना चाहती थी | मगर मुझे नहीं लगता हैं कि तुम मुझे जीवन में कुछ खुशियाँ दे पाओगे |”

रोहित यह सुनकर सन्न रह गया था | उसने उसे समझाते हुए कहा था ,” देखो, अभी-अभी नौकरी लगी हैं | धीरे-धीरे कर मैं घर का सारा सामान जूटा लूँगा | दोस्तों से कुछ लोन लेकर मैंने पुराना स्कूटर खरीदा हैं | अपने पैसों से मैंने शादी की हैं |पलंग और अलमारी खरीदी हैं |धीरे-धीरे सब कुछ हो जाएगा, तुम निश्चिंत रहो |”
मगर इस तरह के आक्षेप से वह भीतर से बुरी तरह टूट गया था | पिताजी ने उसे आध्यात्मिक बनाया था, भौतिकवाद की कभी शिक्षा नहीं दी थी | उनका ज्यादा प्यार आज जीवन की यथार्थता को सहन करने से रोक रहा था । आज उसे अहसास हुआ कि दुनिया में दुनियादारी अच्छी तरह निभाने के किए वित्त भी उतना ही जरूरी हैं,जितना कोई हुनर |गीता और रामायण पढ़ने की बजाए मेनेजमेंट की किताबें पढ़ना ज्यादा उपयोगी है । गहरा दुख तो उसे और तब लगा | जब उसके ससुर ने दस हजार रुपए का ड्राफ्ट भिजवाया,अपनी बेटी के लिए फ्रिज खरीदकर उसके अभाव को दूर करने के लिए |उसे क्या पता था, कि वह बहुत ही आत्म स्वाभिमानी इंसान हैं | रोहित ने बैंक ड्राफ्ट लौटाते हुए उनसे फोन पर कहा था,”सर, आपने अपनी बेटी का मेरे साथ शादी कर अपना दायित्व पूरा कर लिया था | अब उसके सुख-दुख तथा रहन-सहन की सारी जिम्मेदारी मेरी हैं | आपका यह ड्राफ्ट मेरी गरीबी दूर नहीं कर सकता हैं | और आपकी यह तौहीन मुझे जिंदगी भर याद रहेगी |”

रोहित ने अपने ससुराल से रत्ती भर भी दहेज नहीं लिया था | जो कुछ गहने दिए थे, वे अपने लड़की के लिए | वह भी उसे इतनी सुरक्षा से रखती थी कि कही रोहित के घर वाले गरीबी की वजह से उन्हें चुरा न ले | जहां रोहित ईमानदारी और विश्वास को जीवन मूल्य के रूप में मानता था | वहीं उसके ससुराल वालों का यह व्यवहार उसे कतई पसंद न था | शादी के बाद घर वालों को गहने दिखाने की बजाए वह सीधे अपने घर गहने लेकर चली गई थी | क्या उसके घर वाले इतने चोर थे जो उसके गहने चुरा लेते ? जहां उसके पिताजी एक ईमानदार राज्य अधिकारी थे ,क्या उनकी प्रतिष्ठा में इतनी आंच | रोहित का मन धीरे-धीरे ससुराल वालों से उचटता चला गया था | उसने उन सभी के बातचीत करना बंद कर दिया | उनके घर जाना बंद कर दिया | कभी जरूरत पड़ने पर होटल में रात गुजारता था, मगर अपने ससुराल नहीं जाता था | लाड़ प्यार में बढ़ा पला आर्थिक संकटों से भले ही वह जूझता रहा हो, मगर अपने परिवार के किसी भी सदस्य की बेइज्जती उससे सहन नहीं होती थी | वह भीतर से पूरी तरह खोखला था | अपना दुखड़ा सुनाए तो किसे सुनाए | अपने आप को व्यस्त रखने के लिए हमेशा वह किताबों में उलझा रहता था और लेखन-पढ़न में आत्म-शांति और संतुष्टि को तलाश करता था |

