Sunday, 7 February 2010

मंजिल


प्रतीक्षा के कॉलेज का पहला दिन था, वह अपने पिताजी के साथ डी. ए. वी कॉलेज की ओर बस में जा रही थी.वह मन- ही-मन बहुत खुश थी,बस की खिडकियों से बाहर झाँककर प्रकृति की स्वछंद छटा का आनंद उठा रही थी .वह सोच रही थी कि आज के बाद उसे कभी भी स्कूल में होने वाली प्रातकालीन प्रार्थना में खड़ा नहीं होना पड़ेगा.और न ही उसे स्कूल-प्रबंधन द्वारा निर्धारित किसी भी तरह का परिधान पहनना पड़ेगा.आज से वह अपने मन की मालकिन है, वह अपनी इच्छा से मन पसंद कपडे पहन पाएगी. नीले-रंग के सलवार सूट में वह बहुत सुन्दर दिखाई दे रही थी.एक आजाद पखेरू की तरह वह उन्मुक्त गगन की ऊँचाइयों को नापना चाहती थी, तरह-तरह के सपने संजोए हुए नई इच्छाओं, आंकाक्षाओं तथा उमंगो से सरोबार था उसका मन.

पिताजी बेटी के प्रसन्नचित्त मुख-मंडल को देखकर कहने लगे , " बेटी , आज तुम्हारे कॉलेज का पहला दिन है खूब ध्यान लगाकर पढाई करना. जरूर एक–न-एक दिन हमारे कुल का नाम रोशन करोगी, जब तुम आई. ए. एस बन जाओगी. तुम्हारे कॉलेज ने देश के कई आई. ए. एस अधिकारी पैदा किए हैं ."वह इस बात को बहुत अच्छी तरह जानती थी कि पिताजी उससे बड़ी-बड़ी उम्मीदें संजोकर रखे हुए हैं . उसे वह दिन याद आ गया जब मैरिट-लिस्ट में उसका नाम पाँचवे स्थान पर आया था . पापा के चेहरे पर हर्षातिरेक के भाव आसानी से देखे जा सकते थे.

जब पड़ोसियों, मित्रों, सगे-सम्बन्धियों ने अपने बधाई-सन्देश दिए तो वह गर्व से फूले नहीं समाए. सबको मिठाई खिलाते-खिलाते एक ही बात दोहरा रहे थे कि मेरी होनहार बेटी है, जिस लगन और मेहनत के साथ वह पढाई करती है एक- न-एक दिन खानदान और इस शहर का नाम जरुर रोशन करेगी. कहते है न 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात 'उस दिन पिताजी की आँखों में अजीब-सी चमक थी .आज पिताजी के इस असीम विश्वास और अथाह प्रेम के सागर में गोते लगाते- लगाते कब उसकी आँखें नम हो गई उसे पता ही न चला.रह-रहकर एक ही ख्याल मन के किसी कोने को झिंझोड़ रहा था कि क्या वह पिताजी की इन उम्मीदों पर खरा भी उतर पाएगी .
प्रतीक्षा का जन्म उसकी बड़ी बहिन अनुराधा के पाँच साल बाद हुआ था . जन्म से ही वह बहुत सुन्दर थी गोल-मटोल चेहरा बड़ी-बड़ी आँखें दूसरी लड़की होने के बाद भी माता-पिता ने उसे खूब प्यार दिया था. माँ अक्सर कहती थी कि क्या मेरी यह बेटी किसी लड़के से कम है! उसके जन्म के डेढ़-साल बाद उसका भाई राजीव पैदा हुआ. घर में चारो तरफ ख़ुशी का माहौल था. परन्तु फिर भी उसके माता- पिता ने अपने आजीवन लड़के -लड़की में विभेद नहीं किया था .
इतने अच्छे परिवेश में बचपन के दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला देखते-देखते ही वह कॉलेज की छात्रा बन गई और स्कूल का जीवन बहुत पीछे छूट गया.उसके विचारों की तन्द्रा तब भंग हुई ,जब सामने शास्त्री सर्कल का मोड़ आया और पिताजी उसको ख्यालों में डूबा देख कहने लगे
" प्रतीक्षा कहाँ खो गई हो? , क्या सोच रही हो? आधा-घंटा और लगेगा तुम्हारा कॉलेज आने में”. उसने पिताजी की बात को अनसुना कर दिया कोई प्रतिक्रिया ना पाकर पिताजी ने उसे झिंझोड़ा और उसके चेहरे की तरफ देखने लगे .., " अरे ये क्या तुम तो रो रही हो , ऐसा क्या हुआ तबीयत ठीक नहीं है या कोई सामान घर भूल कर आई हो कुछ तो बताओ , क्या हुआ है ?"

