Monday, 4 April 2011

चील

दूर खेतों में एक जानवर की लाश पर कई चील मंडरा रहे थे . आपस में वह मॉस नोचने के लिए लड़ रहे थे . सोहनलाल अपनी बालकनी में बैठे अखबार पढ़ रहे थे जब उन्होंने यह भयानक नजारा देखा . उनके रोंगटे खड़े हो गए यह दृश्य देखकर . पता नहीं कौन सा जानवर रात को खेतों में दम तोड़ गया होगा . जानवर पहचान पाना मुश्किल था . पर खेतों में गाय ही अक्सर घूमती हुई नजर आती थी. ये बेजुबान जानवर भी कितने बेबस होते हैं , अपनी तकलीफ को किसी को बता भी नहीं सकते . अभी सोहनलाल यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें गेट के बाहर कोई खड़ा दिखाई दिया . उनकी धुंधली आखों को साफ़ नहीं दिख रहा था और उनका चश्मा भी पुराना हो चला था पर उनके बेटे रोहित जैसा ही कोई लड़का खड़ा दिखाई दे रहा था .उन्हें लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर जरुर यह उनकी आँखों का धोखा है . उन्होंने अपनी बेटी सुगंधा को आवाज लगाई , " बेटे , देखो तो गेट पर कोई खड़ा है क्या ?"

पाँच साल हो गए थे उन्हें सुगंधा के पास आए हुए . उस दौरान रोहित ने शुरू- शुरू में दो- तीन बार फोन किया था, उसके बाद तो सुगंधा ही कभी- कभार फोन कर लेती थी खैरियत पूछने और बताने के लिए . उनकी तो रोहित से बात हुए भी काफी अरसा बीत गया था .

तभी सुगंधा दौड़ी- दौड़ी आई , " पिताजी , रोहित भैया आए हैं अपने बेटे के साथ . ड्राइंग रूम में बैठे है आप भी आ जाइए . "

बेटे की खबर सुनकर सोहनलाल की आँखें भर आई पर पता नहीं क्यों उनके कदम जड्वंत से हो गए ? . चाहकर भी उनमे हरकत नहीं हो रही थी . जब तक उनकी पत्नी जिन्दा थी तब तक उन्हें किसी तरह की कोई कमी का अहसास नहीं हुआ था . बिन मांगे ही सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक कोई कमी नहीं आती थी . जानकी उनके दिल की हर बात बिन कहे ही जान लेती थी . पूरा घर इतनी उम्र में भी उसने बखूबी संभाल रखा था . रोहित की शादी के बाद भी उनको अपनी बहू के हाथ का एक कप चाय तक नसीब नहीं हुआ था . रोहित और उसकी पत्नी दोनों एक ही आफ़िस में नौकरी करते थे. साथ- साथ सुबह निकल जाते और देर शाम ही लौटते थे . यहाँ तक कि उनके आफ़िस के टीफिन भी जानकी ही पैक करती थी . जब रोहित का बेटा बंटी पैदा हुआ तब भी उसकी माँ का फर्ज भी जानकी ने ही पूरा किया था . कभी- कभी तो दोनों पति- पत्नी जब तक लौटते तब तक बंटी अपनी दादी की गोद में सो गया होता . माँ की गोद तो बंटी को कभी नसीब ही नहीं हुई थी . जानकी ने ही उसे पाल- पोस कर बड़ा किया था . जानकी सोहनलाल के घर की धुरी की तरह थी . जानकी क्या गई सोहनलाल के होंठों की हँसी भी साथ ले गई . जानकी के मरने के बाद रोहित ने अपने बेटे बंटी को हास्टल में डाल दिया था . सुगंधा जब अपनी माँ के देहांत के बाद उनकी पुण्य- तिथि पर आई तो उससे अपने पिता की इतनी दुर्दशा देखी नहीं गई . सुगंधा बेशक रोहित से छोटी थी परन्तु उसमे जानकी के सारे गुण मौजूद थे . सुगंधा अपने पिता को अपने साथ अपने घर ले गई . रोहित ने अपने पिता को एक बार भी रोकने की कोशिश नहीं की जैसे कि कोई बोझ सर से उतर गया हो .आज फिर एक बार सोहनलाल के दिलो- दिमाग में पुरानी स्मृतियाँ तरो- ताजा हो गई थी . जानकी को याद करते- करते उनकी आँखें भर आई . . इतनी देर में उनका पोता बंटी उनके सामने आकर खड़ा हो गया, उसे देखकर रोहित के बचपन की तस्वीरें उनकी आँखों के सामने घूमने लगी .

बंटी ने सोहनलाल के चरण छू कर प्रणाम किया तो पीछे- पीछे रोहित भी आ गया और कहने लगा ,
" पिताजी , आप तो हम लोगों को भूल ही गए हैं . बंटी तो इतने सालों में भी आपको भूला नहीं . जब भी छुट्टियों में घर आता है आपको और माँ को बहुत याद करता है . इस बार यह आपसे मिलने की बहुत जिद्द करने लगा था . "

पोते को देखकर सोहनलाल को जानकी की ममता याद आ गई कि किस तरह वह दिन- रात उसे गोद में लिए- लिए घूमती थी .
तभी बंटी बोलने लगा , " दादा जी, मै इस बार आपको लेने आया हूँ आपको मेरे साथ चलना पड़ेगा . मेरा उस घर में आपके बिना दिल नहीं लगता . दादी की बहुत याद आती है. "

जानकी का नाम सुनकर सोहनलाल का भी पोते के प्रति प्यार उमड़ने लगा और वह चाह कर भी पोते को ना नहीं कह पाए .
वहाँ जाने पर इस बार उनकी बहू का रवैया भी काफी बदला हुआ लगा . उन्हें लगा शायद सबको अपनी भूल का अहसास हो गया है .कई दिन तक तो रोहित और उसकी पत्नी ने उनकी बहुत सेवा की . सोहनलाल यह देख- देख कर फूले नहीं समाते थे . बेटे , बहू और पोते के साथ कब दस दिन बीत गए उन्हें पता ही नहीं चला . उस घर की हर चीज उन्हें जानकी की याद दिलाती थी तो बरबस ही उनकी आँखों से आंसू बह निकलते . एक दिन जब सोहन लाल अपने पोते बंटी के साथ कैरम खेल रहे थे तो रोहित भागा- भागा आया और अपने पिता को एक चिठ्ठी दिखाते हुए कहने लगा ,
" पिताजी , देखिए तो आपके नाम यह चिठ्ठी आई है जिसमे आपके दिल्ली वाले तायाजी ने अपनी सारी संपत्ति आपके नाम कर दी है . "

सोहन लाल की समझ में नहीं आया कि वह खुश हो या दुखी हो . इस उम्र में उन्हें सकून के कुछ पलों के अलावा किसी चीज की चाहत नहीं थी . रिटायरमेंट के बाद उन्हें अच्छी खासी पेंशन मिल जाती थी जो उनके लिए काफी थी . वह रोहित को कहने लगे ,
" बेटे , मुझे तो किसी चीज की लालसा नहीं है अब, तुम्हे जैसा ठीक लगता है देख लो . यह इतना बड़ा मकान है यह भी तुम्हारा ही तो है "

दो दिन बाद रोहित अपने पिता से कुछ कागजात पर हस्ताक्षर करवाने आया और अगले दिन बंटी को अपने साथ हास्टल छोड़ने के वास्ते ले गया . बंटी की छुट्टियां ख़त्म हो गई थी . पीछे से उनकी बहू ने उनका बिस्तर ऊपर की मंजिल पर बने कमरे में लगा दिया यह कह कर कि उसकी सहेलियां आती है तो उन्हें उनकी उपस्थिति में असहज महसूस होता है .
सोहनलाल बेचारे कुछ ना कह पाए और चुपचाप ऊपर की मंजिल वाले कमरे में चले गए . बंटी के चले जाने के बाद उनका मन ही ना होता कि वह अपने कमरे से बाहर निकले . वह सारा दिन अपने कमरे में पड़े रहते . परन्तु रोहित के इस तरह के व्यवहार से उन्हें इतना आघात पहुंचा कि उनकी जीने की इच्छा ही ख़त्म हो गई . उन्हें सब समझ आने लगा कि यह सब दिखावा उस जायदाद को हासिल करने के लिए था . यहाँ तक कि इस काम के लिए रोहित ने अपने बेटे का सहारा लिया . दिल्ली से वापिस आने पर भी रोहित एक बार भी उनसे मिलने नहीं आया जैसे उसका मकसद पूरा हो गया था . ठीक से ना खाने- पीने के कारण वह काफी कमजोर हो गए थे . कमजोरी होने के कारण चलना- फिरना भी मुश्किल हो गया था .

एक दिन उनके बचपन का दोस्त रमाकान्त अचानक उनसे मिलने आ पहुंचा और कहने लगा , " सोहन लाल, भाभी के देहांत के बाद तुम अचानक ही यहाँ से चले गए . मै तुमसे मिलने तुम्हारे पीछे से कई बार आया पर यहाँ जब भी आया तो ताला लगा मिला . फिर काम वाली से पता चला था कि तुम सुगंधा के पास चले गए हो . आज भी उसने ही तुम्हारे आने के बारे में बताया तो मै तुरंत तुमसे मिलने आ गया . पूरे पाँच साल बाद मिल रहे हो "
यह कहते ही रमाकान्त की आँखें नम हो गई .

" रमाकांत तुम तो सब जानते हो , जब सुगंधा जानकी के मरने के बाद यहाँ आई तो मुझे जबरदस्ती अपने साथ ले गई "

" पर अब इतने बरसों बाद तुम्हारे बेटे को तुम्हारी याद कैसे आ गई ? "

" दोस्त , तुम्हे तो सब पता चल ही गया होगा , कि आजकल रिश्ते- नातों से ज्यादा पैसे की अहमियत हो गई हैं . कहते है ना कि जरूरत में तो लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं और रोहित जैसे बेटे तो जरूरत में बाप को गधा बना देते है "
" सोहनलाल मन दुखी मत करो , वरना भाभी की आत्मा को दुःख पहुंचेगा "

" बस दोस्त, अब तो उसके पास ही जाने की तैयारी है , जाने से पहले मुझ पर एक अहसान कर देना . इस चिठ्ठी में मेरी अंतिम इच्छा लिखी है मेरे मरने के बाद उसे पूरी कर देना " यह कहते हुए सोहनलाल ने एक चिठ्ठी रमाकांत को थमा दी .