आज जब भगवान ने उसे अपना एक ऐसा मित्र दिया था ,जिसके सामने वह अपने भीतरी सारे दुखों को प्रकट कर सकता था | रश्मि को वह भगवान प्रदत मित्र से बहुत ज्यादा मानता था , वह ऐसी उलाहना एक बार नहीं, बार-बार दोहराती रहेगी तो क्या उसका अहम उसे सहन कर सकता था ? अपना पेट काटकर जो थोड़ा कुछ बन पड़ता था ,वह उसे देना चाहता था | ऐसा भी नहीं कि उसने उसके लिए कुछ भी नहीं किया | अपने विचारों से प्रभावित कर अवसाद-ग्रस्त रश्मि को लेखन-कार्य में जोड़कर नई ज़िंदगी प्रदान की थी | उसके लिए उसने कई कहानियां खुद लिखी थी,ताकि साहित्यिक जगत में उसका नाम हो और वह लोगों की प्रशंसा की पात्र बन सके | उस अवस्था में कम से कम वह अपने दुखों को भूलकर नई ज़िंदगी जी सकेगी | यह था उसका अपना मकसद | परंतु ऊंट किसी करवट बैठेगा,किसे पता था ? जिसे उसने अपना मददगार माना,अपने परिवार वालों से शत्रुता का खतरा उठाकर अपनी जिंदगी में एक अनोखे रिश्ते को जन्म दिया था | क्या यह उसके जीवन की बहुत बड़ी भूल थी ? जिसे वह पल-पल अपने भीतर महसूस करता था | दाएं-बाएं झांकने पर सिर्फ उसका चेहरा नजर आता था |दोस्तों,परिवार वालों तथा संबंधियों से छुपकर इस रिश्ते को वह पल्लवित करता जा रहा था | एक तरीके से वह दो नावों की सवारी कर रहा था | कब उसका बेड़ा गर्क हो जाएगा ,वह नहीं जानता था | उसने अपने जीवन की नौका का चप्पू भगवान के हाथ में सौंप दिया था | वह तो सोचता था कि विचार ही द्रव्य होते हैं ,मगर यथार्थ धरातल पर अक्सर ऐसा नहीं होता हैं ,द्रव्य ही द्रव्य होता हैं | 
वह अक्सर कहती थी, क्षमता से समता आती हैं,अतः आप सक्षम बनो | रोहित सोचता था क्या वह अक्षम था ? अच्छा खासा पढ़ा-लिखा नौजवान,.सरकारी .कंपनी में  प्रबन्धक के रूप में कार्य करना भी अक्षमता दर्शाता हैं |अरे, वह चाहता तो वह भी एक भ्रष्ट  अधिकारी बन लाखों रुपए कमाकर ऐशो आराम की जिंदगी जी सकता था | मगर उसके गुणसूत्र में भ्रष्टाचार  नामक डी॰एन॰ए नहीं था | उसे तो गरीब मजदूर लोग ज्यादा पसंद आते थे ,जिनमें वह अपने को सहज अनुभव करता था | रहने को क्या चाहिए,एक छोटा-सा मकान औए खाने को दो-चार रोटी | क्या धनवान लोग पैसे खाते हैं ? वह भ्रष्टाचार से कमाए हुए धन को श्मशान की हड्डी की तरह वर्जित मानता था |  उसका मानना था भ्रष्टाचार से कमाए हुए धन से वंश बिगड़ जाता हैं | और पूत सपूत तो क्यों धन संचे ,और पूत कपूत तो क्यों धन संचे |और ऐसे भी जब ईमानदारी का धन मन को शांति नहीं दे सकता है, तो बेईमानी का धन कैसे फलीभूत हो सकता है ? और ऐसे भी अपनी कमाई का दसवां हिस्सा जरूरतमन्द लोगों की सहायता में खर्च करना चाहिए | पैसों के प्रति जरा-सा भी मोह नहीं था उसका | उसके साथी जमाने के साथ अपनी ताल मिलाकर अरब-खरबपति बन गए थे | सगे-संबंधी नई-नई कंपनियां खोलकर बड़े आदमी बन गए थे | और वह उन सभी के सामने अदना था, इसके बावजूद भी वह अपने अंतर-साम्राज्य का सम्राट था | वह इस दुनिया का अपने आप को सबसे बड़ा शहंशाह मानता था | उस साम्राज्य में उसकी हुकूमत चलती थी | बाहरी दुनिया की बजाए लेन-देन,गुणा भाग,बचत-खर्च आदि सभी के निर्णय वह अपने उस साम्राज्य में लेता था ,जिसमें उसे हानि-लाभ का कोई विकल्प नहीं था | केवल भावनाओं का सम्मान था,किसे विज्ञापन देना हैं, किसकी किताब प्रकाशित करने में सहयोग करना हैं,किस गरीब लड़की की शादी में टी॰वी॰,कूलर खरीदकर देना हैं? बस,इन कार्यों में उसे आत्म संतुष्टि प्राप्त होती थी |