पिताजी के एक साथ इतने सारे प्रश्नों को सुन कर वह खुद को संभाल न पाई और फफक- फफककर रोते हुए कहने लगी " पापा मेरी बहुत सारी सहेलियों ने सैंट जेविएर कॉलेज में दाखिला ले लिया है जबकि मै तो पढ़ने में उनसे काफी आगे थी और मैं डी. ए.वी कॉलेज में . मुझे इस बात का डर है कि मैं आपके सपनों को साकार कर पाऊँगी क्या ? कई मेरी कक्षा के विद्यार्थी तो इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में चले गए हैं . क्या आपकी मेरिट होल्डर बेटी के नसीब में ये सब नहीं था क्या !

मानो उसने पिताजी की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. एक दार्शनिक की भांति पिताजी उसे सांत्वना देने लगे " प्रतीक्षा तुम तो जानती हो कि तुम्हारे कमजोर स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ही नजदीक के कॉलेज में तुम्हारा दाखिला करवाया है ., मैं पूर्णतया आश्वस्त हूँ कि यहाँ भी पढाई करके तुम अपनी मंजिल पा सकती हो. करम करने पर ध्यान दो , फल तुम्हारी झोली में खुद- ब-खुद आकर गिर जाएगा , और कॉलेज से कोई फर्क नहीं पड़ता, पढाई तो खुद ही करनी पड़ती है . पिताजी के नेत्रों में छलकते प्रेम को देख कर प्रतीक्षा का रोना और बढ गया . सिसकते-सिसकते आँसुओं की धारा गालों के ऊपर सर्पिल-नदी की भांति बहते हुए मुँह तथा गले की तरफ जा रही थी. उसने अपना रुमाल निकाला और आंसू पोंछ के शांत होने का प्रयास किया . लेकिन मन तो मन ही था . एक बार जिस विषय पर केन्द्रित हो गया तो वहाँ से हटने का नाम ही नहीं ले रहा था. रह-रहकर उसे मेरिट की लिस्ट याद आ रही थी और परिजनों की उससे लगी उम्मीदें याद आ रही थी. वह इतनी भावुक हो गई कि एक एक कर बचपन के दोस्तों के चेहरे याद आने लगे .

जो दोस्त उसे डॉक्टर या इंजिनियर के रूप में देखना चाहते थे , उनकी कही बातें उसके मानस पटल पर बार- बार आ जा रही थी, वे कहते थे कि प्रतीक्षा तुम्हारे लिए तो बाएँ हाथ का खेल है डॉक्टर या इंजिनियर बनना . उसकी भी बचपन से हार्दिक इच्छा रही थी कि जिन्दगी में कुछ मुकाम हासिल करे , यह बात और थी कि पिताजी ने कभी उस पर अपनी इच्छा का दबाब नही डाला था ,वह तो उसकी लगन के मुताबिक ही चाहते थे , कि उनकी बेटी उच्च प्रशासनिक अधकारी बने तांकि उनका सिर सम्मान से ऊँचा उठ सके. जैसे- जैसे उसको बीते समय की यादें गहराने लगी, वैसे- वैसे फिर से उसकी आँखें नम होने लगी, वह कुछ ज्यादा ही सवेंदनशील थी, हर छोटी-सी बात पर भावुक हो जाती थी. जितना प्रयास करती बीती बातों को भूलने का, उतना ही रह-रह कर उसके सामने आ रही थी' बीती ताहि विसार दे आगे की सुधि ले '. आगे की सोच अभी निर्णायक स्तर तक नहीं पहुँच पा रही थी. बार- बार मन में एक ही ख्याल की पुनरावृति हो रही थी कि कैसे सब की उम्मीदों पर खरा उतरे, कैसे वह सब को इतना सुख दे कि सब का सीना फक्र से चौड़ा हो जाए .

इन्हीं सबके बीच सोचते- सोचते वह फिर से अतीत में खो गई . प्रतीक्षा के जीवन में जिस तरह उतार-चढ़ाव आए थे, बचपन से शायद इसीलिए वह ज्यादा भावुक होती गई. बचपन से ही वह मीठा खाने की कुछ ज्यादा ही शौक़ीन थी. जब वह पाँचवी कक्षा में ही थी सिर्फ कि उसके दाँत में दर्द शुरू हो गया अचानक. जरा-सा पानी लगने पर भी वह दर्द से कुलबुला उठती. उस दिन उसके दांत का दर्द कुछ ज्यादा ही बढ गया . उस दिन पिताजी भी कहीं बाहर गए थे और माँ घर के काम काज में व्यस्त थी. माँ ने कहा " प्रतीक्षा,ऐसे कोई दर्द ठीक हो जाएगा क्या , जाओ और दीदी के साथ जाकर सदर अस्पताल में दिखा आओ, डॉक्टर दवाई दे देगा और दर्द झट से ठीक भी हो जाएगा.जब मैं कहती थी कि प्रतीक्षा मीठी चोकलेट कम खाया करो, तब तो कहना मानती नहीं थी."
वह डॉक्टर के पास जाने से बहुत घबरा रही थी और रोते रोते कहने लगी " माँ अगर डॉक्टर ने दांत को निकाल दिया तो ." माँ ने कहा " तुम तो अभी छोटी हो इतनी जल्दी डॉक्टर दांत थोड़े ही निकालेगा "