. दिन में एक- आध बार कामवाली सोहन लाल को थोड़ा बहुत खाने के वास्ते दे जाती . कई बार तो वह खाना ऐसे ही पड़ा रहता . उनकी भूख दिन- ब -दिन मरती जा रही थी . इस बार जब छुट्टियां पड़ने वाली थी तो सोहनलाल को यह सोचकर थोड़ा अच्छा लगा कि बंटी के आने से उनका मन कुछ लग जाया करेगा . परन्तु इन्तजार की घड़ियाँ ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी . सोहनलाल निराश हो गए क्योंकि काम वाली से उन्हें मालूम पड़ गया था कि इस बार बंटी छुट्टियों में नहीं आएगा . रोहित की शक्ल भी देखे उन्हें महीना हो गया था .
रमाकांत ने सोहनलाल की अंतिम इच्छा की चिठ्ठी शहर के सम्बंधित कार्यालय और सरकारी डिस्पेंसरी में दे दी थी .

एक दिन दोपहर के वक्त रमाकांत अपने कमरे में सुस्ता रहे थे कि कामवाली दौड़ी- दौड़ी आई और रमाकांत से हाँफते- हाँफते बोली , " बाबूजी, बाबूजी ! , जरा देखिए तो आकर सोहनलाल बाबूजी कुछ बात ही नहीं कर रहे ! कल रात का खाना भी ऐसे ही पड़ा हुआ था . मुझे तो बहुत डर लग रहा है , घर पर कोई भी नहीं है ."

" रोहित को फोन करके इत्लाह दी या नहीं ? "

" नहीं बाबूजी , मैंने फोन किया था तो साहिब जी ने कहा कि वो अभी बहुत व्यस्त हैं कुछ देर बाद बात करेंगे "

" खैर कोई बात नहीं , तुम चलो मै सरकारी डाक्टर को फोन करके आ रहा हूँ "

रमाकांत ने जल्दी से सरकारी डाक्टर को फोन किया और सोहनलाल को देखने उसके घर पहुंचा तो सरकारी डाक्टर भी साथ ही पहुंचा गया .
डाक्टर ने सोहनलाल को चेक किया और अपना सर नीचे झुका लिया , " रमाकांत जी , इन्हें गुजरे हुए तो दस घंटे बीत चुके हैं . इनके बेटे को जल्द से इत्त्लाह कर दो "
रमाकांत ने भरी आँखों से सोहनलाल की अंतिम इच्छा वाली चिठ्ठी की एक कापी डाक्टर को दिखाई . डाक्टर ने वहीँ से ही अस्पताल फोन करके सोहन लाल की अंतिम इच्छा बताई कि मृत्युपर्यंत उनके शरीर को उनका बेटा हाथ ना लगाए को ध्यान में रखते हुए सरकारी अम्बुलेंस भेजने की अपील की .


जब तक रोहित घर पहुंचा तब तक अम्बुलेंस उनके पार्थिव शरीर को अपने साथ ले जा रही थी . जब रोहित अम्बुलेंस के पास अपने पिता को देखने पहुंचा तो डाक्टर ने चिठ्ठी रोहित के हाथ में थमा दी और रमाकांत को अन्दर बैठने का इशारा किया . रमाकांत जल्द से अम्बुलेंस में बैठ गए और अम्बुलेंस का दरवाजा बंद कर लिया .
रमाकांत को ऐसा लगा कि जैसे कोई चील तीव्र गति से उनके दोस्त के मृत शरीर की तरफ बढ रहा हो.

.इतनी देर में सोहनलाल के घर के आस -पास के लोग उनके देहांत की खबर सुनकर वहाँ इकट्ठे हो गए थे और सोहनलाल की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कर रहे थे.

Saturday, 12 March 2011

"मनमीत "



"मनमीत "

आँखें लगी कब से तेरी राहों में ,
कब लोगे अपनी पनाहों मे ,
काजल बिन कजरारे हो गए नैन,
जबसे बसे हो तुम निगाहों में !

सतरंगी बिखर गई फिजाहों में ,
सावन के झूलें तेरी बाहों में ,
गजरे की महक कर रही बेचैन,
प्रेम रस बरसे काली घटाओं में !

भटक रहे थे कब से गुनाहों में,
सजदे खुदा के तेरी बलाओं में ,
रातों को नींद ना दिन को चैन,
मर मिटे हम तेरी वफाओं में !

सतरंगी सुर बज उठे हवाओं में ,
सपने बुन बैठे तेरी अदाओं में ,
तेरी छूअन का ख्याल कर दे बेचैन
मन्नत मांगे मिलन को दुआओं में !


Monday, 7 March 2011

देवदूत




तरह- तरह के विचारों की उधेड़ -बुन में रेवती ने अपने बॉस के कमरे में प्रवेश किया, इससे पहले कि वह कुछ कहती ,उसके बॉस प्रशांत ने रेवती को बैठने के लिए कहा और बेल बजाकर चाय मंगवा ली .
" सर , मै आपसे कुछ कहना चाहती हूँ " हिचकिचाते हुए रेवती बोली

" मै भी कई दिनों से तुमसे कुछ कहना चाहता था . मै तुम्हारी बहादुरी से बहुत प्रभावित हूँ. तुम ना केवल प्रतिभावान हो बल्कि बहुत गुणवान भी हो . मै चाहता हूँ "................कहते- कहते वह रुक गया

कुछ देर कमरे में शान्ति छायी रही फिर गहरी सांस भरते हुए प्रशांत ने फिर से कहना शुरू किया ..

" रेवती मै तुम्हे चाहने लगा हूँ और तुमसे शादी करना चाहता हूँ पर शायद दूसरी बिरादरी का होने के कारण तुम्हारे घर वाले मुझे पसंद न करे "

रेवती तो खुद प्रशांत से यही बात करना चाहती थी जैसे उसके मन की बात उसने बिना कहे भांप ली हो .वह मन ही मन भगवान् को धन्यवाद देने लगी कि वो तो बहुत पहले से ही प्रशांत को अपना मान चुकी थी .
" सर, आप तो जानते हो कि मेरे घर वाले बहुत रूढ़िवादी हैं और ऊपर से मेरे साथ उस रात का वाकिया जो कि मेरे जीवन के लिए अभिशाप बन गया है " यह कहते ही रेवती ने रोना शुरू कर दिया .
" उस रात वाली घटना में तुम्हारा कोई कसूर नहीं . बल्कि तुम्हे तो तुम्हारी बहादुरी के लिए मेडल मिलना चाहिए .रेवती घबराओ मत , जब तक तुम्हारे घर वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं होंगे मै तुम्हारा इन्तजार करूँगा . उस घटना को एक बुरा सपना समझ कर भूल जाओ . और अब हमारे में कोई औपचारिकता नहीं है मुझे सर मत कहा करो "


रेवती बचपन से ही बहुत ही शरारती लड़की थी , हर किसी से चाहे वह अखबार वाला हो , दूध बेचने वाला हो , सब्जी वाला हो या फिर पोस्टमेन हो सभी से बेझिझक दिल खोल कर बातें कर लेती थी .उसकी दुनिया में आदमी हो या औरत सब सज्जन लोग थे .लड़कों के साथ साइकिल चलाना , कंचे खेलना उसकी रोज की दिनचर्या थी और जब कभी साइकिल से गिर जाती या फिर कंचे खेलती हार जाती थी तो सब लड़के उस पर हंसने लगते थे .उस पर उसे इतना गुस्सा आता था कि वह उन्हें खूब बुरा भला कहती . एक बार लड़कों के साथ मुकाबला करते तेज रफ़्तार से साइकिल चलाते हुए गिरने से उसकी हाथ की हड्डी भी टूट गई थी, आखिर थी तो नाजुक ही पर करना चाहती थी लड़कों से मुकाबला . कुल मिलकर वह अत्यंत साहसी लड़की थी और नेतृत्व करने के भी सारे गुण उसमे विद्यमान थे . मगर समाज में लड़के और लड़की को लेकर फैले हुए विभेद के कारण उसके मन में विद्रोह की ज्वाला भी धधकती थी .उसे बहुत खराब लगता जब उसकी माँ उसके भाई को हर समय कान्हा- कान्हा कह कर पुकारती उसके पीछे- पीछे घूमती रहती . जब रेवती को अपनी माँ की बातों पर गुस्सा आता तो उसकी माँ उसे सफाई देते हुए कहती ,
" तुम तो शादी करके पराये घर चली जाओगी क्योंकि लडकियां तो होती ही पराया धन है तब हमारे बुढ़ापे की लाठी तो मेरा कान्हा ही बनेगा "

रेवती मन ही मन कुढ़कर रह जाती .उसके बालमन में इस विभेद को लेकर एक आक्रोश पनपता जा रहा था जिसकी खबर उसे स्वयं भी नहीं थी. उसके पिताजी अक्सर उसके खिन्न हुए चेहरे को भांप लेते थे और उसे सात्वना देते हुए कहते थे ,
" रेवती बेटे, तुम अपनी माँ की बातों का बुरा मत माना करो, तुम्हे पता तो है वह पुराने जमाने की है और आजकल के बदले समय में भी उसके दकियानूसी विचार बदले नहीं है "

पिता की बातें सुनकर उसे कुछ तसल्ली मिल जाती और वह पिता के सीने से चिपक जाती और मन ही मन सोचती कि हर लड़की को ऐसे ही पिता मिले .