मगर बाहरी समाज ने कई तबकों ने उसे अपनी हैसियत के दर्पण में असली चेहरा दिखाकर जो दंश दिया ,वह किसी को दिखा नहीं सकता था | सोचता था,अभी का अभी में किसी कंपनी का चेयरमैन बनकर काफी धनराशि अर्जित कर बड़े-बड़े मकान बनाकर दिखावे के लिए लोगों को मंहगे-मंहगे तोहफे प्रदान कर सारे समाज को यह बता दूँ कि अब मैं गरीब नहीं हूं |मेरे हाथों भी में पैसा हैं | मगर मन ही मन यह बात उसे टीसती थी कि वह न केवल मज़ाक कर रहा हैं वरन यह सोचकर भी अपना मज़ाक स्वयं उड़ा रहा हैं | जहां बाईस साल नौकरी करने के बाद वह आदमी अपने लिए एक छोटी-सी कार नहीं खरीद पाया,वह आदमी अपने लिए बड़ी-बड़ी कोठियां बनाने के सपने देखना महज एक छलावे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं | उसे अपने आप पर हंसना आता था | उसे यह भी पता था कि अगर वह चाहे तो ऐसा  कुछ करिश्मा कर दिखाना उसकी प्रतिभा के अनुरूप कम से कम असंभव तो नहीं हैं | कहीं ऐसा  तो नहीं हैं कि रश्मि ने यही सोचकर अपमानपूर्वक बातें उसके उत्थान के लिए प्रेरणा-स्वरूप कही हो | मगर वह यह नहीं समझ पाया इस बार उसकी यह बात इस तरह क्यों चुभी?  उसे ऐसा लग रहा था मानो मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ने पर क्रुद्ध हुई मधुमक्खियों ने उसके शरीर को चारों तरफ से डंक मारकर सूजा दिया हो | बहुत भयंकर चुभन थी उसकी |कांटे मानो सारे शरीर में घुसकर आधे टूटकर रह गए हो | रह-रहकर दर्द कर रहे हो |
कोई जरूरी नहीं कि हर दिन अच्छा ही हो । आज उसका दिल एक अज्ञात पीड़ा से कराह रहा था | अपने एकाकीपन से उबरने के लिए जिसे अपना मित्र समझा था, वही बार-बार उसे अपने व्यंग बाणों से छलनी करता रहेगा | रोहित ने तो कभी किसी से भी आर्थिक सहायता की आशा नहीं मांगी थी,और नहीं भविष्य में भी किसी भी आर्थिक सहायता की आशा थी | वह तो औपन्यासिक  पात्रों की तरह उसे अपना सब कुछ समर्पित कर चुका था | मगर हकीकत की दुनिया में ऐसा शायद मंजूर नहीं था | अगर वह नौकरी में न होता तो क्या कोई उसे चाहता ? सही अर्थों में प्रेम नामक चीज इस दुनिया में फिलहाल नहीं है । उसने  लोक कथाओं में कभी पढ़ा था कि किसी राजा को रंक स्त्री से प्यार हो गया ,मगर वह रंक स्त्री ने कभी भी उससे किसी भी मदद की इच्छा प्रकट नहीं की | अगर प्रेम में आशा हैं ,लेन-देन का मामला हैं तो वह प्रेम नहीं हो सकता हैं, वह तो किसी मायावी/फिल्मी दुनिया की तरह एक बाजारू छलावा मात्र हैं | क्या प्रेमी  होने का अर्थ यह होता हैं कि वह प्रेम के लिए अपना सब कुछ त्याग कर निर्वासित जिंदगी जीता रहे ?  शायद वह प्यार घिनौना होगा कि जिसमें कोई प्रेमी अपने परिवार के किसी भी सदस्य की हत्या करनी पड़े । और अपने सिद्धांतों के खिलाफ किसी भी तरह जहां तहां डाका डाल अपने प्रेम के खातिर अपने आनंद की हर ख़्वाहिश पूरी करता रहे ? अगर किसी धनवान की बेटी धनी निर्धन का दामन छोड़ भी दे, क्या फर्क पड़ता हैं | कम से कम वह आम जिंदगी तो जी सकता हैं |
रोहित रात भर सोच सोचकर रोता रहा | कबीर दास जी की एक उक्ति बारबार उसके दिमाग में आती रही | “साईं इतना दीजिए,जामे कुटुंब समाए  | मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए | मगर यह उक्ति का निर्माण उस अतीत काल में हुआ था जिसमें लोग लोभ, मोह, माया-ममता से कोसों दूर हुआ करते थे | अर्थोपार्जन जीवन चलाने का माध्यम समझते थे, न कि अपने स्वार्थमयी इच्छाओं की पूर्ति का | 
‘स्वार्थ’ का नाम याद आते ही उसे रश्मि की बात याद आती थी “आप स्वार्थी हो |यह दुनिया स्वार्थी हैं | आप कायर हो | आपमें हिम्मत नहीं हैं, समाज में अपना संबंध बताने की |”