माँ ने रसोई घर में जाते-जाते कहा .माँ की इन बातों से कुछ तसल्ली पाकर वह अपनी बड़ी बहिन अनुराधा के साथ सदर अस्पताल के लिए चल पड़ी. वहाँ जाकर उसने देखा कि पहले से ही लम्बी- कतार लगी है मरीजों की. काफी समय इन्तजार करने के बाद उसकी बारी आई तो डॉक्टर ने उसका दाँत चेक किया और बोला कि दाँत तो पूरी तरह सड़ चुका है." तब क्या करना होगा डॉक्टर साहिब" , दीदी ने आशंकित स्वर में डॉक्टर से पूछा .यही एक तरीका बचा है कि इन्फेक्टेड दाँत को निकाल देना चाहिए नहीं तो पायरिया होने का डर है. मेडिकल विज्ञान की ये बातें न उसको समझ आ रही थी न उसकी बड़ी बहिन को . कुछ समय सोचने के बाद दीदी ने प्रतीक्षा की तरफ देखते हुए उसकी दाड़ निकालने की अनुमति दे दी. डॉक्टर ने प्रतीक्षा को मुँह खोल कर रखने को कहा और सुन्न करने वाला इंजेक्शन उसकी दाड़ में लगा दिया. डॉक्टर ने कहा कि इससे दाँत सुन्न हो जाएगा और फिर दाँत निकालने में दर्द नहीं होगा और बाहर की तरफ इशारा करते हुए कुछ देर इन्तजार करने को कहा.प्रतीक्षा चुपचाप बाहर बेंच पर जाकर बैठ गई और अपनी बारी का इन्तजार करने लगी .उसके चेहरे पर मासूमियत झलक रही थी. जैसे-जैसे दाँत सुन्न हो रहा था वह रुआंसी हो रही थी और कुछ घबराहट भी हो रही थी .बड़ी बहिन पास बैठी उसे हिम्मत देने की कोशिश कर रही थी." प्रतीक्षा कुछ नहीं होगा, घबराओ मत, आज कल तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है और इतने बड़े से बड़ा ऑपरेशन बड़ी आसानी से हो जाता है और यह तो एक दांत निकालने की बात है सिर्फ. और तुम तो अभी छोटी हो और यह तो दुधिया दाँत है वापिस फिर से आ जाएगा.मौसी के बारे में तो जानती ही हो कि उन्हें कैंसर हुआ था और ऑपरेशन के बाद ठीक है बिलकुल".

अनुराधा के इतने लम्बे-चौड़े भाषण को वह क्या समझ पाती .दीदी की आँखों को देख कर वह समझ गई कि उसे कोई खतरा नहीं है. सहमति जताने के लिए उसने अपना सिर हिला दिया .वह पहले भी घर में बातचीत के दौरान रिश्तेदारों के ऑपरेशन के बारे में सुन चुकी थी .किसी को स्तन कैंसर था तो किसी को गठिया , लेकिन ऑपरेशन के बाद ये बीमारी दूर हो गई थी.
काफी समय बीत गया था पर उनकी बारी नहीं आई थी. डॉक्टर काफी भीड़ होने के कारण दूसरे मरीजों को /देख रहा था . आधा-घंटा लगभग बीत गया था .धीरे-धीरे उसकी निश्चेतन हुई दाड़ में फिर से दर्द- सा होना लगा और चेतना का ऐहसास फिर से होने लगा. जब तक उसकी बारी आई तब तक टीके का असर लगभग ख़त्म ही हो गया था, पर उसे इतनी समझ थोडा ही थी. वह डॉक्टर को क्या बताती और कैसे बताती. डॉक्टर ने उसे एक विशेष-सी कुर्सी पर आराम से बैठने को कहा और लाइट उसकी तरफ घुमा दी और कहा "अच्छा अब मुँह पूरी तरह खोलो, बस एक मिनट लगेगा.”