पढ़ाई में भी होशियार होने के कारण रेवती ने अच्छे अंकों में शहर के कालेज से कामर्स में बी. काम. की डिग्री हासिल कर ली और साथ वाले ही शहर में एक बैंक में उसे नौकरी भी मिल गई .पर जैसे ही उसने अपनी नौकरी की खबर घर में बताई तो एक तूफ़ान-सा आ गया हो जैसे. उसकी माँ तो बिल्कुल भी उसे बाहर भेजने को तैयार नहीं थी . काफी मुशक्कत करने के बाद उसके पिताजी के बीच- बचाव करने के कारण जैसे- तैसे उसकी माँ तैयार हो गई . नौकरी के साथ- साथ उसने पत्राचार से अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखी . स्वतंत्र विचारों की होने के कारण नौकरी के साथ उसमे काफी बदलाव आ गया . अब वह अपने मन मुताबिक़ आधुनिक परिधान पहनने लगी और अपने आफ़िस के स्टाफ के साथ बैंक के काम के सिलसिले में लोगों से मिलने बाइक पर इधर- उधर जाने लगी. रेवती की इच्छा थी कि वह समय आने पर अपने विवाह का खर्च भी खुद ही उठाये जब कि उसके पिता बैंक में मैनेजर थे पर फिर भी वह माता- पिता पर किसी तरह का बोझ नहीं डालना चाहती थी .

रेवती की पढ़ाई पूरी होते ही जात बिरादरी वाले उसके माता- पिता को बिन मांगे सलाह देने लगे कि रेवती अब जवान हो गई है इसलिए जल्द ही उसके हाथ पीले कर दो वरना आज कल के जमाने का क्या भरोसा . रिश्तेदारों के बार- बार कहने पर उसके माता- पिता को भी उसके विवाह की चिंता होने लगी . एक बार उसकी माँ ने रिंकी से अकेले में कहा ,
" रेवती अब तो तुम्हारी पढ़ाई भी पूरी हो गई है और अच्छी नौकरी भी कर रही हो तो हम सोच रहे है कि कोई अच्छा सा लड़का देखकर तुम्हारी शादी कर दे , तुम्हारा क्या विचार है ? ."

"मेरी शादी के लिए इतनी चिंता क्यों कर रही हो ,मेरे से जल्द पीछा छुड़ाना चाहती हो ना !आज तक तो मेरी चिंता की नहीं .जब मै अच्छे से सेट हो जाउंगी तो अपने बलबूते पर अपनी शादी कर लूंगी आज के बाद मुझे शादी के बारे में कभी मत पूछना ."
बहुत ही कर्कश आवाज में रेवती ने अपनी माँ को जवाब दिया .शुरू से रेवती के मन में अपनी माँ के रवैये के कारण आक्रामक तेवर घर चुके थे .वह मन ही मन सोचा करती थी कि अगर उसके बेटी होगी वह अपनी बेटी से कभी भी इस तरह का बर्ताव नहीं करेगी.

उसकी माँ बात- बात पर रेवती पर छीटाकशी करने से बाज नहीं आती थी ,
" तुम्हारे जैसी लडकियां जब ससुराल जायेंगी तो खानदान की नाक जरुर कटवायेंगी .तुम्हे तो कोई भी बात कह दो तो गुस्से से आग बबूला हो जाती हो .माँ होने के नाते तुम्हारे विवाह की चिंता मै नहीं करुँगी तो क्या पड़ोसी करेंगे? "

रेवती से भी रहा नहीं जाता था ,
" माँ, तुम तो हर समय ऐसी बातें करती हो जैसे मेरी सौतेली माँ हो . पिताजी से भी समय- असमय झगडा करती रहती ही और रानी सती की तस्वीर के सामने बैठकर सारा दिन रामचरित मानस पढ़ती रहती हो . कभी भी समय निकाल कर धैर्य से किसी के मन की बात जानने की भी कोशिश की है और बचपन से ही अपने दकियानूसी विचारों के कारण मेरे साथ पक्षपात करती आई हो "

.ये सब बातें सुनकर उसकी माँ एक कोने में बैठ कर रोने लगती और भगवान् से मन ही मन प्रार्थना करने लगती कि भगवान् रेवती को सन्मति कब देगा .

ऐसे ही हर समय माँ- बेटी के बीच में अंतर्कलह चलता रहता था .कई बार उसके पिताजी के हस्तक्षेप के बावजूद भी कोई समाधान नहीं निकल पाता था .

एक जीवन की घटना ने रेवती के जीवन को इस कदर बदल दिया जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी .उसका घर शहर से दूर एक अलग- थलग जगह पर हवेलीनुमा बना हुआ था . आस- पास कोई भी और घर नहीं बना हुआ था . बस आस -पास खेत , कुछ कंपनियों के मुख्यालय और कुछ वर्कशाप आदि थे जो कि रात के समय बंद हो जाते थे .रेवती हर छुट्टी को अपने घर आ जाया करती थी इसलिए अगले दिन रविवार था इसलिए वह अपने घर पर ही थी . उस रात को कुछ सेंधमारों ने उसके घर की खिड़की से दबे पाँव उसके घर में प्रवेश किया .घर में तीन - चार बड़े हाल नुमा कमरे बने हुए थे . एक कमरे में उसके माता- पिता और और एक कमरे में उसका छोटा भाई और तीसरे कमरे में वह सोई हुई थी .रेवती वाले कमरे में एक बड़ी सी अलमारी पड़ी थी .चोरों ने बारी- बारी सब कमरों की सेंध ली . रेवती के कमरे को छोड़कर उन्होंने सारे कमरे बाहर से बंद कर दिए और रेवती वाले कमरे की अलमारी तोडनी शुरू की .एक चोर रेवती के मुँह में कपड़ा ठूंस कर उसे बाँधने लगा तो रेवती की नींद खुल गई ,रेवती की समझ में कुछ नहीं आया पर उसने उस चोर के हाथ को काट लिया तो दर्द के मारे चोर ने रेवती के मुँह पर जोरदार तमाचा मारा . रेवती को मुकाबला करता देख दोनों चोर मिलकर उसे मारने लगे.

रेवती ने तुरंत ही हकीकत को भांप लिया .उसे लगा कि वह किसी घोर मुसीबत में है . उसे लगा कि चोरों ने उसके माता- पिता और भाई को या तो बेहोश कर दिया है या फिर उनकी जान खतरे में है .ऐसा सोचते ही कि शायद अब उसे अकेले ही इनका मुकाबला करना है एक अनजान शक्ति उसके शरीर में प्रवेश कर गई . उसने जोर- जोर से चिल्लाते हुए पास में पड़ी एक लाठी से चोरों पर प्रहार करना शुरू कर दिया . चोरों को इस तरह के मुकाबले की एक लड़की से बिल्कुल उम्मीद नहीं थी इसलिए वह घबरा गए और वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गए .रेवती का सर चकरा रहा था . चोरों को भागता देखकर वह बरामदे तक गई और अपने माता- पिता के कमरे की चिटकनी खोलकर वहीँ बेहोश होकर गिर गई . इतनी देर में रेवती की आवाजें और शोर गुल सुनकर उसके माता- पिता जाग गए थे और दरवाजा खोलने का भरसक प्रयास कर रहे थे . वे अपनी फूल-सी कोमल लड़की को इस तरह देखकर घबरा गए .सारा माजरा समझते ही वह सोच में पड़ गए कि आखिर उनकी बेटी ने किस तरह से खतरनाक गुंडों का सामना किया होगा . रेवती की सांस तो चल रही थी परन्तु आँख और चेहरे पर लगतार प्रहार के कारण चेहरा नीला पड़ गया था और गर्दन पर भी तमाचे के निशान पड़ गए थे .

सुबह होते- होते घर पर पुलिस आ गई और तरह- तरह की तहकीकात करने लगी .रात की घटना की बात सब जगह आग की तरह फ़ैल गई और उनके घर पर मित्रों , रिश्तेदारों और पड़ोसियों का तांता लगना शुरू हो गया . लोग आपस में तरह- तरह की बातें करने लगे . कोई रेवती की हिम्मत की दाद दे रहा था तो कोई चोरों को कोस रहा था तो कोई चोरी के माल के बारे में जानने को उत्सुक था . किसी- किसी को आज कल के समय में जान माल को लेकर अनिश्चितता सता रही थी .इस तरह हर कोई अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था . कोई- कोई तो रेवती को ही कसूर वार ठहरा रहे थे.

लोग बातें कर रहे थे कि इतने अच्छे कपड़े बाहर पहन कर जाएगी तो आवारा लोग तो पीछा करेंगे वरना इसके यहाँ होने पर ही चोर घर में क्यों घुसेंगे . आज तक तो कोई आया नहीं घर में चोरी करने .जितने मुँह उतनी बातें थी. रेवती के कानों में भी सब बातें पड़ रही थी .डाक्टर ने रेवती की मरहम पट्टी कर दी और उसे आराम करने की सलाह दी. उसके बैंक में जब बात पहुँची तो उसके साथी लोग उसका हाल- चाल पूछने उसके घर पर आए .सभी सहानुभूति जता रहे थे और रेवती की बहादुरी की तारीफ़ भी कर रहे थे . उसके बॉस प्रशांत ने तो उसकी तारीफ़ में यह तक कह दिया ,
" रेवती तुम तो रियल हीरो हो .मुझे नाज है कि तुम्हारे जैसी बहादुर लड़की हमारे बैंक में काम करती है ."

प्रशांत की प्रशंसा पाकर रेवती को बहुत आत्मबल मिला जिससे ना उसके बाहरी घाव भरने में मदद मिली बल्कि उसके बेचैन मन को भी बहुत तसल्ली मिली.

एक दिन जब वह बाज़ार अपने पिताजी के साथ कुछ जरुरी काम से गई तो एक दुकानदार से बोले बिना रहा नहीं गया ,
" गुप्ता जी, क्या यह वही लड़की नहीं है जिसके लिए कुछ आवारा गुंडे घर में घुस आए थे कोई अप्रिय घटना तो नहीं घटी ?"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है " ऐसा कहते हुए रेवती के पिता ने दूसरी दुकान की तरफ रुख कर लिया मगर रेवती का संवेदनशील मन तड़प उठा .

उधर दूसरी तरफ उनकी बिरादरी के कुछ लोग खड़े थे , उनको आता देख उसके पिता से कहने लगे ,
" इस हादसे के बाद आप कितना भी दहेज़ खर्च कर लो मगर आपकी बेटी की शादी अब बिरादरी में होना तो काफी मुश्किल है "

रेवती के मन में एक- एक बात शूल की तरह चुभ रही थी कि क्या यही समाज है ? कि उसकी हिम्मत की दाद देने की बजाय कितनी कडवी बातें मुँह से निकालने से बाज नहीं आते है . उसे जात बिरादरी के नाम से नफरत होने लगी कि ये समाज के ठेकेदार है क्या ? . उसे लगा कि इससे अच्छा उसकी जान ही चली जाती उस दिन तांकि उसके माता- पिता को उसकी वजह से शर्मिंदगी भरी बातें तो ना सुननी पड़ती .