वह हंसने लगता था “ कोई आदमी स्वार्थी कैसे हो सकता हैं, जब वह दूसरों की संवेदनाओं का इज्जत करता हैं | मगर भूखे पेट भजन नहीं होता हैं | संवेदनाओं की आपूर्ति के लिए भी पैसे चाहिए | क्या उसका कथन सही था ?”

रश्मि ने इस बार यह कहकर “तुम मुझे अपने साथ तो नहीं रख सकते परन्तु तुम्हारी इतनी  हैसियत भी  नहीं हैं कि तुम मुझे कुछ दिनों के लिए बाहर घुमाकर सुकून के कुछ क्षण ही  दे सको तो इस प्यार और अपनेपन का क्या फायदा ? । ” उसके मन को बुरी तरह क्षत - विक्षत कर दिया था .

रोहित को रश्मि की बातें इस कदर चुभ गयी कि वो एक दम से चुप - चाप रहने लगा . रश्मि को उसकी चुप्पी कचोटने लगी और उसने उसे समझाने का बहुत प्रयास किया, "  कि सब तरफ से ना उम्मीद होने पर तुम ही तो मेरी उम्मीद और मंजिल हो " 
परन्तु अति संवेदन शील होने के कारण वो बात बात पर खुद भी सजा भुगाद्ता और रश्मि को भी सजा देता . 