यह कहते हुए एक तरह के ख़ास औजार से उसकी दाड़ जड़ से निकाल दी . प्रतीक्षा की चीख निकल गई , डॉक्टर ने डाँटते हुए कहा चिल्लाने की क्या बात है , और दाँत में से खून बहने लगा. ,वह दर्द से बिलबिला रही थी , उसकी यह हालत देखकर उसकी बहिन अनुराधा भी घबरा गई . डॉक्टर साहिब ये क्या, उसके दाँत से तो बहुत खून निकल रहा है .डॉक्टर ने कहा कि घबराने की बात नहीं है और यह कहकर डॉक्टर ने एक बड़ा सा रुई का फ़ौआ उसके दाँत की जगह ठूंस दिया, इसे निकालना मत्त और जल्द ही खून रुक जाएगा. डॉक्टर की थोड़ी सी असावधानी की वजह से आस पास के दांत भी खराब होने शुरू हो गए और उनकी जड़ो में भी इन्फैक्शन फ़ैल गया और मर्ज ठीक होने की बजाय बढता ही गया .प्रतीक्षा के कई दांतों में संक्रमण फ़ैल गया .और उन दांतों को भी निकालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था . खान-पान की असुविधा होने के कारण उसका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन बिगड़ता ही गया. एक दो दांत ऊपर के जबड़े से भी निकल जाने के कारण उसकी आँखों की रोशनी भी कम होती गई दिन पर दिन. कक्षा में बोर्ड पर लिखे हुए अक्षर पढ़ने में उसको काफी दिक्कत आने लगी . और छठी कक्षा में ही एक मोटा-सा चश्मा उसकी आँखों पर लग गया .इस चश्मे की वजह से सब उसे चश्मिश कहकर पुकारने लगे और वह मन ही मन अवसाद ग्रस्त होती गई ..ढूध के दांत निकलवाने के बाद वापिस आ गए मगर उसका गिरता स्वास्थ्य , अवसाद ग्रस्त चेहरा तथा आँखों पर लगे मोटे चश्मे ने उसकी सुन्दरता को इस तरह छुपा दिया था मानो किसी काले बादल ने दैदीप्यमान सूरज को ढक लिया हो .अपनी सुन्दरता को खोता देखकर वह दिन- प्रतिदिन हीन-भावना की शिकार होती गई.न तो वह अब ज्यादा किसी से बात करती और न किसी को ख़ास मिलना पसंद करती .वह सबसे कटी-कटी रहने लगी.अगर घर पर कोई भी रिश्तेदार या कोई मित्र आता है तो वह छुप जाती थी .अब उसके पास एक ही लक्ष्य था केवल पढाई और पढाई .सारा दिन किताबों में लीन रहना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था.इतनी बीमारियाँ छोटी उम्र में और ऊपर से कुछ ज्यादा परिश्रम करने के कारण उसकी प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होने लगी और देखते- देखते वह तपेदिक जैसी भयानक बीमारी की चपेट में आ गई. उसको हर समय बुखार रहने लगा और खांसी के साथ बलगम में खून आने लगा .पहले वह बड़ी बहिन के साथ सोया करती थी परन्तु अब माता-पिता ने उसका बिस्तर अलग लगा दिया और बाकी हर रोज इस्तेमाल होने वाला सामान भी सब अलग कर दिया और इस वजह से उसे पहले जैसा प्यार भी नहीं मिल पा रहा था.पिताजी ने उसे हिदायत देते हुए कहा " बेटी खांसते वक़्त मुह पर रुमाल रख लिया करो , यह बीमारी एक संक्रमित आदमी से घर के बाकी सदस्यों को भी हो सकती है खांसी के द्वारा और दूसरे सामानों के इस्तेमाल से भी इस बीमारी के कीटाणु दूसरों तक आसानी से पहुँच सकते हैं अतः बेहतर यही है की तुम अलग कमरे में और अलग बिस्तर पर सोया करो".