ये सब बातें सुन- सुनकर रेवती के कान पक गए थे इसलिए उससे रहा नहीं गया और अपने पिता से बोली ,
" चलिए पिताजी, घर चलिए , बस हो गई जितनी खरीदारी होनी थी "

" रुको रेवती , पहले पूरा सामान तो लेले , तुम्हारी मम्मी ने जो सामान की लिस्ट दी थी उसमे से अभी काफी चीजें बाकी है "

"रहने दो पिताजी, बाद में ले लेना मेरे सर में दर्द हो रहा है "

उसे अपने सर में भारीपन महसूस हो रहा था और जी मिचला रहा था . घर जाते ही किसी से बिना कुछ कहे वह औंधे मुँह बिस्तर पर लेट गई . पिताजी को इस बात का अहसास हो गया था कि सबकी बातों की वजह से ही रेवती का मन उदास हो गया था . उसके पिताजी के कहने पर उसकी माँ ने कमरे में जाकर रेवती को समझाने का प्रयास किया ,
" देखो रेवती बेटे ,दुनिया वालों की बेसिर पैर की बातों का बुरा नहीं मानते . लोगों को तो बातें करने का कोई ना कोई बहाना मिलना चाहिए " .

रेवती ने अपनी माँ की बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई . उसके भीतर तो लोगों की बातों के कारण अपनी अस्मिता को लेकर एक भयंकर तूफ़ान उथल- पुथल मचा रहा था .बचपन से लेकर अपनी माँ के पक्षपात व्यवहार से लेकर , घर में माता- पिता के बीच घरेलु झगडे , और अब बिरादरी वालों की घटिया टीका- टिपण्णी से वह भीतर ही भीतर टूटती जा रही थी . उसे अपनी बिरादरी के ठेकेदारों से नफरत हो गई थी . उसके लिए कई अच्छे- अच्छे रिश्ते भी आए पर उसने अपनी दकियानूसी बिरादरी में शादी करने से साफ़ इनकार कर दिया .

रेवती की इस तरह की आक्रोश भरी बातें उसकी माँ ने कभी नहीं सुनी थी. उसे रेवती के व्यवहार पर क्रोध भी आ रहा था उस पर दया भी आ रही थी मगर उस नाजुक समय में उसने चुप रहना बेहतर समझा . अपनी माँ को चुप हुआ देखा कर रेवती ने सब घर वालों के सामने ऐलान कर दिया ,
" आप सभी मेरी शादी की चिंता छोड़ दे , मैंने अपनी पसंद का वर ढूँढ लिया है "

" अपनी पसंद का वर ? " क्या कह रही हो ? उसके पिता ने हैरान होते हुए कहा " कौन है वह ? "

" समय आने पर सब बता दूंगी , बस यही कि वह अपनी जाति का नहीं है "

यह सुनकर उसके पिता का कलेजा तो फटने को हो गया ऊपर से वे हृदय रोगी थे . इकलौती बेटी का इस तरह का निर्णय सुनकर उनके पसीने छूटने लगे . क्या रह जाएगी उनकी जात बिरादरी में इज्जत ? यही कि एक उच्च अधिकारी होने के बावजूद भी अपनी बेटी का विवाह अपनी जाति में नहीं करवा सके . सभी लोग यही ताना मारेंगे ना कि बिरादरी में लड़कों की कमी पड़ गई जो इस तरह की हिमाकत कर रहे हैं .यही सब सोचते- सोचते पिता का चेहरा पीला पड़ने लगा और वह गश खाकर नीचे गिर गए . सबने मिलकर बड़े प्रयास के साथ उन्हें किसी तरह बिस्तर पर आराम करने के लिए लिटाया और रेवती को समझाने लगे .,
" देखो रेवती तुम्हारे पिता एक तो पहले से ही हृदय रोगी है और ऊपर से तुम्हारी जाति के बाहर शादी का निर्णय वह बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे ऐसा ना हो कि उन्हें कुछ हो जाए "

" हर बात आप लोग मेरे सर पर क्यों थोप देते हो . हर गलत बात की मै ही जिम्मेवार क्यों बन जाती हूँ लड़की हूँ इसीलिए ना .............
" जो मेरी किस्मत में लिखा होगा मै सहन कर लूँगी . मुझे वैसे भी सब कुछ सहन करने की आदत पड़ गई है " रेवती ने बड़े ही रूखे स्वर में उत्तर दिया .

रेवती के इस उत्तर ने घरवालों को स्तब्ध कर दिया .और उन्होंने उसे दुष्ट , कुल्टा ना जाने क्या- क्या कहकर संबोधित किया और वहाँ से चले गए

अब रेवती अकेली रह गई थी . उसने अभी तक अपने मन की बात किसी से नहीं कही थी ना ही उसने कोई लड़का देख रखा था .वह एकांत में शांत होकर अपने मन को टटोलने लगी .रह- रह कर उसकी आँखों के सामने उसके बॉस प्रशांत का चेहरा घूमने लगा और उसे उनके कहे शब्द याद आ रहे थे कि "रेवती तुम एक बहादुर लड़की हो, मुझे तुम पर नाज है ".उसका बॉस प्रशांत उससे था तो दो साल ही बड़ा मगर अपनी प्रतिभा के बल पर वह बैंक का मैनेजर बन गया था . गोरा रंग, लम्बा कद, चेहरे पर गाम्भीर्य और होंठों पर सदा मुस्कराहट थिरकती रहती थी .मन ही मन वह अपने बॉस को पसंद करती थी और अब उस हादसे के बाद तो वह उनकी बहुत इज्जत भी करने लगी थी .रेवती जानती थी कि उनके परिवार वाले शुद्द शाकाहारी है और प्रशांत के परिवार में खाने- पीने को लेकर इस तरह की कोई रोक- टोक नहीं थी .अगर वह मान भी गया तो क्या सांस्कृतिक विभेद उनके रिश्ते में दरार पैदा नहीं करेगा .परन्तु वह इतने समय में प्रशांत को काफी जानने लगी थी कि वह बहुत समझदार इंसान है और कभी भी उसे मंझधार में नहीं छोड़ेंगे.

तभी कमरे में चपरासी चाय लेकर आ गया तो प्रशांत ने रेवती को चाय लेने को कहा , " रेवती , चाय लो . अरे ,कहाँ खो गई हो? अपने दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालो सब ठीक हो जाएगा " .
यह कहते- कहते प्रशांत उठकर रेवती के पास आ गया और उसने अपना हाथ रेवती के हाथ पर रख दिया.
" प्रशांत , आपका दिल कितना बड़ा है , सच में आप एक बहुत ही महान इंसान हो. इंसान की पहचान उसके व्यक्तित्व से होती है ना कि जात बिरादरी से "
रेवती के मन में माँ का खौफ , पिता की बिमारी , जात बिरादरी का डर ,इत्यादि विचार उसके मस्तिष्क को कुरेद रहे थे . इस नाजुक समय में उसे लगा कि प्रशांत जैसे कोई मसीहा या कोई देवदूत बनकर उसके जीवन में आ गया हो जिसके लिए वह बरसों से इन्तजार कर रही थी .जिसे वह किसी कीमत पर ठुकराना नहीं चाहती थी. जो बिन कहे उसके मन को समझता था .उसका मन हो रहा था कि वह उसके क़दमों में अपना सर झुका दे और अपने जीवन की बागडोर हमेशा के लिए उसे सौंप दे.

Monday, 21 February 2011

"इक रात की दुल्हन "



"इक रात की दुल्हन "



इक रात की दुल्हन ,राहें हैं मेरी ठहरी- ठहरी
हृदय समुन्द्र सा विशाल,आँखें "झील"सी गहरी,

ना ही मेरा कोई रास्ता, ना ही कोई किनारा
चाहकर बह ना पाऊं बनकर नदी की धारा,

ना ही मेरी कोई मंजिल, ना मुझ तक कोई आए
पुरवई हवाएँ समुन्द्र का पैगाम देकर जाएँ,

मै इक रैन बसेरा, हृदय में किसी के ना डेरे
हुस्न मेरा हर रात को नव छटा बिखेरे ,

हर कोई मेरे रूप सलोने के गुण गाए
चाहत मेरी की गहराई का कोई पार ना पाए

अनेकों सैलानी हर दिन आके मन अपना बहलाए
जल मेरा फिर भी किसी की प्यास बुझा ना पाए,

काली खुश्क रातों में जिस्म वीरानों में भटकता
पलकों से मेरी जलते घावों का लहू टपकता,

मेरे दिल का हर टुकड़ा दर्द की इक दास्ताँ
तूफानों में घिरा है मेरे भू-स्थल का गुलिस्ताँ ,

रूह मेरी क़यामत की उस रात को तरस जाए
जब मन मंदिर के देवता मेरा हर आंसू अपनाए,

सदियों से बैठी हूँ बनकर श्वास- हीन धारा
इक रात की दुल्हन,मन आस्मां सा ठहरा..



Sunday, 6 February 2011

राम की अग्नि-परीक्षा


राम अपने क्वार्टर में उदास बैठा था . वह हाथ पर हाथ धरे सोच रहा था कि नंदिता न जाने पड़ोसन अंजु की बातों का क्या मतलब लगा रही होगी . आज तो अंजु ने उस पर कहर-सा ही ढाह दिया था . राम की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर किस हक़ से और क्यों अंजु ने मजाक- मजाक में इतनी बड़ी बात कह दी ? .
नंदिता को सामान्य करने के लिए राम ने अपनी ओर से काफी प्रयास किया, परन्तु उसका चिंतित होना स्वाभाविक सी बात थी .उसकी जगह कोई भी अन्य औरत होती उसे बुरा तो लगता ही . बेशक नंदिता ने उससे कोई सवाल नहीं किया था पर उसकी खामोशी से वह बेहद डर गया कि कहीं यह किसी आने वाले तूफ़ान से पहले का सन्नाटा तो नहीं ? और राम और नंदिता का रिश्ता तो अभी बिल्कुल नया था . अभी एक महीना ही तो बीता था दोनों को विवाह बंधन में बंधे हुए . अभी तो वे एक दूसरे को ठीक से जानते भी नहीं थे , एक दूसरे के स्वभाव के बारे में ,पसंद ना पसंद के बारे में कुछ भी तो नहीं जानते थे . उनका रिश्ता अभी बिल्कुल कच्ची डोर से बंधा था .

