Friday, 20 January, 2012

याद -2


याद

तुम्हारे बिना सूने नयन
बिन बात हुमकता है मन
बार-बार देख मोबाइल के बटन
जब नहीं उठाते हो ,पता नहीं क्यों
घनघोर घटा लिए गगन
गरजने लगता मेरे तन
बहने लगती तेज पवन
स्मृतियों के अंधे वन में
और सामने आता
छह दिन का वह विदेशी जीवन
मुझे लगता है
मेरे भीतर तुम्हारा होना
बदल देता है मेरे चेहरे की रौनक
मेरी आँखों के उजड़े वन में
पतझड़ का दौर चलता है
और आती है तुम्हारी अनगिनत यादें
मगर फर्क किसे पड़ता है ?
भीतर से टूटा मन
खंखालता निस्संग जीवन
शायद इस करवट बदलती दुनिया में
सफर के कुछ क्षण ही बाकी है
काश आत्म-पीड़ा से ही सही
जी लूँ ये पल

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