पिताजी की ये बातें सुन कर प्रतीक्षा को ऐसा लगा मानो उस पर वज्रपात हुआ हो.इस छूआ-छूत की बीमारी के बारे में बताते-बताते पिताजी दुखी हो गए और उसे सदर अस्पताल के जाने माने डॉक्टर के पास ले गए.डॉक्टर ने बड़ी बारीकी से उसकी बीमारी की जांच-पड़ताल की और दो महीने की एंटीबायोटिक मेडीसिन दी और साथ में चालीस पेंसिलिन के इंजेक्शन भी दिए.दवाइयाँ इतनी कडवी थी और पेंसिलिन की सुइयों का तो कहना ही क्या ! इतने दर्द भरे थे कि बैठते नहीं बनता था.हर रोज का एक इंजेक्शन था जिसे लगातार लगवाना पड़ता था और न चाहते हुए भी वह इस असहनीय दर्द को सहने को मजबूर थी और इतना सब झेलने के बाद वह मानसिक और भावनात्मक तौर पर कमजोर पड़ती जा रही थी.मगर घर वाले हैरान थे और उसके साहस की दाद देते थे कि कैसे प्रतीक्षा ने इतनी छोटी उम्र में भी अपनी बीमारी के साथ लम्बी लड़ाई लड़ी .धीरे-धीरे वह ठीक होती गई और इसकी वजह से वह अपने स्वास्थ्य के लिए काफी सचेत रहने लगी क्योंकि शंका उसके मन के कोने में घर कर गई थी. एकाग्रता के अभाव में नौवी कक्षा में उसको काफी कम अंक प्राप्त हुए. कम अंको की वजह से उसे काफी दुःख लगा और खुद को असहाय महसूस करने लगी.फिर उसे नर्सरी कक्षा में पढाई गई कहानी "राजा और मकड़ी "याद आ गई ,और उसने अपनी आंतरिक शक्ति को एकत्रित करते हुए दिन दूनी रात चौगुनी मेहनत करना शुरू किया दसवीं कक्षा की परीक्षा के लिए.
आखिरकार अपना नाम दसवी के बोर्ड की परीक्षा की मेरिट-लिस्ट में अंकित करवाकर न केवल अपनी बुद्धिमता का और साहस का परिचय दिया बल्कि अपने पिता के गौरव को भी अक्षुण रखा. सही भी था कि पूत के पाँव पालने में ही पहचाने जाते है . उसकी गौरवमयी सफलता को देख कर पिताजी प्रतीक्षा के प्रशासनिक अधिकारी बनने का दिवा -सपना देखने लगे.और उसकी आगे की पढाई के लिए योजना बनाने लगे. पिताजी ने प्रतीक्षा का मार्गदर्शन किया कि प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए दो सालों तक यानी बारहवीं तक वह साइंस के विषय पढ़ ले तांकि उसका सामान्य-ज्ञान अच्छा हो जाए और उसकी दिनचर्या भी अच्छी बनी रहे .फिर उसके बाद आर्ट्स के विषय लेकर मेन पेपर के लिए अच्छे से दो विषय तैयार कर ले . इस तरह उसके पिता जी ने मन ही मन पूरी योजना हर बात की बना ली.वह मन ही मन सोच रहे थे की उनके खानदान में आज तक कोई भी इतने ऊँचे पद पर आसीन नहीं हुआ है और जब प्रतीक्षा इस पद पर होगी तो उनका सिर फक्र से सबकी नजरों में कितना ऊँचा हो जाएगा .
तभी बस कंडक्टर ने बस रोकी और कहने लगा कि डी ए वी कॉलेज का स्टॉप आ गया है, यहाँ वाले सब उतर जाएँ , तभी प्रतीक्षा ने सामने देखा अपने नए कॉलेज के बड़े से गेट को ..
प्रतीक्षा को उठता देखकर पिताजी ने उसकी तरफ इस तरह देखा मानो अपने अरमानों की चिट्ठी उस तक पहुँचाना चाहते हो.पिता जी प्रतीक्षा की तरफ देख कर कहने लगे जाओ बेटी अपने अरमानों को हासिल करो " वह अपनी अतीत की यादों के थपेड़ो से बाहर निकल कर जिन्दगी के रंगीन सपनो को सार्थक करने के लिए कॉलेज के बड़े से गेट में प्रवेश करने लगी.क्या वह अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य को बेध पाएगी उसे लग रहा था उसको ही क्यों इतना सब संघर्ष झेलना पड़ा ?