राम के मन में ना चाहते हुए भी अंजु के बचकाने बर्ताव के कारण उनके लिए अजीब-सी कडवाहट भर गई थी . एक चलचित्र की भांति उसके मन पटल पर पुरानी सारी बातें घूमने लगी .

जब एक दिन विमल ने, जो कि उसके बड़े भाई की तरह थे, खुद ही कितने हक़ से उससे कहा था,
" राम , तुम यहाँ अकेले रहते हो इसलिए जब भी तुम्हे कोई परेशानी हो या किसी चीज की जरूरत हो तो हमारे पास बेझिझक आ जाया करो. हम लोगों को पराया मत समझना , हम लोग तुम्हारे बड़े भाई -भाभी की तरह ही तो है . तुम इतने होनहार और होशियार हो, बंटी और बबली की भी इस बहाने पढ़ाई में मदद कर इनका मार्ग-दर्शन कर दिया करना तो हमे अच्छा लगेगा "

राम कुछ हिचकिचाते, औपचारिकता वश बोला ,
" भाई साहिब, मै तो अपने गाँव से इतनी दूर किसी को अच्छे से जानता नहीं था आप लोगों के साथ के कारण ही तो मेरे जैसे शाकाहारी आदमी के लिए घर से बाहर आकर रहना संभव हो पाया है , मै आप लोगों के अहसानों का बदला किस तरह चुका पाऊंगा "
.
राम भी अपनी नौकरी वाली नई- नई अजनबी जगह पर विमल के परिवार का साथ पाकर बहुत खुश था .

विमल के घर के सभी सदस्य भी राम से काफी घुल मिल गए थे , " हाँ राम , हम भी तुम्हारे जैसे अच्छे पड़ोसी को पाकर खुद को बहुत भाग्य शाली समझते हैं . . असली समय में तो पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है .बाकी रिश्तेदार तो दूर ही होते हैं हम चाह कर भी उन लोगों से मिल नहीं सकते ".
.

राम की शादी के समय भी विमल ने काफी मदद की थी , उसने उनसे बीस हजार रुपये भी उधार लिए थे जिन पैसों से उसने स्कूटर और घर का जरुरी फर्नीचर भी खरीदा था .कभी- कभी वह अपनी ड्यूटी से वापिस आने पर विमल के यहाँ ही खाना खा लेता था . हर दिन त्यौहार पर जैसे कि दीवाली , होली या किसी का जन्म दिन वगैरा होता था तो दोनों पति- पत्नी राम को जरुर खाने के लिए आमंत्रित करते थे .राम और विमल के परिवार के बीच में काफी अन्तरंग सम्बन्ध बन गए थे . इधर राम की भी हर पल यही कोशिश होती कि विमल की मदद का कोई भी मौका चुके नहीं चाहे उनके बच्चों की पढ़ाई का मामला हो या विमल के गिरते स्वास्थ्य के प्रति ध्यान देने की बात हो .एक बार जब विमल की तबीयत काफी खराब हो गई और उस दिन मूसला धार बारिश हो रही थी तब राम स्कूटर पर जाकर डाक्टर को घर से बुला कर लाया था .

एक बार तो सुबह- सुबह विमल को अस्थमा का जोरदार दौरा पड़ा और वह खांसते- खांसते जब फर्श पर गिर गए थे और सिर पर चोट लगने से अचेत हो गए थे तब राम अपने मैनेजर से कार माँग कर लाया था और विमल को अस्पताल में भर्ती करवाया था .इस पर अंजु ने अपनी कृतज्ञता जताते हुए कहा था ,
" राम तुम तो हमारे लिए हमेशा ही एक देवदूत बन कर आते हो . आज अगर तुम ना होते तो पता नहीं क्या अनर्थ हो जाता , विमल जी को नया जीवन दान देकर तुमने हमारे पर बहुत उपकार किया है ." यह कहते ही वह इतना भावुक हो गई कि उनकी आँखों से आंसू बहने लगे .

राम ने अंजु को सांत्वना देते हुए कहा , " कैसी बातें करती है भाभी जी , यह तो मेरा फर्ज था , आपने और भाई साहिब ने जो मेरे लिए किया है वह मै जीवन भर भुला नहीं सकता .आप लोगों के कारण ही तो मेरा इस अजनबी जगह पर अकेले रहना संभव हो पाया है वरना मै अकेला घर से इतनी दूर कैसे रह पाता और अपनी नौकरी छोड़ कर कब का भाग गया होता '

राम की भावुकता भरी बातें सुनकर अंजु ने रोना बंध कर दिया .रसोई में जाकर वह राम के लिए खाने के वास्ते पता नहीं क्या- क्या ले आई और राम को कहने लगी ,
" खाओ, राम कब से अस्पताल के चक्कर काट रहे हो , अपने मुँह से तो तुम कुछ कहोगे नहीं ? क्या भूख नहीं लग रही तुम्हे '

ये सारी बातें राम के मानस-पटल से एक-एक करके होकर गुजर रही थी .वो सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर उन्होंने क्या सोचकर इतनी बड़ी बात उसकी नई नवेली पत्नी के सामने कह दी.शुरू शुरू में जब राम अपनी शादी के बाद नंदिता को पहली बार अपने क्वार्टर लाया था तब उसकी माता जी भी उनकी नई नई गृहस्थी जमाने के वास्ते गाँव से उनके साथ आ गई थी. जब मंजू भाभी उसकी माँ से मिलने उनके घर आई तो राम पर अपना अधिकार जताते हुए उन्होंने कहा था , " मांजी, मै भी आपकी एक बहू ही तो हूँ . राम मेरे सगे देवरों से भी बढकर है और वह भी तो मुझे अपनी सगी भाभियों से ज्यादा मानता है . "

उसकी माँ तो इन बातों को आशय समझ नहीं पाई, पर नंदिता को उनकी कही बातें चुभने लगी . नंदिता के मन में उनके प्रति नफरत-सी होने लगी .एक बार तो उन्होंने बातों- बातों में नंदिता को यहाँ तक कह दिया , " नंदिता ,राम तो मेरी चूड़ियों तक से खेल लेता था कभी- कभी .............."

यह कह कर वह तो चुप हो गई पर नंदिता का चेहरा फक सफ़ेद पड़ गया और एक तूफ़ान उसके मन में उठने लगा . उसकी समझ में नहीं आया कि सीधी-सादी दिखने वाली भाभी का ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है कहीं शादी से पहले दोनों में प्रेम तो नहीं था ? नहीं, राम के बारे में वह ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता . नंदिता को राम पर पूरा भरोसा था पर राम का उनके परिवार के प्रति झुकाव से उसके मन में संदेह घर करने लगा . भले ही, राम को वह सीधे- सीधे कुछ नहीं कहती थी पर कोई भी मौका कुछ भी कहने का मिलता तो वह चूकती नहीं थी .

एक बार उनके आफ़िस की एक पार्टी थी जिसमे सब परिवार समेत आते थे इसलिए नंदिता वहाँ जाने के लिए तैयार हो रही थी और अपने गाँव की पारम्परिक वेशभूषा में वह बहुत खूबसूरत दिखाई दे रही थी पर उसने अपनी माँग में सिन्दूर नहीं भरा था यह देखकर मिसेज श्यामलाल ने उसे टोका था इस पर नंदिता से रहा नहीं गया ,
" तुम्हारी भाभी, क्या मेरी सास लगती है जो बात-बात पर मुझे टोकती रहती है .अभी तक उनके बड़े होने का लिहाज कर रही थी अगर अगली बार उन्होंने ऐसा कुछ कहा तो मै चुप नहीं रहूंगी और कुछ उल्टा सीधा सुन लेगी वह मेरे से तब न कहना ............"

इतनी उग्र बात उसके मुँह से सुनकर राम को बहुत अचरज हुआ और राम ने उसे शांत होने को कहा और उसे प्यार पूर्वक समझाया तब जाकर उसका गुस्सा एक बार तो शांत हो गया पर अगली बार फिर मौका मिलने पर वह राम पर कटाक्ष करने से नही चुकी ,
" राम कई बार मै पहले भी महसूस कर चुकी हूँ तुम अंजु भाभी के गलत होने पर भी हर बार उसी का पक्ष लेते हो तो उसी के साथ घर क्यों नहीं बसा लेते? "

राम ने इतनी कड़वाहट भरी बातें किसी के मुख से पहली बार सुनी थी . उसको मन ही मन नंदिता पर बहुत गुस्सा आ रहा था फिर भी उसने अपने आप पर काबू रखकर नंदिता के मन में से वहम दूर करने का भरसक प्रयास किया ,
" नंदिता , तुम व्यर्थ ही मुझे गलत समझ रही हो . भाभीजी एक धर्मपरायण औरत है और मुझसे उम्र में भी कितनी बड़ी है .मै जब यहाँ अकेला था तो उनका मेरे से कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया था बस अपनी आत्मीयता दिखाने के लिए उन्होंने अनजाने में ऐसी बात कह दी थी ."