नहीं,कभी नहीं | विवेकानंद ने तो काली माँ से अपने परिवार के लिए भी कुछ नहीं मांगा था |मांगा था तो विश्वहित के लिए | किसी को स्वार्थी कहने का लांछन लगाना महज अपने अंदर  झांककर निरपेक्ष भाव से दुनियावी हकीकत को देखने के तुल्य है।  
तरह-तरह के ख़यालों से उलझता जा रहा  था वह | उसने निश्चय कर लिया कि अगर किसी दोस्ती में तनाव पैदा होता हैं,तो बेहतर रहेगा वह दोस्ती हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाए | वह भगवान से प्रार्थना करेगा कि अगले जन्म में या तो उसे इतना हैसियत कर धनवान इंसान बनाए,जो हर दुखी लोगों की ख्वाहिशें पूरी कर सकें या फिर उन हैसियतदार  लोगों से हमेशा दूर रखे तो अवसर पड़ने पर अपने आपको प्रताड़ित तथा मनोरोगी बताते हुए उसे गरीब तथा अक्षम जैसे हीन शब्दों से संबोधित करें | ऐसे बड़े आदमियों से उसे क्या लेना-देना ,जो दूसरों के काम न आए तो न सही, मगर उसकी सच्ची भावनाओं का खिलवाड़ करते हुए हंसी न उड़ाए | हरेक आदमी की अपनी सीमा और मर्यादा होती हैं | ‘बड़ा भया तो क्या भया जाके पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर’ । वह उस सीमा और मर्यादा का उल्लंघन न करें, ताकि किसी भी आदमी का आत्म स्वाभिमान ,पौरुष ,कार्यशैली,निष्ठा ,कर्तव्यपरायणता,और कर्मठता,प्रश्नवाचक बनकर रह जाए | जहां रश्मि अपने समर्थ दोस्त के समय का ख्याल रखते हुए कहती कि उनके पास इन बेफिजूल की बातों के लिए कहां समय होगा ? वह पूरी तरह से यथार्थ धरातल को स्पष्ट करते हुए कहती कि हमें व्यवहारिक होना  चाहिए | बड़े-बड़े सोने के महलों में रहने वालों को भी अगर मानसिक शांति नहीं मिलती हें तो उन सोने की ईंटों से बने दीवारों वाला वह प्राचीन  महल  एक कैदखाने से कम नहीं हैं |
रोहित ने निश्चय कर लिया वह कभी भी रश्मि का वाद-विवाद,आरोप-प्रत्यारोप के द्वारा दिल नहीं दुखाएगा, वरन हर अपनी मनोविकृति का जायजा  लेते हुए बचपन से कुरेदे हुए अभिशाप के विष को गले में उड़ेलते हुए और कभी तांडव नृत्य नहीं करेगा | करेगा तो केवल एक ही चीज | आत्म-समर्पण | सब कुछ भगवान के ऊपर छोड़ देगा | जो मंजूर होगा ,उसे शिरोधार्य करेगा | ज्यादा भावुक बन किसी के भी दिल को नहीं दुखाएगा | जितना बन पड़ेगा ,अवश्यकता मंद लोगों का सहयोग करेगा | मगर अपने उस आत्मसमर्पण के सामने अपने आत्माभिमान  चीन की दीवार की तरह कभी भी टूटने नहीं देगा,भले ही उसकी जान क्यों न चली जाए |
 वह मंदिरों में अपनी शांति के लिए कभी नहीं गिड़गिड़ाएगा,वरन अपने भीतर की सुषुप्त ऊर्जा को जागृत कर एक नवनिर्माण के कार्य की तलाश में नए-नए सृजन और उनके अनुभवों को आत्मसात करते हुए अपनी जीवन यात्रा समाप्त करेगा | वह उन तत्त्वों से जो बार-बार उसे दुनिया की भूलभुलैया में भटकाते रहते हैं, उनसे ऊपर उठने का प्रयास करेगा और बाहरी दुनिया को छोड़ भीतरी  दुनिया का यात्री बन अलग-अलग मानसिक स्तरों का शोध करेगा | आज के बाद उसके जीवन में न तो रमा नाम की कोई तत्व रहेगा  और न ही रश्मि नाम की उत्प्रेरणा | जीवन अकेले जीना हैं,जीना होगा | आत्महत्या करना ईश्वर के नियमों में जबरदस्त दखलंदाजी हैं,अतः वह हस्तक्षेप नहीं करेगा | जो कष्ट आएगा, उसे भुगतने के लिए तैयार रहेगा | और भीतरी हैसियत की बदौलत एक शांत संसार का निर्माण कर स्वर्गधाम पहुंचेगा |