Thursday, 7 January 2010

मरीचिका


अपराजिता के जीवन का यह पहला अवसर था ,जब वह किसी बड़े नेता से मिलने आई थी .उनके ऑफिस में प्रवेश करते समय वह पूर्णतया सहमी हुई थी .मगर बचपन से ही उसमें आत्म-विश्वास कूट-कूटकर भरा था .ऑफिस के बाहर खड़े दरबान ने कहा ," मैडम, विधायक साहब से मिलना चाहती हो ? साहब बहुत व्यस्त हैं ."
अपराजिता ने विनीत-भाव से उत्तर दिया ," मैं उनसे एक आवश्यक काम के लिए मिलना चाहती हूँ. उन्होंने कहा भी था जब जरुरत पड़े तो मिलने आ सकती हो."
दरबान ने अपराजिता के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा ," अच्छा ,ठीक है मैडम ! पर्ची पर अपना नाम ,स्थान एवं काम लिखकर दीजिए. मैं साहब से बात करता हूँ आपके बारे में "
वह मन ही मन घबरा रही थी कि वह गोपाल जी से मिल भी पाएगी या नहीं या वह उसे बाहर से ही लौट जाने को कह देंगे. कुछ देर बाद दरबान जब वापिस आया तो उसने न सिर्फ अन्दर आने को कहा बल्कि इज्जत के साथ बैठक-कक्ष में ले गया . जबकि ऑफिस के बरामदे में मिलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था . वह उस बैठक -कक्ष में बैठकर तरह -तरह के विचारों के उधेड़-बुन में खो गई . वह मन ही मन अत्यंत खुश हो रही थी कि गोपाल जी ने उसे विशिष्ट स्थान प्रदान कर अनुग्रहित किया है. जहाँ उनको मिलने के लिए आम- लोगों को लम्बी-कतार में खड़े होकर दीर्घ प्रतीक्षा करनी पड़ती है ,वहाँ उसे न तो किसी भी प्रकार का इन्तजार करना पड़ा बल्कि उसे बैठक-कक्ष में जाने का इशारा कर आम-लोगों की नज़रों में ऊँचा उठा दिया. वह मन ही मन अपने आप को गौरवान्वित अनुभव कर रही थी कि अवश्य विधायक-साहब कहीं न कहीं उसके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के किसी न किसी पहलु से प्रभावित हुए है .अब उसे मन ही मन लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं है, जब उसके सारे दुर्दिन दूर हो जाएंगे तथा उसकी जिन्दगी में वे सारी खुशियाँ लौट आएगी जिसका उसे एक लम्बे अरसे से इन्तजार था .वह मन ही मन इस बात से फूली नहीं समा रही थी कि गोपाल जी ने उनके घर पर पहली मुलाक़ात में दूसरे लोगों की तुलना में उस पर विशेष ध्यान दिया हैं .वह उनके सुसज्जित बैठक-कक्ष को ध्यानपूर्वक निहारने लगी .उसने देखा कि बैठक-कक्ष की प्रत्येक वस्तु बहुत ही सलीके से रखी हुई थी.देखते -देखते उसे अपना अतीत याद आने लगा .ऐसी बात नहीं थी कि अपराजिता विधायक साहब को पहले नहीं मिली हो .वह उनको दो-तीन माह पूर्व क्षेत्रीय चुनावी कार्यकर्मों के दौरान मीटिंगों में दो-तीन बार मिल चुकी थी.
उसकी संगठन-क्षमता तथा भाषण-शैली से प्रभावित होकर एक बार गोपाल जी ने कहा ," अपराजिता , तुम एक अच्छी कार्यकर्त्ता हो. भविष्य में पार्टी के लिए एक वरदान साबित होगी .अगर तुम्हें किसी भी सिलसिले में मेरी सहायता की जरुरत अनुभव हो,तो बेझिझक मुझसे मिलने आ सकती हो. मेरे घर के दरवाजे हमेशा तुम्हारे लिए खुले मिलेंगे. "अचानक नौकर को सामने पाकर उसका ध्यान टूटा. नौकर ने शांत भाव से उसके सामने पानी का गिलास रख दिया तथा न्रमतापूर्वक पूछने लगा," मेम साहिब , चाय लेंगी या कॉफ़ी ?"अनमने-भाव से अपराजिता ने चाय के लिए हामी भर दी .अपराजिता बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि वाली थी ,साथ ही साथ महत्वाकांक्षी भी. वह बुलंदियों के शिखर को छूना चाहती थी,परन्तु लक्ष्य को पाने के लिए विरासत में मिले संस्कारों को छोड़ना नहीं चाहती थी .उसकी भारतीय संस्कारों में दृढ़ आस्था थी . किसी भी कीमत पर वह उन्हें खोना नहीं चाहती थी . बचपन से ही उसके संस्कारयुक्त मन ने महत्वाकांक्षा के कई हवाई-किलों का निर्माण कर लिया था. परन्तु ज्यों-ज्यों उसकी उम्र गुजरती गई तथा वह जिंदगी के यथार्थ धरातल से परिचित होती गई,एक-एककर उसके सारे सपने चूर चूर होकर टूटते नजर आए.सपनों को टूटता देखकर भी उसने हिम्मत नहीं हारी ,वरन वह अपनी दुगुनी शक्ति के साथ जीवन की कठोरताओं के साथ डटकर संघर्ष करने के लिए तत्पर हो गई.