फिर उसने चूड़ी वाला पूरा किस्सा नंदिता को सुनाया .
कि जब राम ने अपना रिश्ता पक्का होने की खुशखबरी अंजु भाभी को सुनाई थी तो कुछ और पूछने से पहले पुरानी औरतों की तरह सबसे पहला सवाल उनका यही था ,
" राम , अपनी होने वाली दुल्हन को कितना गहना चढ़ा रहे हो "

एक बार तो राम चुप सा हो गया फिर परेशान सा होते हुए ,
" भाभी जी , आपको तो पता है कि अभी कुछ समय पहले ही तो मेरी नौकरी लगी है , जितनी हैसियत होगी उतना समय पर देखेंगे बाकी घर वालों से बात करने पर पता चलेगा . "

अंजु भाभी अपनी आदत से मजबूर चुप कैसे रह सकती थी ,
" भई, हमारे यहाँ तो शादी- ब्याह में सबसे जरूरी कपड़ा - गहना ही होता है . मेरी शादी में विमल जी के घर वालों ने पूरे पचास तोले सोना चडाया था और इतना ही मेरे मायके से था . इतना ही नहीं हर साल विवाह की वर्षगाँठ पर श्यामलाल जी मुझे कोई ना कोई सोने का गहना ही तोहफे में देते हैं '

"भाभी जी आपका समय सस्ता समय था आज कल इतनी महंगाई में शादी- ब्याह में और भी इतने खर्चे हो जाते है जितना जरुरी होगा समय पर देखेंगे. "

" अरे बाकी खर्चे वरचे तो होते रहते हैं पर लड़की के वास्ते तो हमेशा की जमा पूँजी उसका गहना- कपड़ा ही होता है "


राम अंजु भाभी की बहुत इज्जत करता था क्योंकि उन्होंने उसकी काफी मदद की थी इसलिए उसे जब कुछ ना सूझा तो वह बोला ,
" भाभी जी, आपने जो चूड़ियाँ पहन रखी है वो सोने की ही है ना , जरा मुझे उतार कर दिखाएँ तो , अगर ऐसी ही चूड़ियाँ मै नंदिता के लिए बनवाऊं तो कितने तक बन जाएँगी "


किन्तु राम के इतना सब कुछ समझाने पर भी नंदिता का गुस्सा शांत नहीं हुआ और तपाक से फिर गुस्से में बोली ,
" अगर मै इसका गलत अर्थ समझ रही हूँ तो अगर तुममे है हिम्मत तो जाकर खुद ही उनसे सही अर्थ पूछ आओ, डरना किस बात का जब हाथ कंगन को आरसी क्या ? '

एक बार तो राम का भी मन हुआ कि भाभी जी से जाकर उनके कहने का भावार्थ पूछे पर दूसरे ही क्षण उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा .उसे रह- रह कर उनके अहसान याद आ रहे थे और वह एक बेसिरपैर की बात के कारण बेवजह कैसे उन पर कीचड उछाल सकता था . वह शून्य की ओर ताकने लगा .मन ही मन वह अपने हृदय को टटोल भी रहा था ,उसने तो ऐसा कोई गुनाह नहीं किया है जिसकी वजह से उसकी आत्मा कलूषित हो . मगर चूड़ियों के साथ खेलना ... चूड़ियों के साथ खेलना जैसे भारी भरकम शब्द उसके सीने को बड़े पत्थर की तरह दबा रहे थे .उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि चूड़ियों से खेलनी वाली बात को लेकर जो शक नंदिता के मन में घर कर गया उसे वह सीता की तरह अग्नि परीक्षा देकर भी पार नहीं कर पाता . नंदिता उसके एक पवित्र गुनाह की वजह से उसकी अग्नि परीक्षा लेने पर तुली है .और वह सोचने लगा , कितना अच्छा हो ,धरती फट जाए और वह उसके गर्त में समा जाए . उसे लग रहा था कि क्या चिता पर धधकती आग में समा कर राम को अपने पतित्व का परिचय देना हैं ?

.

Wednesday, 12 January 2011


मरुभूमि


मैं बंझर रेगिस्तान की धरती
गर्भ में मेरे सूरज की गर्मी
भीतर अनगिनत बीज है लहुलुहान

मीलों तक छाई है खामोशी
तपती धूप में छाया को तरसी

मेघ टूट कर ना मुझ पर पर बरसे
नदी, नाले, खेत सब छूटे हैं पीछे
कई मुसाफिर रास्ते से हैं भटके
हृदय पर मेरे बिछे हैं कांटे
कीट पतंगे डेरा लगाए हैं बैठे

मुझे बाँझ ना पुकारो !

कई मौसम मुझसे होकर गुजर गए
ना कोई सावन मन को बहलाए
ना ही तूफानों का डर सताए

चांदनी रातों में ना पल भर को रोई
अँधेरी रातों में भी ना जी भर कर सोई

ओह मेघ
कब आओगे ?

कब मेरी प्यास बुझाओगे?
कब हरियाली बरसाओगे ?

कब से आसमान की ओर
गड़ाए बैठी हूँ नजरें

कब से अखियाँ तरस रही
बिन नमी के ही बरस रही

ओह मेघ

कब प्रेम की नदिया बहाओगे ?
कब स्नेह के फूल खिलाओगे ?
कब मेरी ममता का मौल चुकाओगे ?



मुझ से यूँ मुँह ना मोड़ो
मेरे सूने दिल को यूँ ना तोड़ो
मेरा हृदय कब से विरानो
में भटक रहा है
कब से तुम्हारे स्नेहिल
स्पर्श को तरस रहा है !




सीने में मेरे भी है अमृत की नर्मी
हृदय में है प्यार का बीज स्फूटित
वक्ष में मेरे भी है दूध की चर्भी
आँचल में है ममता की धूप खिली

मै बाँझ नहीं, मै माँ हूँ !
मै बाँझ नहीं, मै माँ हूँ !

Saturday, 1 January 2011

लाक्षागृह




दुष्यंत के पिताजी ने जैसे ही काल बेल बजाई तो सामने सरला खड़ी थी . सरला से दुष्यंत के पिताजी का खून का कोई रिश्ता नहीं था ,मगर एक ही जाति और गोत्र के थे ,इसलिए वे परस्पर एक दूसरे को भाई-बहिन ही मानते थे .हास्टल में सारा सामान रखकर दुष्यंत अपने पिताजी के साथ रिक्शा में बैठकर चिठ्ठी वाले पते पर पहुँच गया . सरला के परिवार को यहाँ पर आए चार साल हो गए थे. एक क्षण को तो सरला चुपचाप खड़ी देखती रही फिर गौर से देखने पर पहचानते हुए इतनी खुश हुई कि दुष्यंत के पिताजी जी के गले लग गई. वे पिताजी को अपने सगे भाई की तरह मानती थी. दोनों की आँखों में ख़ुशी के आंसू छलकने लगे.दुष्यंत भी सरला को अपनी सगी बुआ की तरह ही मानता था . कुशल क्षेम पूछने के बाद सरला कहने लगी ,
" भाई साहब ,इतने बरसों के बाद आज इस तरफ का रुख कैसे कर लिया ? "

दुष्यंत के पिता जी कहने लगे ," दुष्यंत का एडमीशन यहाँ के डी. ए. वी. कालेज में हो गया है , इसलिए इसे छोड़ने आया था . हास्टल में सामान रखकर बस सीधे यहीं आ रहे हैं .इतने बड़े शहर में इसे भेजने पर तुम्हारी भाभी का तो रो- रोकर बुरा हाल था . उसने ही तुम्हारा पता ढूँढ कर दिया . "

"अरे भाई साहब, आप दुष्यंत की बिल्कुल चिंता ना करे. मेरा क्या ये कुछ नहीं लगता . इसे अपनी गोद में खिलाया है मैंने. हास्टल में क्यों ? ये यहाँ हमारे पास ही रहेगा "

"नहीं, नहीं , कालेज के अन्दर ही हास्टल है इसलिए इसे पढाई में कोई दिक्कत नहीं आएगी . बाकी जब इसका मन हुआ करेगा तो ये आ जाया करेगा आप लोगों के पास. पहले पहल जब तुम्हारी चिठ्ठी आया करती थी तो कई बार मन हुआ करता था तुम लोगों से मिलने का मगर ऐसा कोई मौक़ा ही नहीं मिला ,
अब जब दुष्यंत खुद यहाँ पढ़ने आ गया है , तो .... "


जैसे ही सरला की चिठ्ठी मिली थी तो सबके मुरझाए चेहरे खिल उठे थे . जबसे दुष्यंत का एडमीशन चंडीगढ़ के सबसे बड़े कालेज में हुआ था तबसे सबके दिलों में अजीब-सी घबराहट हो रही थी . उसकी माँ तो बार- बार यही कह रही थी ,
" कैसे रहेगा मेरा बेटा इतने बड़े शहर में, जहाँ ना कोई जान है ना कोई पहचान है "

दुष्यंत के पिताजी माँ को हौंसला देते हुए बोले ,
" अरे ! उसने अकेले शहर में थोड़ा रहना है हास्टल में रहेगा ,जहाँ इतने बच्चे और भी तो होंगे, पता नहीं कितनी दूर- दूर से बच्चे आते है उस कालेज में पढ़ने के लिए .हम तो बहुत भाग्यवान हैं जो हमारा लाडला वहाँ पढ़कर खानदान का नाम रोशन करेगा, लोग तो तरसते हैं वहाँ पढ़ने के लिए "

सब अपनी- अपनी बातें कर रहे थे परन्तु किसी को ये ध्यान ही नहीं था कि दुष्यंत के मन पर क्या बीत रही है . उसके मन में भी तरह- तरह के विचारों की उथल पुथल चली हुई थी. वह इतने बरसों में कभी भी तो अपनी माँ के बगैर रहा नहीं था . रात के समय तो अब भी उसे अकेले सोने में डर लगता था और माँ की मौजूदगी उसे बहुत तसल्ली देती थी . पर उसे ना चाह कर भी पढ़ाई के वास्ते जाना तो पड़ना ही था .

तभी दुष्यंत के बड़े भैया को याद आया कि उनके पुराने पड़ोसी भी तो आजकल चंडीगढ़ में ही तो रह रहे थे. फिर माँ को याद आया कि शुरू- शुरू में उनकी चिठ्ठी कई बार आती थी . फिर काफी देर ढूँढने के बाद माँ को उनकी चिठ्ठी मिल गई .

दुष्यंत की माँ वह चिठ्ठी उसके पिताजी को दिखाते हुए कहने लगी ,
" सरला दीदी के परिवार को कितने साल हो गए यहाँ से गए हुए अब तो उनकी कोई चिठ्ठी भी नई आई काफी समय से . पता नहीं वे लोग पहचानेंगे भी या नहीं ! "

सरला के दो बेटे थे . वे लोग जब दुष्यंत के पड़ोस में रहते थे तब दोनों परिवारों का एक जगह उठना बैठना था . फिर जब उनके बड़े बेटे मुकेश की नौकरी चंडीगढ़ के एक बैंक में लग गई तो वे लोग वहाँ से चले गए थे. शुरू- शुरू में बातचीत होती रही फिर दूर होने के कारण मेल-जोल कम होता गया.उसके पिताजी ने उसकी माँ को वह चिट्ठियाँ संभाल कर रखने की हिदायत दी जिनके मिलने पर सबके चेहरे ख़ास करके दुष्यंत का मुरझाया चेहरा खिल उठा था .