रश्मि उससे अक्सर कहा करती थी , " रोहित, चाहे  मैं  तुम्हे जितना भी भला बुरा कह दूँ पर  पता नहीं कैसा अनोखा बंधन है हम दोनों में कि तुम्हे जरा भी तकलीफ होती है तो दर्द मुझे होता है  " 
उधर रोहित भी तो रश्मि के बारे में दिन रात यही महसूस करता था .
बेशक वह बात- बात पर खुद ही रोहित को इस तरह के शब्द कहती और उसकी सहन शक्ति को आजमाती रहती क्योंकि वो मन ही मन सोचा करती की अगर रोहित का प्यार सच्चा है और वो उसके नसीब में है तो कोई भी दुनिया की ताकत उसे उससे छीन नहीं सकती . इस तरह वो न सिर्फ रोहित की बल्कि खुद की भी परीक्षा लेती रहती और उसके साथ साथ खुद को भी सजा देती ये जानते हुए भी की वो लाख कोशिशों के बावजूद रोहित के बिना जिन्दा नहीं रह सकती . परन्तु उसे क्या मालुम था की इस बार उसे इतनी कड़ी परीक्षा देनी पड़ेगी . 

रोहित को अक्सर उसके दोस्त जो काफी तरक्की कर चुके थे वे भी आर्थिक तौर पर कम समझते थे और उस पर व्यंग्य बाण छोड़ने में कसर न छोड़ते तो  उसका मन भी चाहता था कि वो दुनिया को कुछ कर दिखाए और रश्मि को तो वो ख़ास तौर पर दुनिया के सारे सुख देना चाहता था . रात- दिन अब तो रोहित पर एक ही धुन  सवार हो गयी की वह रश्मि को कैसे हैसियत  दार  बन  कर दिखाए . न उसे खाने का होश था न पीने का बस हर समय अपने को काम में डुबोये रखता .


रोहित आज बहुत  ही खुश  है , वह जहाज  से पहली  बार रश्मि को मिलने  जा रहा है उसे सरप्राइज देने और उसने एक पहाड़ी जगह पर उसे घुमा कर लाने  का प्लान भी बना लिया है . जैसे ही वह रश्मि के शहर के ऊपर उड़ रहा था उसकी धड़कने बढ़  रही थी . आज वह कई कंपनियों का मालिक था . रश्मि को सारी दुनिया का सुख दे सकता था . उसे रश्मि के घर का पता अच्छे  से याद था क्योंकि उसने कई बार उसे किताबें और कुछ तोहफे पोस्ट से भेजें थे . जैसे ही जहाज लैंड होने की घोषणा हुई तो रोहित ने देखा की जहाज एक शहर के ऊपर मंडरा रहा था . रोहित मन ही मन सोचने लगा की इनमे से ही किसी घर में उसकी रश्मि रहती होगी. जब रोहित रश्मि से फोन पर कई बार बात करता था तो कई बार जब रश्मि अपने घर की छत पर खड़ी होकर रोहित से बात करती होती तो अचानक जहाज की आवाज आने से रश्मि चुप हो जाती तांकि जहाज निकल जाए.   सुबह के दस बजे थे तो रोहित मन ही मन अनुमान लगाने लगा की शायद रश्मि किसी घर की छत पर खड़ी हो और अपने लम्बे घने बाल सुखाती नजर आ जाए उसे फिर अपनी व्याकुलता पर खुद ही मुस्कुराने लगा . 
एअरपोर्ट से बाहर आकर उसने टैक्सी वाले को रश्मि के घर का पता दिखाया तो वह झट से तैयार हो गया . 
  