संघर्ष करते-करते अब उसका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल गया था. वह एक मंझे हुए परिपक्व इंसान की भाँति सोचने लगी थी. जब उसकी मुलाक़ात पहली बार गोपाल जी से हुई थी तो उसे लगने लगा था मानो ईश्वर ने उसकी अन्तः-पुकार सुन ली हो तथा उनको उसके लिए एक मसीहा के रूप में अवतरित किया हो . अक्सर वह अपराजिता के सौंदर्य,प्रतिभा तथा वाक्-कुशलता की भूरी-भूरी प्रशंसा करते थे ,यह भी एक कारण था कि उसके दिल में गोपाल जी के प्रति एक अलग स्थान था.तभी कमरे में नौकर ने चाय के प्याले के साथ प्रवेश किया .उसके कदमों की आवाज सुनकर वह अपने अतीत की दुनिया से लौटकर वर्तमान में आ गई . वह सोचने लगी कि जब गोपाल जी कमरे के भीतर प्रवेश करेंगे तो किस तरह उसे उनका अभिवादन करना चाहिए . क्या वह उनके पाँव छुएगी या हाथ जोड़कर प्रणाम करेगी ? किस तरह वह अपनी समस्याओं को उनके समक्ष रखेगी ?उसका तो राजनैतिक क्षेत्र से कभी भी सम्बन्ध नहीं रहा है .वह तो इस क्षेत्र में पूर्णतया अनाड़ी है .उसके मन में अभी भी यह अटूट विश्वास था कि वह अपने ईश्वर-प्रदत किसी देवता के सामने गुहार लगाने आई है ,जो उसकी मुराद को जरुर पूरा करेंगे . उसका मन इस बात की गवाही दे रहा था तभी तो उन्होंने उसे अपने बैठक-कक्ष में बैठने के निर्देश दिए थे . आधा-घंटा बीतने के बाद गोपाल जी ने बैठक-कक्ष में प्रवेश किया .ज्यों-ही उन्होंने कमरे में प्रवेश किया ,वैसे ही अपराजिता उनके स्वागत में खड़ी हो गई और चरण-स्पर्श करने के लिए आगे की ओर झुकी .गोपाल जी ने हलके-से उसकी पीठ थपथपाई और बीच में अवस्थित सोफे पर जाकर इस तरह बैठ गए मानो एक राजा अपने सिंहासन पर विराजमान हो रहा हो . फिर स्नेहिल-निगाहों से उसकी तरफ एकटक देखने लगे तथा पूछने लगे ," अपराजिता ! यह बताओ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ ? अच्छा यह बताओ ,जिन्दगी में क्या करना चाहती हो ?"अपराजिता तो इसी अवसर की तलाश में थी कि कब गोपाल जी उसे अपनी बात रखने को कहे . बिना रुके एक ही सांस में उसने अपनी बात उनके सामने रख दी .वह कहने लगी " जी, मैं अपने महाविद्यालय की अच्छी छात्राओं में से एक थी .मुझे अपने आप पर पूर्ण विश्वास है कि अगर ईश्वर ने मुझे एक मौका दिया तो मैं उस पर पूरी तरह खरी उतरूंगी .ऐसे मुझमें एक अच्छे संगठन-कर्ता के अलावा वह सभी गुण भी विद्यमान है जो किसी नेतृत्व करने वाले में होने चाहिए. आप तो इस बात से परिचित भी है कि मैं अपने दायित्वों के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित हूँ .दुःख तो केवल इस बात का है कि आज तक मुझे समझने वाला कोई सच्चा मार्ग-दर्शक नहीं मिला . अब आपके संपर्क में आने से मुझे लग रहा है कि मैं भी समाज के कुछ काम आ सकती हूँ और अपने जीवन को सार्थक बना सकती हूँ ."इतना बताने के बाद वह एकदम चुप हो गई. कमरे में शान्ति व्याप्त हो गई . गोपाल जी भी कुछ नहीं बोले .वह मन ही मन सोच रही थी कि कैसे उसने अपने मन की बात इतने आत्म-विश्वास के साथ उनके सामने रख दी .वह सोच रही थी कि गोपाल जी की चुप्पी इस बात की प्रतीक है कि उन्होंने कैसे उसकी बात को गंभीरतापूर्वक लिया है.परन्तु ये क्या.! गोपाल जी ने अचानक उसके हाथ को अपने हाथ पर रख लिया और उसे बड़े प्यार से सहलाने लगे.उस समय कमरे में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. अपराजिता की दृष्टि में वह पितृ-तुल्य इंसान थे. हाथ सहलाने से वह सिहर उठी .वह तो भय से अन्दर तक काँप गई . उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि माजरा क्या है.उसे लगा मानो उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसकती जा रही है वह अपने हाथ को खींचने का प्रयास कर रही थी. कमरे में कुछ देर तक ऐसा सन्नाटा छाया रहा कि अगर एक सुई भी गिरती तो उसकी आवाज भी प्रतिध्वनित होती. अपराजिता के विरोध को देख कर गोपाल जी धीमे स्वर में कहने लगे "देखो,अपराजिता मैं इस क्षेत्र का बहुत पुराना विधायक हूँ . मैं जनता का सच्चा- सेवक हूँ . हर दिन हजारों लोग अपनी समस्याएँ लेकर मेरे पास आतें है . उनमें बहुत-सी औरते भी होती हैं, परन्तु आज तक ऐसा नहीं हुआ कि मुझे कोई इस कदर भाया हो . मैं तुमे बहुत पसंद करता हूँ पहले दिन से तुम मुझे बहुत अच्छी लगी थी .मैं तुमे राजनीति में हर तरह का प्रोत्साहन दे सकता हूँ और हर समय तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा. बस तुम भी थोडा-सा मेरे साथ खड़ी रहो. मेरा तात्पर्य समझ गई होगी ."

