Monday, 27 January, 2014

बरसात




भारी बरसात के बाद नीलगगन
दिखता है कुछ ज्यादा ही नीला............
कुछ ज्यादा ही निखरा - निखरा.........

तेज धूप के बाद जब
धरती होने लगती है गर्म
हवाएं होने लगती है नम
उमड़ने लगते आसमान में घन
जल के छूने से धरा
खिल उठती होकर तृप्त
छट जाती है सब मिटटी  और  धूल
भर जाता है इक नव उजाला
पेड़ - पौधे नहाए से लगते हैं
फूल- पत्ते नए खिले से लगते हैं
पर्वत मालाएं भी दिखती है
दूर - दूर तक साफ़ - निर्मल
बर्फ की चादरें दिखती श्वेत - ध्वल

आँखों में भी तैरते हैं बादल
यादों के स्वर्णिम बादल
धीरे - धीरे विरह  की अग्नि में
पड़ जाते हैं काले
अहसास होने लगते हैं जब भारी
 टपकने लगते  बूँद  बारी- बारी
 बढ़ जाता है धुंधलापन
कोहरे का ढक जाता आवरण
सब  ओऱ फ़ैल जाता अन्धकार
नयनों से भी होती है बरसात
पर सब कुछ दिखता नहीं साफ़ -निर्मल  ?
क्यूँ छटती नहीं मिटटी  और  धूल ?

No comments:

Post a Comment