रश्मि का घर शहर से दूर बाहर वाले इलाके में एअरपोर्ट के पास ही था . रास्ते में कुछ हरे भरे खेत दिखाई दिए तो रोहित को हर चीज में रश्मि दिखाई देने लगी . वहाँ की मिटटी , हवा में से रश्मि की महक आने लगी. उसका मन इतना उत्तेजित पहले कभी नहीं हुआ था . रास्ते में एक मंदिर आया तो वहाँ से उसने एक फूलों का गुलदस्ता रश्मि के ले लिया , वैसे वो अपने साथ रश्मि से इतनी देर बातचीत के दौरान जो जो ख्याल दिमाग में आता था काफी सामान इकठ्ठा कर लिया था उन्हें वो अछे से पैकिंग कागज़ में पैक कर साथ लाया था . १० मिनट का रास्ता भी तय नहीं हो रहा था . जैसे ही उसे कुछ मकान सामने दिखने लगे तो उसे लगा की इन्ही घरों में जरूर रश्मि का घर होगा . वहाँ से कुछ रिहायशी मकानों की कालोनियां शुरू हो रही थी जिन पर उनके नाम भी बाहर गेट पर लगे हुए थे . रोहित को रश्मि की कालोनी का नाम अच्छे से राटा हुआ था . वो उन नामों को बड़े ध्यान से पढने लगा . पर कोई भी नाम जाना पहचाना नहीं लग रहा था . जैसे ही अचानक उसने मयूर कालोनी की नाम प्लेट लगी हुई देखी  तो उसे ऐसा लगा मानों उसकी धड़कन रुक गयी है , ऐसा तो उसे पहले कभी महसूस नहीं हुआ था . गेट कीपर से उनके घर का नंबर पूछ कर वो अन्दर प्रवेश कर गए. और टैक्सी वाले से जैसे ही गाडी को उस नंबर के आगे रोक जिसे वो कई वर्षों से डाक के लिफाफों पर लिखता आया था तो उसके दिल में अजीब सी उमड़ घुमड़ होने लगी . टैक्सी वाले को उसने रुकने का इशारा करके उस घर की काल बेल बजाने वो आगे बाद गया . कई ख्याल उसके मन में आ जा रहे थे . कहीं रश्मि ने इतनी देर में विवाह तो नहीं कर लिया . कहीं वो घर से बाहर तो नहीं गयी हुई. पूरे दो वर्ष हो गए थे रश्मि से उसे बात किये हुए. तभी दरवाजा खुला तो एक अधेड़ उम्र की औरत ने दरवाजा खोला तो उसने बड़ी आत्मीयता से अभिवादन करके पूछा 
 , " जी, मैं रोहित ! " अभी वो सहमा सकुचाया सा इतना ही कह पाया था की सामने से उस औरत ने कहा , " हाँ हाँ , बेटा तुमने  आने में बहुत समय लगा दिया , वो  तो कबसे तुम्हारे आने का  इन्तजार कर रही है और .........." ये कहते हुए उस औरत के होंठ कांपने लगे . और वो उसे अन्दर एक अँधेरे से कमरे में ले गयी जहां पर पलंग पर एक लड़की लेटी हुई थी जो की काफी बीमार लग रही थी . ऐसे लग रहा था जैसे एक निर्जीव प्राणी लेटा हुआ है जिसके जिस्म में कोई हरकत नहीं है 
तभी वो औरत बोली, " बेटा, शायद ये तुम्हे मिलने के वास्ते ही  जिन्दा है आज तक " 
ये देखकर रोहित की आँखों से अविरल आंसुओं की धारा बहने लगी की कोई इतना भी प्यार कर सकता है किसी से आज कल के समय में . उसके कानों में रश्मि के कहे शब्द गूंजने लगे ,
 " रोहित, तुमसे जब एक दिन भी बात न हो तो ऐसा लगता है जैसे मेरी सांस  चलना बंद हो गयी हो  और एक जिन्दा लाश रह गयी है  , परन्तु  हमारी आत्माएं तो एक है इसलिए  हमारे प्राण तो एक साथ ही छूटेंगे इस दुनिया से " 
रोहित की आत्मा तड़प उठी .  " कितनी कड़ी परीक्षा ले ली जाने- अनजाने मैंने तुम्हारी अपनी जिद के कारण और तुमने मुझे इसकी भनक भी नहीं लगने दी .  अगर तुम्हे कुछ हो जाता तो मैं भी जिन्दा नहीं रहता और अपने को न माफ़ कर पाता " 
 ऐसा कहते ही उसने  आगे बढकर रश्मि को गले लगा लिया और  फूट  फूट  .कर बच्चों की तरह रोने लगा ,

आज की नारी


आज की नारी
स्कूटर से लेकर
चलाती फरारी

आज की नारी
स्कूटर से लेकर
चलाती फरारी
जमाने के जुल्मों सितम
से फिर भी हारी

आज की नारी
साइंस से लेकर
एम्. बी. ऐ .तक
 करती पढ़ाई सारी
समाज के झूठे रीति - रिवाजों
से रही किस्मत की मारी