उनकी ये अप्रत्याशित बातें सुनकर अपराजिता अवाक रह गई उसे तो मानो काटो खून नहीं. उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे और क्या न करे. वह तो सुन्न सी हो गई . इतने बड़े व्यक्ति के मुख से ऐसी बात सुन कर वो क्या कहे .इतने स्पष्ट शब्दों में गोपाल जी का प्रणय-निवेदन सुन कर वह बुरी तरह झुंझला उठी. उस समय अपराजिता अपने आप को बहुत लाचार-सा अनुभव कर रही थी . उसे अपने सपनों का महल टूटता बिखरता नजर आ रहा था . वह सोच रही थी कि जिस तरह की उम्मीद गोपाल जी उससे कर रहे है वह पूरी करना उसके बस की बात नहीं है. जीवन-भर के कठोर संघर्षों से जूझते-जूझते वह थक-सी गयी थी . एक उम्मीद की किरण जागी थी . अब उसे अपने सब तरफ अँधेरा दिखाई पड़ रहा था.गोपाल जी के रूप में उसे लगने लगा था कि शायद कोई मसीहा भगवान् ने उसके लिए भेज दिया हो. अब उसे लग रहा था कि काश धरती फट जाए और वह उसमे समा जाए. वह खुद को बेजान-सा महसूस कर रही थी. कुछ देर बाद अपराजिता बहुत हिम्मत बटोरकरबोली, " ऐसी क्या खासियत है मुझमें, और मैं तो उम्र में भी आप से बहुत छोटी हूँ."पर उनकी आँखों में तो अपराजिता को लेकर अजीब-सी चमक दिखाई दे रही थी. फिर काफी सोच विचारकर के अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए अपराजिता बोली"आप मेरे से उम्र में भी काफी बड़े है और इतने बड़े आदमी भी है . मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ और आपका बहुत ऊँचा स्थान है मेरे मन में. मैं तो एक बहुत मामूली-सी औरत हूँ आपकी समाज में इतनी मान प्रतिष्ठा है. मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उस पर जरा सी भी आंच आए . मैं इतनी जल्दी आपको और क्या कह सकती हूँ ?" अपराजिता यह भी नहीं चाहती थी कि वह इस समय कोई बेवकूफी करे और जल्दबाजी में कोई जवाब दे . उसे उस समय बात को टाल देना ही बेहतर लगा . वह चाहती थी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे . गोपाल जी ने भी एक चतुर नेता की तरह अपराजिता का चेहरा पढ़ लिया और कहने लगे," अपराजिता, घबराओ मत , मैंने तो सिर्फ अपने मन की बात तुम्हें बताई है , अगर दुनिया में आगे बढना है तो इन छोटी-मोटी बातों की परवाह नहीं करनी चाहिए .फिर भी मैं तुम्हें एक बात का आश्वासन देता हूँ कि मैं हमेशा ही तुम्हारा अच्छा दोस्त बना रहूँगा और तुम्हारी पूरी मदद करता रहूँगा ".यह बात सुन कर अपराजिता की जान में कुछ जान आई .गोपाल जी कहने लगे कि दोस्ती में उम्र नहीं दिल देखा जाता है .गोपाल जी को थोडा सहज-सा होते देख अपराजिता भी कुछ ठीक देर बातें करती रही . इतनी देर में नौकर चाय लेकर आ गया,गोपाल जी ने उसे चाय लेने को कहा .अपराजिता के लिए यह क्षेत्र बिलकुल नया था . उसने तो अपना सारा जीवन पढ़ने -लिखने में ही बिताया था. वह तो राजनैतिकशब्दावली को समझने में असमर्थ थी.किस बात का सही मायने में क्या अर्थ था उसकी समझ से परे लग रहा था ,फिर भी वह खुद को सहज दर्शाते हुए चाय खत्म करने लगी. जैसे ही चाय ख़त्म हुई तो अपराजिता ने बहुत हिम्मत बटोरकर बाहर जाने की इजाजत मांगी. उन्होंने इसी बीच उसे दोपहर के खाने का न्यौता दे दिया वह सिरहिलाकर उठ खड़ी हुई. गोपाल जी भी उसके साथ ही उठ खड़े हुए तो कुछ क्षण वह रुकी और औपचारिकतावश अभिवादन करने के लिए झुकी तो आशीर्वाद देने की जगह गोपाल जी ने उसके अधरों का चुम्बन लेना चाहा तो अपराजिता का मानो काटो तो खून नहीं. वह गोपाल जी के इस तरह के अप्रत्याशित व्यवहार से सन्न रह गई .. उसने गोपाल जी को इंकार कर दिया .. वह उसके जीवन की सबसे बड़ी अस्वाभाविक घटना थी उसके हाथ पैर काँप रहे थे और सांस उखड रही थी. जैसे-तैसे खुद को थोडा सहज करके वह बिना इधर-उधर देखे तेज क़दमों से बाहर निकल गई . गेट के बाहर पहुँच कर भी अपराजिता की सांस उखड़ी हुई थी उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ है.गेट पर खड़ा दरबान उसे देखते ही मुस्कराते हुए बोला ," मैडम ,चिंता मत कीजिए . आपका काम शत-प्रतिशत हो जाएगा ."दरबान की बात को अनसुनी कर तरह -तरह के भयानक विचारों के सागर में गोते लगाते हुए वह कब अपने दरवाजे की दहलीज पर पहुँच गई कि उसे पता ही नहीं चला . वह सुबह जहां से इतने सपने लेकर चली थी उसी जगह वापिस खड़ी थी.उसे भय लग रहा था . उसे लग रहा था कि गोपाल जी को मिलकर अपनी समस्या का निदान पाना महज एक मृग-मरीचिका थी !