फिर वह दिन भी आ गया जब दुष्यंत अपने पिताजी के साथ बस में बैठकर अपने सारे सामान के साथ चंडीगढ़ की तरफ रवाना हो गया . उसकी माँ का तो रो- रोकर बुरा हाल था . पहली बार जो अपने जिगर के टुकड़े को अपने से अलग कर रही थी. यही सारी बातें सोचते- सोचते पिताजी किसी दूसरी दुनिया में खो गए थे . अचानक सरला ने उनका ध्यान भंग किया .

सरला ने अपनी बहू को चाय नाश्ते के लिए आवाज लगाई. सामने उनके बड़े बेटे मुकेश की पत्नी खड़ी थी. मुकेश और दुष्यंत हम उम्र ही थे. इस तरह उसका परिचय शिवानी भाभी से हुआ. बस तबसे जब भी कोई दिन त्यौहार होता तो सरला शिवानी भाभी से फोन करवा कर उसे बुलवा लेती . शिवानी भाभी भी स्वभाव की बहुत ही नेक दिल औरत थी. वह दुष्यंत को सगे देवर से भी जयादा स्नेह करती थी. इस तरह एक अजनबी शहर में दुष्यंत को अपनों का एक आशियाना मिल गया था . जब भी किसी मुश्किल में होता तो वह शिवानी भाभी से सलाह मशवरा करता . एक बार जब दुष्यंत बहुत बीमार हो गया और अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा तो शिवानी भाभी ने उसकी खूब सेवा की थी . इस तरह दुष्यंत उस परिवार का हमेशा के लिए कर्जदार हो गया था. उनके अपनेपन में उसकी पढाई के पाँच वर्ष कैसे बीत गए उसे पता ही नहीं चला .

कालेज पूरा होते ही दुष्यंत के अच्छे अंकों के कारण लन्दन की एक कंपनी में उसे नौकरी मिल गई . पर वहाँ जाकर भी वह उस परिवार के स्नेह को भुला नहीं पाया . और वह कभी फोन से ,तो कभी पत्र द्वारा उनसे संपर्क में रहता . जवाब में शिवानी भाभी भी चिठ्ठी जरुर लिखती. जब दुष्यंत को लन्दन गए दो वर्ष बीत गए तो सरला बुआ को उसकी शादी की चिंता होने लगी. उन्होंने शिवानी भाभी से चिठ्ठी लिखकर दुष्यंत की जन्मपत्री मंगवाने को कहा .


कुछ समय बाद दुष्यंत के लिए श्वेता का रिश्ता आ गया , उसके चाचा जी उसी कालेज के वाइस प्रिंसिपल थे . दुष्यंत खुद को बहुत खुश किस्मत समझने लगा .इतने बड़े घर की और पढी- लिखी लड़की पाकर वह बहुत खुश था .वह कभी पत्र द्वारा तो कभी लम्बी-लम्बी कविताएँ लिखकर श्वेता से अपने प्रेम का इजहार करता और अपने आने वाली जिन्दगी के रंगीन सपनें बुनता . श्वेता भी दुष्यंत जैसे होनहार और सीधे - सादे लड़के को पाकर बहुत खुश थी .

आखिर दोनों विवाह बंधन में बंध गए. श्वेता बड़े शहर में पली बड़ी थी इसलिए उसे दुष्यंत के घर का माहौल और पहनावा कतई पसन्द नहीं आया . पर वह ये जानती थी कि कुछ दिनों बाद ही तो उन्हें लन्दन चले जाना है . विवाह से पहले ही उसके लन्दन जाने का सारा बंदोबस्त दुष्यंत ने कर लिया था क्योंकि इतनी दूर से बार- बार आना- जाना कहाँ संभव था .

मगर जैसे ही हवाई जहाज ने जमीन पर लैंड किया वैसे ही दुष्यंत के मन ने अतीत की यादों से वर्तमान के धरातल पर लैंड किया .

जब से श्वेता से उसकी शादी हुई थी दुष्यंत तीन वर्षों में अपने घर इंडिया एक बार भी नहीं आ पाया था. इस बार दीवाली पर उसका मन था कि वह इत्मीनान से अपने माता- पिता और भाई- बहन के पास रहे. उसका मन था कि इस बार सब साथ में मिल कर दीवाली मनाए .वह चाहता था कि श्वेता भी उसके घर के संस्कारों को समझे और अपनाए तांकि भावी पीढी में भी उसके खानदान के संस्कार आ सके.

दीवाली से एक दिन पहले वह चड़ीगढ़ जाकर अपने जानने वाले सब दोस्तों और रिश्तेदारों को मिलना चाहता था. श्वेता का मायका भी तो चंडीगढ़ में ही था. उसका मन था कि श्वेता भी सबको मिले . वह सरला के परिवार के सब लोगों के लिए तोहफे खरीद कर साथ लाया था . इतने बरसों में वह एक पल को भी तो सबकी आत्मीयता को भुला नहीं पाया था .


दुष्यंत ने काल बेल बजाई तो सामने शिवानी भाभी खड़ी थी . शिवानी भाभी ने कई बार पत्र लिखकर दुष्यंत को श्वेता को मिलने की इच्छा जाहिर की थी. जब दुष्यंत ने श्वेता को वहाँ जाने के लिए कहा था तो श्वेता कहने लगी ,
" तुम अकेले ही चले जाओ ना . मै कुछ दिन अपने माता- पिता के पास भी रह लूँ . मेरी उनसे थोड़ा कोई जान पहचान है . "

जब दुष्यंत ने काफी जिद की तब जाकर वह वहाँ जाने के लिए मानी. वहाँ जाकर शिवानी भाभी और सरला बुआ का दुष्यंत के प्रति प्यार दिखाना उसे कतई पसन्द नहीं आया . जब शिवानी भाभी श्वेता को उपहार देने लगी तो श्वेता ने इनकार कर दिया . एक बार तो श्वेता के ऐसे रवैये से दुष्यंत को बहुत बुरा लगा पर उसने बात को संभालते हुए श्वेता की तरफ से स्वयं हामी भर कर उनका दिया तोहफा अपने पास रख लिया .

वापिस आते समय श्वेता से रहा नहीं गया और दुष्यंत को कहने लगी,
" देवर- भाभी का कुछ ज्यादा ही प्यार दिखाई दे रहा था . मेरे सामने ये सब कुछ चल रहा था, तो पता नहीं शादी से पहले... "

दुष्यंत उसकी शूल भरी बातें सुनकर चुप रहता क्योंकि उसे पता था कि श्वेता अपने मायके जाकर बात का बतंगड़ बनाए बिना नहीं रहेगी. शुरू से ही उसे हर छोटी से छोटी बात अपनी माँ को बताने की आदत थी. वह दुष्यंत के सामने भी उसे और उसके घर वालों को बुरा भला कहने की कसर ना छोडती कि इन लोगों ने झूठ बोलकर उसकी शादी दुष्यंत से करवा दी है .

जो साड़ी शिवानी भाभी ने श्वेता को दी थी उसे दिखाते हुए उसने जान बूझ कर अपनी माँ से कहा ,
" मम्मी, ये साड़ी इनकी प्यारी भाभी ने दी है इतने पुराने जमाने की साड़ी मेरे पहनने लायक कहाँ है, इसलिए वो जो आपकी काम वाली आती है उसे मेरी तरफ से दे देना "

ठीक इसी प्रकार ,दुष्यंत की बहुत इच्छा थी कि वह श्वेता के साथ एक बार अनुराग की माँ और बहन से मिलकर आए. अनुराग उसके कालेज का सबसे अच्छा दोस्त था जो हर छुट्टी वाले दिन अनुराग को अपने घर ले जाता था . कितनी ही बार उसने उसकी माँ और बहन के हाथ का बना खाना खाया था . जब भी वह हास्टल के खाने से उकता जाता तो अनुराग उसे जबरदस्ती अपने घर ले जाता था. जब उसकी नौकरी लन्दन लग गई थी उसके एक साल बाद अनुराग का कैंसर के कारण देहांत हो गया था. उसकी माँ उसे अपने बेटे की तरह ही मानती थी और दुष्यंत को देखकर उसकी माँ के आंसू थमते ही नहीं थे. तबसे अनुराग की बहन सीमा भी उसे अपने भाई की तरह मानने लगी और हर साल उसे राखी जरुर भेजती . इस बार दुष्यंत काफी समय बाद अपने देश लौटा था इसलिए वह अनुराग की माँ और बहन को भी अपनी तरफ से कुछ देना चाहता था . पर दुष्यंत की हिम्मत नहीं हुई कि वह श्वेता को अनुराग की माँ से मिलने के लिए कहे इसलिए वह दुखी मन से अकेले ही चला गया उनसे मिलने क्योंकि इतनी दूर आकर वह उनसे मिले बगैर नहीं जा सकता था फिर पता नहीं कब दोबारा इंडिया आने का प्रोग्राम बने .वह अपने चारों तरफ दुखों की दुनिया का निर्माण कर रहा था .

दुष्यंत के भोलेपन तथा उसके परिजनों ,दोस्तों से मिलने की उत्सुकता को देखकर कटाक्ष करते हुए श्वेता अक्सर कहा करती थी , " तुम चाहे लाख दुनिया के किसी भी अच्छे से अच्छे शहर में रह लो पर रहोगे देहाती ही . आजकल की दुनिया में ये खोखले रिश्ते नाते क्या मायने रखते है ?"