आज की नारी
बच्चों के जन्म से लेकर
करती सब काम भारी
दुर्गा का रूप
त्याग की मूर्त
जिसकी ममता
जग से न्यारी

आज की नारी
बच्चों को स्कूल छोड़ने से लेकर
 खरीदती भाजी तरकारी
माता पिता की लाडली
ससुराल को फिर भी लगती
नहीं प्यारी



आज की नारी
घर से लेकर
आफिस तक लेती सब जिम्मेवारी
पुरुष के अहम् के आगे
टकराती
बारी- बारी

आज की नारी
स्कूटर से लेकर
चलाती फरारी

Sunday 14 April 2013


तुम्हारी स्मृतियाँ

स्मृतियाँ जैसे गुजरे वक्त को
पीछे की ओर फलाँगती जा रही थीं तेजी से,
शिमला  के मालरोड  की मिठास ,
गड़बड़झाले की चूड़ियों की खनक,
चौक की मशहूर हरी ठंडाई की मस्ती
मंगलवार को हमारे युग्म करों से हिलाए गए
हनुमान मंदिर के घनघनाते घंटे,
गर्मियों की धूप और जाड़े की सुरसुरी में
सजीली छतरी वाले रिक्शों में सिमट कर
शहर की गलियों में खाए गए हिचकोले,
चंडीगढ़ के मनसा देवी के मंदिर  में महसूसे गए
खुशबुओं के झोंके,
लखनऊ का हर खास अहसास
अचानक जैसे छलक उठा हो
कंप्यूटर की स्क्रीन पर।
सहसा सप्राण-सी होती लगी
मेरे फेसबुक के पन्नों की निर्जीव सतह
मुझे लगा,
जैसे सदेह उतर आई हो तुम सामने
मेरे वेब-पृष्ठों की भित्ति पर अंकित
अपने इन शब्दों के साथ,


वर्षों पहले लखनऊ की भूलभुलैया में 
बिछुड़कर भटक गए
बाहर निकलने का रास्ता तलाशते हमारे प्यार को 
अब साइबर स्पेस के इस पुनर्जन्म में 
अभिव्यक्ति के नए आयाम मिलने जा रहे थे 
हमारे सपनों को जैसे अब नए पंख लगने वाले थे 
उम्रदराज चीटियों की भाँति
काफी इंतजार के बाद निकलने वाले पंख,
आग में कूद पड़ने को आतुर मन को
दाह-स्थल तक उड़ाकर ले जाने को बेताब पंख,
अदृश्य, अलौकिक होंगे 
साइबर स्पेस में उगते हमारे सपनों के ये पंख,
फेसबुक के पन्नों के बीच 
अब उड़कर समा जाया करेंगे हम दोनों 
एक-दूसरे के शब्दों के आगोश में
नित्य, अशरीर
इस दुनिया की नजरों से दूर
अवशेष जीवन के नए अर्थ तलाशते,
एक-दूसरे की सुरक्षित भित्तियों पर 
निरंतर लिखते हुए कुछ गुदगुदाने वाली बातें
और कंप्यूटर के सामने जाग्रत बैठकर 
साइबर-प्रेमालाप में बिताते हुए 
अपनी सारी कसमसाने वाली रातें

वसंत 

इन फूलों का नाम मैं नहीं जानता, 
जानता हूं उस वसंत को 
जो इन फूलों के साथ मेरे कमरे में आया है .... 

चाहताहूं 
तुमसे रूठ जाऊं 
कई दिनों तक नजर ना आऊं 

मगर कैसे 
वासंती मौसम के पीले फूल 
ठीक मेरे सामने हैं 
बिलकुल तुम्हारी तरह 

सोचता हूं 
तुमसे मिले 
जब गुजर जमाना जाएगा
तब भी 
जीवन के हर एकांत में 
पीले फूलों का यह खिलता वसंत 
हर मौसम में मुझे 
मुझमें ही मिल जाएगा 
और तब तुम्हारा अनोखा प्यार 
मुझे बहुत याद आएगा।