ये सब सुनकर दुष्यंत को बहुत बुरा लगता और मन ही मन वह श्वेता से दूर होने लगा . जो सपने उसने अपनी विवाहित जिन्दगी और अपने जीवन साथी के देखे थे वे एक- एक करके धाराशाई होने लगे. दुष्यंत को श्वेता के शक्की और संकीर्ण व्यवहार से बहुत दुःख पहुँचता और मन ही मन गुस्सा भी आता . वह अपने बीते समय और रिश्ते नातों को कैसे भूल सकता था .इस बात की गवाही उसका मन ,उसकी आत्मा कभी नहीं देती थी.एक बार जब दुष्यंत की माँ ने दुष्यंत की किसी काम को लेकर तरफदारी की थी ,तो श्वेता ने जहर खाकर मर जाने की धमकी दी थी ,तबसे माँ ने फिर कभी उसके मामलों में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा .

दीवाली वाले दिन दुष्यंत के गाँव में उनके सब रिश्तेदार श्वेता को मिलने आने वाले थे क्योंकि पहली बार तो वह शादी के बाद ससुराल आई थी इसलिए दुष्यंत की माँ चाहती थी कि श्वेता उनकी पारम्परिक वेशभूषा घागरा- चोली में तैयार हो . उन्होंने बड़े चाव से उसके लिए ख़ास तौर पर नया परिधान बनवा कर रखा था . परन्तु श्वेता ने आदत से मजबूर उसकी माँ की बात को मानने से इनकार कर दिया यह कहते हुए ,
" दुष्यंत, तुम्हे पता है मैंने ऐसे कपड़े जीवन में कभी नहीं पहने है ,ना ऐसे कपड़े पहन कर मुझे जोकर बनने का शौंक है जिसमे गाँव की गंवार औरतें अपने जिस्म की नुमायश करती हैं "

सब लोग श्वेता के मुँह की तरफ देखते रह गए . जब सबने उसे मनाने की कौशिश की तो वह गुस्से में आग बबूला होते हुए कमरे में चली गई और अन्दर से कमरा बंद कर लिया यह कहते हुए ,
" दुष्यंत , मुझे तुम्हारे किसी गंवार रिश्तेदार से मिलने जुलने का कोई शौंक नहीं है .अच्छा होता, अगर तुम मुझे वहीँ चंडीगढ़ मेरे माता- पिता के पास ही छोड़ आते तो कम से कम यहाँ की व्यर्थ की परम्पराओं से तो बच जाती" .

उस दिन घर का माहौल त्यौहार वाले दिन भी श्वेता के बचकाने और अड़ियल व्यवहार के कारण इतना ग़मगीन हो गया कि दुष्यंत की दीवाली को लेकर सारी इच्छाएं धरी की धरी रह गई .

दुष्यंत का मन बहुत ही भारी- भारी हो रहा था और उससे रहा नहीं गया और अगले दिन अकेले में वह अपने पिता के सामने अपने मन की सारी व्यथा कह बैठा ,
" पिताजी अब मै और जीना नहीं चाहता मै अपने वैवाहिक जीवन से बहुत तंग आ गया हूँ इसलिए मै मरना चाहता हूँ "

दुष्यंत सब भाई -बहनों में से शुरू से ही सबसे ज्यादा भोला- भाला था इसलिए उसकी इतनी दयनीय हालत उसके पिता से बर्दाश्त नहीं हुई और दीवाली के कुछ दिनों बाद ही उसके पिता जी सदमे के कारण स्वर्ग सिधार गए. दुष्यंत का मन खून के आंसू रोता रहता पर वह किसी से भी कुछ नहीं कह पाता .उसे हर पल लगने लगा कि जैसे उसकी वजह से ही उसके पिताजी इस दुनिया से चले गए हैं .वह अपने पिता को न केवल अपना गुरु बल्कि एक अच्छा दोस्त भी समझता था . आज वह अपने आप को उस चौराहे पर अकेला पा रहा था ,जिस चौराहे पर कभी उसके पिताजी ने उसकी उंगलियाँ थामी थी . वह अपने भीतर ही भीतर घुटता जा रहा था .इसी तनाव से आक्रांत होकर एक दिन उसने श्वेता को कहा ,
" श्वेता जिस तरह से तुम सबके साथ दुर्व्यवहार करती हो और माता- पिता का दिल दुखाती हो तो कहीं उनकी हाय लगने से तुम माँ बनने से वंचित रह जाओ . क्योंकि माँ बनना ही एक औरत के लिए सबसे सुखदायी पल होता है , "

बस इतनी बात क्या सुनी कि वह तमतमाकर बोलने लगी ,
" अच्छा अगर मैं बाँझ रह गई तो तुम किसी और से शादी कर लेना ,तुम्हारे मन की भड़ास भी पूरी हो जाएगी .तुमने मुझे सबसे बड़ी गाली दी हैं बाँझ कहकर जो कि मै जीवन भर नहीं भुला पाउंगी "

इधर-उधर के विचारों की उधेड़बुन की तंद्रा दरवाजे पर काल बेल बजने की आवाज के साथ समाप्त हुई ,उसने देखा सामने पोस्टमेन चिठ्ठी लेकर खड़ा था . दुष्यंत ने देखा तो वह शिवानी भाभी की चिठ्ठी थी. उन्हें इंडिया से वापिस आए अभी कुछ दिन ही बीते थे. दुष्यंत को वह दिन याद आ गया जब जैसे ही शिवानी भाभी की चिठ्ठी श्वेता के हाथ लगी थी वैसे ही उसने सारे घर में कोहराम मचा दिया था .

दुष्यंत के विवाह को अभी कुछ महीने ही बीते थे. नई- नई नौकरी थी इसलिए लन्दन जैसे इतने बड़े शहर में घर बसाना कोई आसान बात तो थी नहीं . इसलिए विवाह के बाद जब श्वेता लन्दन आई तो वह दुष्यंत का रहन- सहन देख कर परेशान हो गई . उसने जो बाहर के मुल्कों के हसीन सपने देख रखे थे वैसा उसे कुछ भी नजर नहीं आया . वह चाहती थी कि उसे घर में हर ऐशो- आराम की चीज उपलब्ध हो . दुष्यंत ने प्यार से श्वेता को समझाया भी था ,
" श्वेता अभी मुझे नौकरी करते हुए ज्यादा समय नहीं बीता है और फिर लन्दन जैसे शहर में गृहस्थी जमाना कोई आसान काम है क्या ?. जो पैसा मैंने दो बरसों में जोड़ा था वो हमारी शादी में खर्च हो गया . "

इस पर तो श्वेता और भी भड़क गई और कहने लगी ,
" तो क्या तुम्हारे माँ- बाप कंगाल थे जो तुम्हारे पैसो से तुम्हारी शादी की ! मुझे कुछ नहीं सुनना तुम्हे शादी से पहले ये सब सोचना चाहिए था कि एक लड़की को घर में हर चीज चाहिए होती है यहाँ तक कि तुम्हारे पास तो रसोई-घर का भी पूरा सामान तक नहीं है फिर कार जैसी चीजों की बात ही छोड़ो ?एक मंगलसूत्र की ख़ाक उम्मीद करनी तुमसे जो एक अच्छी साड़ी तक नहीं दिला सकते हो ! "

" श्वेता मेरे माता- पिता के पास जो भी पैसा था वो उन्होंने मेरी पढ़ाई लिखाई पर खर्च कर दिया था "

इस पर भी श्वेता चुप नहीं हुई और जब भी मौका मिलता वह दुष्यंत को ताने मारने से पीछे ना हटती .

जिस चिठ्ठी में शिवानी भाभी ने दुष्यंत को जन्म पत्री भेजने को कहा था एक पुरानी किताब में उस चिठ्ठी के मिलने पर तो श्वेता ने सारा घर आसमान पर उठा लिया था और यहाँ तक कि अपनी माँ को इंडिया फोन भी कर दिया था और शिवानी भाभी के बारे में जहर उगलते हुए बोली थी ,
" मुझे तो पहले से ही पता था कि वो इनकी प्यारी शिवानी भाभी हमारा रिश्ता होने देना नहीं चाहती थी. मेरी तो वो शुरू से ही दुश्मन है इसीलिए वह मेरा रिश्ता दुष्यंत के साथ तुड़वा कर जन्म- पत्रिओं में उलझा कर अपने करीबी रिश्तों में कहीं और शादी करवाना चाहती थी . "

उस दिन रात को तो श्वेता ने गुस्से में दुष्यंत को मर जाने की धमकी दी थी कि वह जहर खा कर मर जाएगी . दुष्यंत श्वेता की बातें सुन कर मन ही मन बहुत डर गया था और कई दिन तक रात को ठीक से सो भी नहीं पाया था .

जब दुष्यंत ने शिवानी भाभी की चिठ्ठी खोली जिसमे उन्होंने लिखा था ,
" प्यारे दुष्यंत, तुम लोग हम लोगों से इतनी दूर ख़ास तौर पर मिलने आए बहुत अच्छा लगा.इतने बरसों में भी तुम हम लोगों को भूले नहीं और हम लोगों के बारें में अभी भी इतना सोचते हो . मम्मी जी, तुम लोगों की बहुत तारीफ़ कर रही थी. श्वेता को मिलकर बहुत अच्छा लगा ऐसी सुन्दर और पढ़ी - लिखी लड़की किस्मत वालों को ही मिलती है . और हम लोग बेकार ही तुम्हारी शादी की कितनी चिंता किया करते थे और मम्मी जी ने तुम्हारी जन्म पत्री भी कहाँ- कहाँ नहीं दिखाई थी, पर जब दिल मिलते हो तो जन्म पत्रियाँ मिलाना आदि सब रूढ़ी वादी विचार हैं. जब भी इंडिया आया करो तो हम लोगों से जरूर मिलने आया करो अच्छा लगता है , तुम्हारी भाभी "

दुष्यंत की आँखें बरबस ही वह चिठ्ठी पढ़कर नम हो गई और उसने वह चिठ्ठी श्वेता को दी पढ़ने के लिए और मन ही मन उदास हो गया यह सोचकर कि शिवानी भाभी ने कितना सही लिखा है कि दिल मिलने जरुरी होते हैं . कभी-कभी तो अजनबी और पराए लोग भी अपनों से बढकर लगते हैं और जन्मों के रिश्ते निकल आते है और कभी-कभी अपने पास रहकर भी अजनबी और पराए ही लगते हैं . दुष्यंत को सब तरफ धुंआ ही धुंआ नजर आने लगा और उसके सपनों का लाक्षागृह धीरे-धीरे आग की लपटें पकड़ने लगा .